Class 10 Civics: जाति, धर्म और लैंगिक मसले

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Chapter Overview

Class10
SubjectCivics 
Chapter Nameजाति, धर्म और लैंगिक मसले
Resource TypeRevision Notes
SyllabusNCERT
Suitable ForCBSE, JAC and other state boards

जाति, धर्म और लैंगिक मसले Revision Notes

1. श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour) क्या है?

उत्तर ⇒ श्रम का लैंगिक विभाजन वह व्यवस्था है जिसमें समाज स्त्री और पुरुष के कार्यों को अलग-अलग बाँट देता है। सामान्यतः घर के अंदर के कार्य, जैसे भोजन बनाना, सफाई करना, बच्चों एवं बुजुर्गों की देखभाल आदि महिलाओं की जिम्मेदारी मानी जाती है, जबकि घर के बाहर के कार्य, जैसे नौकरी, व्यापार एवं आय अर्जित करना पुरुषों का कार्य माना जाता है। यह विभाजन प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं एवं मान्यताओं पर आधारित है। आधुनिक समाज में यह माना जाता है कि स्त्री एवं पुरुष दोनों सभी प्रकार के कार्य करने में समान रूप से सक्षम हैं।

(i) कार्यों का विभाजन स्त्री एवं पुरुष के आधार पर किया जाता है।

(ii) घरेलू कार्य महिलाओं की जिम्मेदारी माने जाते हैं।

(iii) बाहरी कार्य पुरुषों से जोड़े जाते हैं।

(iv) यह सामाजिक व्यवस्था है, प्राकृतिक नहीं।

(v) आधुनिक समाज समान अवसरों का समर्थन करता है।

2. लैंगिक विभाजन का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर ⇒ लैंगिक विभाजन के कारण महिलाओं को लंबे समय तक घर की चारदीवारी तक सीमित रखा गया तथा उन्हें शिक्षा, रोजगार एवं राजनीति में समान अवसर नहीं मिल सके। महिलाओं के घरेलू कार्यों को कम महत्व दिया गया, जबकि पुरुषों का सार्वजनिक जीवन में प्रभुत्व बढ़ता गया। इससे समाज में असमानता, भेदभाव एवं महिलाओं की भागीदारी में कमी आई। वर्तमान समय में समान अधिकारों एवं जागरूकता के कारण इस स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

(i) महिलाओं की सामाजिक भागीदारी कम हुई।

(ii) राजनीति में पुरुषों का प्रभुत्व बढ़ा।

(iii) महिलाओं के कार्यों का उचित मूल्यांकन नहीं हुआ।

(iv) समाज में असमानता बढ़ी।

(v) जागरूकता से स्थिति में सुधार हो रहा है।

3. महिलाओं के घरेलू कार्यों को कम मूल्यवान क्यों माना जाता है?

उत्तर ⇒ महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अधिकांश घरेलू कार्यों के लिए कोई वेतन नहीं दिया जाता। इन्हें परिवार का कर्तव्य मान लिया जाता है, इसलिए इनके आर्थिक योगदान को महत्व नहीं दिया जाता। जबकि भोजन बनाना, बच्चों की देखभाल एवं घर का प्रबंधन समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य हैं। इन कार्यों का उचित मूल्यांकन न होने के कारण महिलाओं के श्रम को अक्सर कम मूल्यवान समझा जाता है।

(i) घरेलू कार्यों के लिए वेतन नहीं मिलता।

(ii) इन्हें कर्तव्य समझा जाता है।

(iii) आर्थिक योगदान नहीं माना जाता।

(iv) महिलाओं के श्रम का उचित सम्मान नहीं मिलता।

(v) समाज में असमानता बनी रहती है।

4. नारीवादी (Feminist) किसे कहते हैं?

उत्तर ⇒ नारीवादी वह व्यक्ति होता है जो स्त्री एवं पुरुष के बीच समानता का समर्थन करता है। उसका मानना है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, राजनीति एवं सामाजिक जीवन में बराबर अधिकार एवं अवसर मिलने चाहिए। नारीवादी समाज से लैंगिक भेदभाव समाप्त कर समानता एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं।

(i) स्त्री-पुरुष समानता का समर्थन करता है।

(ii) महिलाओं के समान अधिकारों की वकालत करता है।

(iii) भेदभाव का विरोध करता है।

(iv) समान अवसरों की माँग करता है।

(v) सामाजिक न्याय का समर्थक होता है।

5. नारीवादी आंदोलन (Feminist Movement) क्या है?

उत्तर ⇒ नारीवादी आंदोलन वे आंदोलन हैं जिनका उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार एवं अवसर दिलाना है। इन आंदोलनों के माध्यम से महिलाओं के राजनीतिक एवं कानूनी अधिकारों को मजबूत करने, शिक्षा एवं रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में समानता स्थापित करने की माँग की गई। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप आज महिलाओं को मतदान का अधिकार, शिक्षा, रोजगार तथा राजनीति में भागीदारी के अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं।

(i) महिलाओं के समान अधिकारों की माँग करता है।

(ii) शिक्षा एवं रोजगार को बढ़ावा देता है।

(iii) राजनीतिक एवं कानूनी अधिकार मजबूत करता है।

(iv) लैंगिक समानता स्थापित करने का प्रयास करता है।

(v) महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार लाता है।

6. नारीवादी आंदोलनों की प्रमुख माँगें लिखिए।

उत्तर ⇒ नारीवादी आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समाज में पुरुषों के समान अधिकार एवं अवसर दिलाना था। इन आंदोलनों के माध्यम से महिलाओं के मतदान के अधिकार, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी तथा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में समानता की माँग की गई। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अनेक देशों में महिलाओं को कानूनी एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ।

(i) महिलाओं को मतदान का अधिकार मिले।

(ii) शिक्षा एवं रोजगार के समान अवसर मिलें।

(iii) राजनीतिक एवं कानूनी अधिकार मजबूत हों।

(iv) पारिवारिक जीवन में समानता स्थापित हो।

(v) महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त किया जाए।

7. नारीवादी आंदोलनों के प्रमुख परिणाम लिखिए।

उत्तर ⇒ नारीवादी आंदोलनों के कारण विश्वभर में महिलाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला, शिक्षा एवं रोजगार के नए अवसर प्राप्त हुए तथा वे राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग एवं प्रशासन जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ीं। कई देशों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी तथा समाज में लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता विकसित हुई।

(i) महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला।

(ii) शिक्षा एवं रोजगार के अवसर बढ़े।

(iii) राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी।

(iv) सामाजिक जागरूकता विकसित हुई।

(v) लैंगिक समानता को बढ़ावा मिला।

8. पितृसत्तात्मक या पितृ-प्रधान व्यवस्था (Patriarchy) क्या है?

उत्तर ⇒ पितृसत्तात्मक या पितृ-प्रधान व्यवस्था वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा अधिक शक्ति, अधिकार एवं महत्व दिया जाता है। इस व्यवस्था में परिवार एवं समाज के अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं तथा महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती है। भारत सहित अनेक देशों में लंबे समय तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रभाव रहा है, जिसके कारण महिलाओं को अनेक प्रकार की असमानताओं का सामना करना पड़ा।

(i) पुरुषों को अधिक महत्व दिया जाता है।

(ii) महिलाओं के अधिकार सीमित रहते हैं।

(iii) निर्णय लेने की शक्ति पुरुषों के पास होती है।

(iv) सामाजिक असमानता बढ़ती है।

(v) लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा मिलता है।

9. भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, फिर भी वे पुरुषों की तुलना में पीछे हैं। अनेक परिवारों में आज भी लड़कों की शिक्षा को अधिक महत्व दिया जाता है, जिसके कारण कई लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पातीं। शिक्षा की कमी महिलाओं के रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता एवं सामाजिक विकास को भी प्रभावित करती है। इसलिए सरकार एवं समाज दोनों महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

(i) महिलाओं की शिक्षा में सुधार हुआ है।

(ii) पुरुषों की तुलना में साक्षरता कम है।

(iii) उच्च शिक्षा तक पहुँच सीमित है।

(iv) सामाजिक सोच इसका प्रमुख कारण है।

(v) महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है।

10. भारत में महिलाओं के रोजगार एवं वेतन संबंधी समस्याएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत में महिलाएँ अनेक क्षेत्रों में कार्य करने के बावजूद रोजगार एवं वेतन के मामले में असमानता का सामना करती हैं। उच्च पदों एवं अधिक वेतन वाली नौकरियों में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत कम है। समान कार्य करने के बावजूद कई क्षेत्रों में उन्हें पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है। इसके अतिरिक्त महिलाओं के घरेलू कार्यों को आर्थिक योगदान नहीं माना जाता, जिससे उनके श्रम का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता।

(i) उच्च पदों पर महिलाओं की संख्या कम है।

(ii) समान कार्य के लिए कम वेतन मिलता है।

(iii) घरेलू कार्यों का मूल्यांकन नहीं होता।

(iv) आर्थिक असमानता बनी रहती है।

(v) रोजगार में लैंगिक भेदभाव देखा जाता है।

11. भारत में लिंगानुपात (Sex Ratio) में गिरावट के प्रमुख कारण लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत में लंबे समय तक पुत्र को पुत्री की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता रहा है। इसी सोच के कारण कई परिवारों में कन्या भ्रूण हत्या, बालिकाओं की उपेक्षा एवं शिक्षा तथा स्वास्थ्य में भेदभाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इन कारणों से देश के कई राज्यों में लिंगानुपात प्रभावित हुआ। सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ चलाकर तथा कन्या भ्रूण हत्या पर कानूनी रोक लगाकर इस स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया है।

(i) पुत्र को अधिक महत्व दिया जाता है।

(ii) कन्या भ्रूण हत्या एक प्रमुख कारण है।

(iii) बालिकाओं की उपेक्षा की जाती है।

(iv) शिक्षा एवं स्वास्थ्य में भेदभाव होता है।

(v) सरकार सुधार के लिए योजनाएँ चला रही है।

12. भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पहले की अपेक्षा बढ़ी है, फिर भी संसद एवं विधानसभाओं में उनकी संख्या पुरुषों की तुलना में कम है। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में आरक्षण मिलने के बाद बड़ी संख्या में महिलाएँ पंचायतों एवं नगर निकायों में निर्वाचित हुई हैं। इससे महिलाओं का नेतृत्व विकसित हुआ तथा लोकतंत्र अधिक समावेशी बना है।

(i) संसद एवं विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है।

(ii) स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।

(iii) आरक्षण से नेतृत्व विकसित हुआ।

(iv) लोकतंत्र अधिक समावेशी बना।

(v) महिलाओं की राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।

13. महिलाओं के लिए आरक्षण क्यों आवश्यक माना जाता है?

उत्तर ⇒ महिलाओं को लंबे समय तक राजनीति एवं निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त अवसर नहीं मिले। इसलिए निर्वाचित संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था आवश्यक मानी गई। आरक्षण से महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिलता है, उनके मुद्दे प्रभावी ढंग से उठाए जाते हैं तथा लोकतंत्र में समान भागीदारी सुनिश्चित होती है।

(i) महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता है।

(ii) समान अवसर प्राप्त होते हैं।

(iii) महिलाओं के मुद्दों को महत्व मिलता है।

(iv) लोकतंत्र मजबूत होता है।

(v) नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।

14. नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 क्या है?

उत्तर ⇒ नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इस अधिनियम के अनुसार लोकसभा, राज्य विधानसभाओं एवं दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य महिलाओं को राजनीति में समान अवसर देना तथा लोकतंत्र में उनकी भागीदारी को मजबूत बनाना है।

(i) 2023 में पारित किया गया।

(ii) महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान है।

(iii) लोकसभा एवं विधानसभाओं पर लागू होगा।

(iv) महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी।

(v) लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी।

15. भारत सरकार द्वारा लैंगिक असमानता दूर करने के लिए उठाए गए प्रमुख कदम लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत सरकार ने महिलाओं की स्थिति सुधारने एवं लैंगिक असमानता समाप्त करने के लिए अनेक कानूनी एवं सामाजिक कदम उठाए हैं। दहेज प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया, महिलाओं को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिए गए, कन्या भ्रूण हत्या को अपराध घोषित किया गया तथा समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान किया गया। इसके अतिरिक्त बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला शिक्षा एवं सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

(i) दहेज प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया।

(ii) संपत्ति में महिलाओं को समान अधिकार मिले।

(iii) कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई गई।

(iv) समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान किया गया।

(v) महिला शिक्षा एवं सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया गया।

16. पारिवारिक कानून (Family Laws) क्या हैं?

उत्तर ⇒ पारिवारिक कानून वे कानून हैं जो परिवार से जुड़े विषयों, जैसे विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार एवं संपत्ति के बँटवारे से संबंधित होते हैं। भारत में विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए अलग-अलग पारिवारिक कानून लागू हैं। इन कानूनों का उद्देश्य परिवार से जुड़े मामलों का न्यायपूर्ण समाधान करना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। समय-समय पर इन कानूनों में सुधार भी किए जाते हैं ताकि महिलाओं एवं पुरुषों को समान अधिकार मिल सकें।

(i) विवाह एवं तलाक से संबंधित होते हैं।

(ii) गोद लेने एवं उत्तराधिकार का प्रावधान करते हैं।

(iii) विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग कानून हैं।

(iv) परिवार से जुड़े विवादों का समाधान करते हैं।

(v) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।

17. धार्मिक विभाजन (Religious Differences) क्या है?

उत्तर ⇒ जब समाज में लोगों के बीच धर्म के आधार पर अंतर पाया जाता है, तो उसे धार्मिक विभाजन कहा जाता है। विभिन्न देशों में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं, जिनकी धार्मिक मान्यताएँ, पूजा-पद्धतियाँ एवं परंपराएँ भिन्न होती हैं। भारत जैसे देश में अनेक धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। धार्मिक विविधता समाज की विशेषता है, लेकिन यदि इसका दुरुपयोग किया जाए तो यह सामाजिक तनाव का कारण भी बन सकती है।

(i) धर्म के आधार पर भिन्नता होती है।

(ii) अलग-अलग धार्मिक मान्यताएँ होती हैं।

(iii) भारत धार्मिक विविधता वाला देश है।

(iv) धार्मिक सहिष्णुता आवश्यक है।

(v) धार्मिक भेदभाव समाज के लिए हानिकारक है।

18. धार्मिक मतभेद क्यों उत्पन्न होते हैं?

उत्तर ⇒ धार्मिक मतभेद अलग-अलग धर्मों की मान्यताओं, पूजा-पद्धतियों एवं परंपराओं के कारण उत्पन्न हो सकते हैं। कई बार एक ही धर्म के भीतर भी विभिन्न विचारधाराओं एवं रीति-रिवाजों के कारण मतभेद देखने को मिलते हैं। जब इन मतभेदों को आपसी सम्मान एवं सहिष्णुता के साथ नहीं सुलझाया जाता, तब सामाजिक तनाव एवं संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

(i) अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के कारण।

(ii) पूजा-पद्धतियों में अंतर के कारण।

(iii) एक ही धर्म में विभिन्न विचारधाराएँ हो सकती हैं।

(iv) सहिष्णुता की कमी से विवाद बढ़ते हैं।

(v) सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।

19. महात्मा गांधी ने धर्म और राजनीति के संबंध में क्या विचार व्यक्त किए?

उत्तर ⇒ महात्मा गांधी का मानना था कि धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके अनुसार धर्म का अर्थ किसी विशेष धर्म से नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, न्याय एवं नैतिक मूल्यों से था। उनका विश्वास था कि राजनीति का संचालन नैतिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। यदि राजनीति नैतिकता से अलग हो जाए, तो समाज में अन्याय एवं भ्रष्टाचार बढ़ सकता है।

(i) धर्म का अर्थ नैतिक मूल्यों से था।

(ii) राजनीति में सत्य एवं अहिंसा का महत्व बताया।

(iii) न्यायपूर्ण शासन का समर्थन किया।

(iv) भ्रष्टाचार का विरोध किया।

(v) नैतिक राजनीति पर बल दिया।

20. सांप्रदायिकता (Communalism) क्या है?

उत्तर ⇒ सांप्रदायिकता वह विचारधारा है जिसमें धर्म को राजनीति से इस प्रकार जोड़ा जाता है कि एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ माना जाए तथा किसी विशेष धार्मिक समुदाय के हितों को सर्वोपरि रखा जाए। इससे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच अविश्वास, तनाव एवं संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। सांप्रदायिकता लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती है।

(i) धर्म को राजनीति से जोड़ा जाता है।

(ii) एक धर्म को श्रेष्ठ माना जाता है।

(iii) धार्मिक तनाव उत्पन्न होता है।

(iv) राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है।

(v) लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।

21. सांप्रदायिकता की समस्या कब उत्पन्न होती है?

उत्तर ⇒ सांप्रदायिकता की समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई धार्मिक समुदाय स्वयं को अन्य समुदायों से श्रेष्ठ मानने लगता है तथा अपने हितों को सर्वोपरि रखकर दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा करता है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब राज्य किसी एक धर्म का पक्ष लेने लगे या धर्म के आधार पर राजनीति की जाने लगे। इससे समाज में तनाव, हिंसा एवं आपसी अविश्वास बढ़ता है।

(i) एक धर्म को श्रेष्ठ माना जाता है।

(ii) दूसरे धर्मों के अधिकारों की उपेक्षा होती है।

(iii) धर्म के आधार पर राजनीति की जाती है।

(iv) सामाजिक तनाव एवं हिंसा बढ़ती है।

(v) राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है।

22. सांप्रदायिक सोच की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ सांप्रदायिक सोच इस मान्यता पर आधारित होती है कि एक ही धर्म के लोगों के हित एवं विचार समान होते हैं तथा अलग-अलग धर्मों के लोगों के हित परस्पर विरोधी होते हैं। चरम स्थिति में यह विचारधारा यह मानती है कि विभिन्न धर्मों के लोग एक राष्ट्र में साथ नहीं रह सकते। वास्तव में यह सोच लोकतंत्र एवं सामाजिक सद्भाव के विरुद्ध है।

(i) धर्म को ही सामाजिक पहचान माना जाता है।

(ii) एक धर्म के लोगों के हित समान माने जाते हैं।

(iii) विभिन्न धर्मों के हितों को परस्पर विरोधी माना जाता है।

(iv) सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिलता है।

(v) लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।

23. सांप्रदायिक सोच गलत क्यों मानी जाती है?

उत्तर ⇒ सांप्रदायिक सोच गलत मानी जाती है क्योंकि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके धर्म से नहीं होती। एक ही धर्म के लोगों के विचार, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति एवं सामाजिक आवश्यकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं। प्रत्येक नागरिक की अनेक पहचानें होती हैं, जैसे भाषा, जाति, पेशा एवं क्षेत्र। इसलिए केवल धर्म के आधार पर लोगों को एक समान मानना उचित नहीं है।

(i) व्यक्ति की अनेक पहचानें होती हैं।

(ii) एक धर्म के लोगों के विचार अलग हो सकते हैं।

(iii) धर्म ही एकमात्र पहचान नहीं है।

(iv) समान नागरिक अधिकार आवश्यक हैं।

(v) विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।

24. राजनीति में सांप्रदायिकता के प्रमुख रूप लिखिए।

उत्तर ⇒ राजनीति में सांप्रदायिकता कई रूपों में दिखाई देती है। चुनावों में धर्म के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करना, धार्मिक भावनाओं को भड़काकर वोट माँगना, धार्मिक प्रतीकों एवं धर्मगुरुओं का उपयोग करना तथा किसी विशेष धार्मिक समुदाय के हितों को अन्य समुदायों के विरुद्ध प्रस्तुत करना सांप्रदायिक राजनीति के प्रमुख रूप हैं। इससे लोकतंत्र एवं सामाजिक सद्भाव दोनों प्रभावित होते हैं।

(i) धर्म के आधार पर उम्मीदवारों का चयन।

(ii) धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उपयोग।

(iii) धर्म के नाम पर वोट माँगना।

(iv) धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग।

(v) धार्मिक तनाव उत्पन्न करना।

25. सांप्रदायिकता को दूर करने के प्रमुख उपाय लिखिए।

उत्तर ⇒ सांप्रदायिकता को समाप्त करने के लिए सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार, धर्मनिरपेक्ष शासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा सामाजिक जागरूकता आवश्यक है। सरकार को सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करनी चाहिए तथा राजनीति में धर्म के दुरुपयोग को रोकना चाहिए। सभी समुदायों के बीच संवाद, सहयोग एवं भाईचारे की भावना विकसित करना भी अत्यंत आवश्यक है।

(i) सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार किया जाए।

(ii) धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया जाए।

(iii) शिक्षा एवं जागरूकता का प्रसार किया जाए।

(iv) सांप्रदायिक हिंसा पर कठोर कार्रवाई हो।

(v) सभी समुदायों में भाईचारा बढ़ाया जाए।

26. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) क्या है?

उत्तर ⇒ धर्मनिरपेक्षता वह व्यवस्था है जिसमें राज्य किसी भी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता तथा सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है। इस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने एवं उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता होती है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का उद्देश्य सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार एवं समान संरक्षण प्रदान करना होता है। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है।

(i) राज्य किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।

(ii) सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार किया जाता है।

(iii) धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।

(iv) सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं।

(v) भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करता है।

27. भारत में धर्मनिरपेक्षता की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार नहीं किया है। संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन, प्रचार एवं प्रसार करने की स्वतंत्रता देता है। धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव प्रतिबंधित है। आवश्यकता पड़ने पर राज्य सामाजिक समानता एवं न्याय सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है।

(i) भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है।

(ii) सभी धर्मों को समान सम्मान दिया जाता है।

(iii) धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है।

(iv) धर्म के आधार पर भेदभाव निषिद्ध है।

(v) राज्य सामाजिक सुधार हेतु हस्तक्षेप कर सकता है।

28. वर्ण व्यवस्था (Varna System) क्या है?

उत्तर ⇒ वर्ण व्यवस्था वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समाज को विभिन्न वर्गों में बाँटा गया तथा प्रत्येक वर्ग का सामाजिक स्थान एवं कार्य निर्धारित किया गया। इस व्यवस्था में कुछ वर्गों को उच्च तथा कुछ को निम्न माना गया। समय के साथ यह व्यवस्था कठोर होती गई और सामाजिक असमानता का कारण बनी। आधुनिक भारत में संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है तथा वर्ण आधारित भेदभाव का विरोध करता है।

(i) समाज को विभिन्न वर्गों में बाँटा गया।

(ii) ऊँच-नीच की भावना विकसित हुई।

(iii) सामाजिक असमानता बढ़ी।

(iv) जन्म के आधार पर सामाजिक स्थिति निर्धारित होती थी।

(v) संविधान समानता का समर्थन करता है।

29. जाति व्यवस्था (Caste System) क्या है?

उत्तर ⇒ जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति की जाति, सामाजिक स्थिति एवं पारंपरिक पेशा जन्म से ही निर्धारित माना जाता है। इस व्यवस्था में विवाह, खान-पान एवं सामाजिक संबंध भी प्रायः अपनी जाति के भीतर ही सीमित रहते थे। आधुनिक भारत में संविधान ने जातिगत भेदभाव को अवैध घोषित किया है तथा सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए हैं।

(i) जन्म आधारित सामाजिक व्यवस्था है।

(ii) पारंपरिक पेशा वंशानुगत होता है।

(iii) अपनी जाति में विवाह की परंपरा रही है।

(iv) सामाजिक ऊँच-नीच की भावना विकसित हुई।

(v) संविधान ने जातिगत भेदभाव को अवैध घोषित किया है।

30. जाति व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सामाजिक पहचान जन्म से निर्धारित होती है। प्रत्येक जाति का अपना पारंपरिक व्यवसाय होता है तथा विवाह एवं सामाजिक संबंध अपनी जाति के भीतर ही बनाए जाते हैं। इस व्यवस्था में ऊँच-नीच की भावना विकसित हो गई, जिसके कारण सामाजिक असमानता एवं भेदभाव बढ़ा। आधुनिक समय में शिक्षा, शहरीकरण एवं संवैधानिक प्रावधानों के कारण इस व्यवस्था में काफी परिवर्तन आया है।

(i) जन्म के आधार पर जाति निर्धारित होती है।

(ii) पेशा प्रायः वंशानुगत होता है।

(iii) अपनी जाति में विवाह किया जाता है।

(iv) सामाजिक ऊँच-नीच की भावना रहती है।

(v) आधुनिक समय में इसमें परिवर्तन आया है।

31. आधुनिक भारत में जाति व्यवस्था में क्या परिवर्तन आए हैं?

उत्तर ⇒ पिछले लगभग सौ वर्षों में भारत में जाति व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, शहरीकरण एवं शिक्षा के प्रसार के कारण लोगों को अपनी पसंद का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता मिली है। संविधान ने जातिगत भेदभाव एवं छुआछूत को अवैध घोषित किया है। इसके बावजूद आज भी अनेक लोग अपनी जाति में विवाह करना पसंद करते हैं तथा सामाजिक एवं आर्थिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

(i) शिक्षा एवं शहरीकरण से बदलाव आया।

(ii) पेशा चुनने की स्वतंत्रता बढ़ी।

(iii) जातिगत भेदभाव कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।

(iv) अपनी जाति में विवाह की परंपरा अभी भी प्रचलित है।

(v) सामाजिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

32. वर्तमान समय में जाति व्यवस्था के कौन-कौन से पहलू अभी भी दिखाई देते हैं?

उत्तर ⇒ आधुनिक भारत में जाति व्यवस्था पहले की अपेक्षा कमजोर हुई है, फिर भी इसके कई प्रभाव आज भी दिखाई देते हैं। अधिकांश लोग अपनी जाति में ही विवाह करते हैं। कुछ स्थानों पर छुआछूत एवं सामाजिक भेदभाव अभी भी मौजूद है। आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति पर भी जाति का प्रभाव देखा जाता है। इसलिए समानता स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

(i) अपनी जाति में विवाह की परंपरा बनी हुई है।

(ii) कुछ स्थानों पर छुआछूत अभी भी मौजूद है।

(iii) सामाजिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

(iv) आर्थिक स्थिति पर जाति का प्रभाव देखा जाता है।

(v) समानता के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

33. राजनीति में जाति की भूमिका कैसे दिखाई देती है?

उत्तर ⇒ भारत की राजनीति में जाति का प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई देता है। राजनीतिक दल चुनाव क्षेत्र की जातीय संरचना को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन करते हैं। सरकार बनने के बाद विभिन्न जातियों एवं समुदायों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाता है। चुनाव प्रचार के दौरान भी कई बार जातिगत समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।

(i) उम्मीदवारों का चयन जातीय समीकरण देखकर किया जाता है।

(ii) विभिन्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास होता है।

(iii) चुनाव प्रचार में जाति का प्रभाव देखा जाता है।

(iv) सरकार में संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

(v) जाति राजनीति का एक महत्वपूर्ण तत्व है।

34. क्या चुनाव केवल जाति के आधार पर जीते जाते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ नहीं, चुनाव केवल जाति के आधार पर नहीं जीते जाते। किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में एक ही जाति का पूर्ण बहुमत बहुत कम होता है। मतदाता उम्मीदवार की लोकप्रियता, राजनीतिक दल की नीतियों, सरकार के कार्यों, विकास एवं अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को भी ध्यान में रखते हैं। इसलिए चुनाव परिणाम अनेक सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक कारकों से प्रभावित होते हैं।

(i) केवल जाति चुनाव का आधार नहीं होती।

(ii) उम्मीदवार की लोकप्रियता भी महत्वपूर्ण होती है।

(iii) राजनीतिक दल की नीतियाँ प्रभाव डालती हैं।

(iv) विकास एवं शासन का प्रभाव पड़ता है।

(v) मतदाता कई आधारों पर निर्णय लेते हैं।

35. राजनीति का जाति व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर ⇒ राजनीति ने जाति व्यवस्था को अनेक प्रकार से प्रभावित किया है। विभिन्न जातियाँ अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए अन्य जातियों के साथ गठबंधन करती हैं। इससे नई सामाजिक एवं राजनीतिक पहचान विकसित होती है। लोकतंत्र एवं सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के कारण पिछड़े एवं वंचित वर्गों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है तथा उन्हें शासन में अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ है।

(i) जातियों के बीच नए गठबंधन बनते हैं।

(ii) पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है।

(iii) लोकतांत्रिक जागरूकता विकसित हुई है।

(iv) सामाजिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि हुई है।

(v) नई राजनीतिक पहचान विकसित हुई है.

36. जातिगत राजनीति के सकारात्मक प्रभाव लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत में जातिगत राजनीति के कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिले हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण दलित, पिछड़े एवं अन्य वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ है। इन वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है तथा सामाजिक न्याय एवं समान अवसरों की माँग को बल मिला है। जातिगत राजनीति ने अनेक कमजोर वर्गों को शासन एवं निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर प्रदान किया है।

(i) वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला।

(ii) सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिला।

(iii) पिछड़े वर्गों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।

(iv) समान अधिकारों की माँग मजबूत हुई।

(v) लोकतंत्र अधिक समावेशी बना।

37. जातिगत राजनीति के नकारात्मक प्रभाव लिखिए।

उत्तर ⇒ जब राजनीति में केवल जाति को ही सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, तो लोकतंत्र प्रभावित होता है। विकास, शिक्षा, रोजगार एवं भ्रष्टाचार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। जातिवाद सामाजिक तनाव एवं आपसी संघर्ष को बढ़ावा देता है तथा समाज में विभाजन की भावना उत्पन्न करता है। इसलिए लोकतंत्र में जाति के साथ-साथ विकास एवं जनहित के मुद्दों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

(i) सामाजिक तनाव बढ़ता है।

(ii) विकास के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

(iii) जातीय विभाजन बढ़ता है।

(iv) लोकतंत्र प्रभावित होता है।

(v) आपसी सहयोग की भावना कमजोर होती है।

38. लोकतंत्र में जाति, धर्म एवं लैंगिक समानता का क्या महत्व है?

उत्तर ⇒ लोकतंत्र का आधार समानता, स्वतंत्रता एवं न्याय है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को जाति, धर्म एवं लिंग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार एवं अवसर मिलने चाहिए। जब सभी वर्गों को शिक्षा, रोजगार, राजनीति एवं सामाजिक जीवन में समान भागीदारी मिलती है, तब लोकतंत्र अधिक मजबूत एवं सफल बनता है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक पहचान है।

(i) सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलते हैं।

(ii) सामाजिक न्याय स्थापित होता है।

(iii) लोकतंत्र मजबूत होता है।

(iv) भेदभाव कम होता है।

(v) राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है।

39. ‘जाति, धर्म और लैंगिक मसले’ अध्याय से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर ⇒ यह अध्याय हमें सिखाता है कि समाज में किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म अथवा लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। सभी नागरिकों को समान अवसर, सम्मान एवं अधिकार मिलना लोकतंत्र की मूल भावना है। सामाजिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता एवं लैंगिक न्याय के माध्यम से ही एक सशक्त एवं समावेशी समाज का निर्माण किया जा सकता है।

(i) सभी नागरिक समान हैं।

(ii) जाति एवं धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

(iii) महिलाओं को समान अधिकार मिलने चाहिए।

(iv) सामाजिक न्याय लोकतंत्र की आधारशिला है।

(v) विविधता में एकता बनाए रखना आवश्यक है।

More Class 10 Civics Revision Notes

Chapter 1: सत्ता की साझेदारी
Chapter 2: संघवाद
Chapter 3: लोकतंत्र और विविधता
Chapter 4: जाति, धर्म और लैंगिक मसले
Chapter 5: जन-संघर्ष और आंदोलन
Chapter 6: राजनीतिक दल
Chapter 7: लोकतंत्र के परिणाम
Chapter 8: लोकतंत्र की चुनौतियाँ

Class 10 Notes by Subject

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