Class 10 Economics: मुद्रा और साख
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Chapter Overview
| Class | 10 |
| Subject | Economics |
| Chapter Name | मुद्रा और साख |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
मुद्रा और साख Revision Notes
1. मुद्रा (Money) क्या है?
उत्तर ⇒ मुद्रा वह माध्यम है जिसका उपयोग वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय-विक्रय तथा लेन-देन के लिए किया जाता है। यह विनिमय प्रक्रिया में मध्यवर्ती (Medium of Exchange) का कार्य करती है। मुद्रा के कारण लोगों को वस्तुओं का सीधे वस्तुओं से विनिमय नहीं करना पड़ता। आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा व्यापार, बचत एवं आर्थिक विकास का आधार मानी जाती है।
(i) विनिमय का माध्यम है।
(ii) वस्तुओं एवं सेवाओं के लेन-देन में उपयोग होती है।
(iii) व्यापार को सरल बनाती है।
(iv) आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार है।
(v) आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है।
2. मुद्रा को विनिमय का माध्यम क्यों कहा जाता है?
उत्तर ⇒ मुद्रा वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय-विक्रय में मध्यवर्ती का कार्य करती है। लोग किसी वस्तु के बदले दूसरी वस्तु देने के बजाय मुद्रा का भुगतान करते हैं और उसी मुद्रा से अपनी आवश्यक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। इससे लेन-देन सरल एवं सुविधाजनक हो जाता है। इसलिए मुद्रा को विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange) कहा जाता है।
(i) लेन-देन को सरल बनाती है।
(ii) वस्तु विनिमय की आवश्यकता समाप्त करती है।
(iii) सभी लोग इसे स्वीकार करते हैं।
(iv) वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद आसान होती है।
(v) आर्थिक गतिविधियाँ सुचारु रहती हैं।
3. रोज़मर्रा के जीवन में मुद्रा का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒ मुद्रा हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। इसके माध्यम से हम भोजन, कपड़े, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी के बिल, मोबाइल रिचार्ज तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं का भुगतान करते हैं। मजदूरी, वेतन एवं व्यापारिक लेन-देन भी मुद्रा के माध्यम से किए जाते हैं। इसलिए आधुनिक जीवन में मुद्रा का अत्यधिक महत्व है।
(i) वस्तुओं की खरीद में उपयोग होती है।
(ii) सेवाओं का भुगतान किया जाता है।
(iii) वेतन एवं मजदूरी प्राप्त होती है।
(iv) व्यापारिक लेन-देन आसान होते हैं।
(v) दैनिक जीवन को सुगम बनाती है।
4. वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) क्या है?
उत्तर ⇒ वस्तु विनिमय प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान सीधे वस्तुओं एवं सेवाओं के बदले किया जाता है। इसमें मुद्रा का उपयोग नहीं होता। यह प्राचीन समय की प्रमुख विनिमय प्रणाली थी, लेकिन इसकी अनेक कठिनाइयों के कारण बाद में मुद्रा का प्रचलन हुआ।
(i) वस्तुओं के बदले वस्तुओं का विनिमय होता है।
(ii) मुद्रा का उपयोग नहीं होता।
(iii) यह प्राचीन विनिमय प्रणाली है।
(iv) प्रत्यक्ष आदान-प्रदान पर आधारित है।
(v) आधुनिक समय में इसका उपयोग बहुत कम है।
5. वस्तु विनिमय प्रणाली की प्रमुख सीमाएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ वस्तु विनिमय प्रणाली में अनेक कठिनाइयाँ थीं। इसमें आवश्यकताओं का दोहरा संयोग होना आवश्यक था, वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करना कठिन था तथा धन का संचय एवं बड़ी वस्तुओं का विभाजन भी आसान नहीं था। इन समस्याओं के कारण वस्तु विनिमय प्रणाली के स्थान पर मुद्रा प्रणाली का विकास हुआ।
(i) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या।
(ii) मूल्य निर्धारण में कठिनाई।
(iii) धन का संचय कठिन।
(iv) अविभाज्य वस्तुओं का विनिमय कठिन।
(v) वस्तुओं का लंबे समय तक भंडारण कठिन।
6. आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (Double Coincidence of Wants) क्या है?
उत्तर ⇒ जब वस्तु विनिमय प्रणाली में लेन-देन करने वाले दोनों व्यक्तियों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता होती है, तो इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक मोची को गेहूँ चाहिए और किसान को जूते चाहिए, तभी दोनों के बीच वस्तुओं का विनिमय संभव होगा। यही वस्तु विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कठिनाई थी।
(i) दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु चाहिए होती है।
(ii) यह वस्तु विनिमय प्रणाली की विशेषता है।
(iii) लेन-देन के लिए आवश्यक शर्त है।
(iv) ऐसी स्थिति का मिलना कठिन होता है।
(v) मुद्रा ने इस समस्या का समाधान किया।
7. मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या का समाधान कैसे करती है?
उत्तर ⇒ मुद्रा के उपयोग से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। अब विक्रेता अपनी वस्तु बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और उसी मुद्रा से अपनी आवश्यकता की कोई भी वस्तु किसी अन्य व्यक्ति से खरीद सकता है। उसे यह देखने की आवश्यकता नहीं रहती कि सामने वाले व्यक्ति को उसकी वस्तु चाहिए या नहीं। इससे लेन-देन सरल एवं तेज हो जाता है।
(i) दोहरे संयोग की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
(ii) वस्तु बेचकर मुद्रा प्राप्त की जाती है।
(iii) मुद्रा से कहीं भी वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं।
(iv) व्यापार आसान हो जाता है।
(v) समय एवं श्रम की बचत होती है।
8. मुद्रा के प्रमुख लाभ लिखिए।
उत्तर ⇒ मुद्रा ने आर्थिक गतिविधियों को अत्यंत सरल एवं प्रभावी बना दिया है। इसके माध्यम से वस्तुओं एवं सेवाओं का क्रय-विक्रय आसान हो गया है। मुद्रा मूल्य का सामान्य माप प्रदान करती है, भविष्य के लिए धन संचय करने में सहायता करती है तथा व्यापार एवं आर्थिक विकास को गति देती है।
(i) विनिमय प्रक्रिया सरल बनाती है।
(ii) दोहरे संयोग की समस्या समाप्त करती है।
(iii) मूल्य का सामान्य माप प्रदान करती है।
(iv) धन का संचय संभव बनाती है।
(v) व्यापार एवं आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है।
9. मुद्रा के आधुनिक रूप (Modern Forms of Money) लिखिए।
उत्तर ⇒ वर्तमान समय में मुद्रा केवल कागज़ के नोट एवं सिक्कों तक सीमित नहीं है। बैंकिंग एवं डिजिटल तकनीक के विकास के कारण बैंक जमा, चेक, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, UPI, मोबाइल बैंकिंग एवं नेट बैंकिंग भी आधुनिक मुद्रा के महत्वपूर्ण रूप बन चुके हैं।
(i) कागज़ के नोट।
(ii) सिक्के।
(iii) बैंक जमा एवं चेक।
(iv) डेबिट एवं क्रेडिट कार्ड।
(v) UPI एवं डिजिटल भुगतान।
10. करेंसी (Currency) क्या है?
उत्तर ⇒ करेंसी वह वैध मुद्रा है जिसका उपयोग वस्तुओं एवं सेवाओं के भुगतान के लिए किया जाता है। इसमें कागज़ के नोट एवं सिक्के शामिल होते हैं। भारत में करेंसी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा केंद्र सरकार की ओर से जारी की जाती है तथा पूरे देश में इसे कानूनी रूप से स्वीकार किया जाता है।
(i) इसमें नोट एवं सिक्के शामिल होते हैं।
(ii) यह वैध मुद्रा होती है।
(iii) लेन-देन का प्रमुख माध्यम है।
(iv) भारत में RBI द्वारा जारी की जाती है।
(v) पूरे देश में स्वीकार की जाती है।
11. आधुनिक मुद्रा का स्वयं का कोई आंतरिक मूल्य क्यों नहीं होता?
उत्तर ⇒ आधुनिक मुद्रा, जैसे कागज़ के नोट एवं सिक्कों का स्वयं का कोई विशेष आंतरिक मूल्य नहीं होता। फिर भी लोग इन्हें स्वीकार करते हैं क्योंकि इन्हें सरकार की गारंटी एवं कानूनी मान्यता (Legal Tender) प्राप्त होती है। लोगों का सरकार एवं भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) पर विश्वास ही मुद्रा को मूल्यवान बनाता है।
(i) स्वयं का आंतरिक मूल्य नहीं होता।
(ii) सरकार की गारंटी प्राप्त होती है।
(iii) कानूनी मान्यता प्राप्त होती है।
(iv) लोग विश्वास के आधार पर स्वीकार करते हैं।
(v) RBI द्वारा जारी की जाती है।
12. लोग आधुनिक करेंसी को क्यों स्वीकार करते हैं?
उत्तर ⇒ लोग आधुनिक करेंसी को इसलिए स्वीकार करते हैं क्योंकि इसे सरकार द्वारा वैध मुद्रा (Legal Tender) घोषित किया गया है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) एवं केंद्र सरकार इसकी गारंटी देते हैं। इसलिए वस्तुओं एवं सेवाओं के भुगतान के लिए पूरे देश में इसे स्वीकार किया जाता है तथा लोगों को इसके मूल्य पर विश्वास होता है।
(i) सरकार की गारंटी होती है।
(ii) वैध मुद्रा घोषित की गई है।
(iii) RBI द्वारा जारी की जाती है।
(iv) पूरे देश में स्वीकार की जाती है।
(v) लोगों का विश्वास बना रहता है।
13. भारत में करेंसी कौन जारी करता है?
उत्तर ⇒ भारत में करेंसी नोट भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा केंद्र सरकार की ओर से जारी किए जाते हैं। RBI देश की मुद्रा व्यवस्था को नियंत्रित करता है तथा अर्थव्यवस्था में मुद्रा की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। भारतीय कानून के अनुसार मुद्रा जारी करने का अधिकार केवल RBI को प्राप्त है।
(i) भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) जारी करता है।
(ii) केंद्र सरकार की ओर से जारी करता है।
(iii) मुद्रा व्यवस्था को नियंत्रित करता है।
(iv) अर्थव्यवस्था में मुद्रा का प्रवाह सुनिश्चित करता है।
(v) केवल RBI को मुद्रा जारी करने का अधिकार है।
14. वैध मुद्रा (Legal Tender) क्या है?
उत्तर ⇒ वैध मुद्रा (Legal Tender) वह मुद्रा होती है जिसे सरकार द्वारा कानूनी रूप से भुगतान के माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया हो। भारत में रुपया वैध मुद्रा है। कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से रुपये में किए गए भुगतान को अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए रुपये का पूरे देश में स्वतंत्र रूप से उपयोग किया जाता है।
(i) सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मुद्रा होती है।
(ii) भुगतान का कानूनी माध्यम है।
(iii) भारत में रुपया वैध मुद्रा है।
(iv) पूरे देश में स्वीकार की जाती है।
(v) कानूनी रूप से भुगतान से इनकार नहीं किया जा सकता।
15. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर ⇒ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है। यह देश में मुद्रा जारी करता है, बैंकों की कार्यप्रणाली की निगरानी करता है तथा ऋण एवं ब्याज दरों को नियंत्रित करता है। इसके अतिरिक्त RBI अर्थव्यवस्था में मुद्रा एवं साख के प्रवाह को संतुलित बनाए रखने का कार्य भी करता है।
(i) मुद्रा जारी करता है।
(ii) बैंकों की निगरानी एवं नियंत्रण करता है।
(iii) ऋण एवं ब्याज दरों को प्रभावित करता है।
(iv) बैंकों के नकद भंडार की निगरानी करता है।
(v) अर्थव्यवस्था में साख एवं मुद्रा का प्रवाह नियंत्रित करता है।
16. बैंकों में निक्षेप (Deposits) क्या हैं?
उत्तर ⇒ बैंकों में निक्षेप वह धनराशि है जिसे लोग सुरक्षा एवं भविष्य की आवश्यकताओं के लिए बैंक में जमा करते हैं। बैंक इस जमा राशि पर ब्याज देते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर खाताधारक अपने धन को निकाल सकते हैं। बैंक में जमा धन अर्थव्यवस्था में बचत एवं निवेश को बढ़ावा देता है।
(i) लोग अपना अतिरिक्त धन बैंक में जमा करते हैं।
(ii) बैंक जमा राशि पर ब्याज देते हैं।
(iii) आवश्यकता पड़ने पर धन निकाला जा सकता है।
(iv) धन सुरक्षित रहता है।
(v) बचत एवं निवेश को बढ़ावा मिलता है।
17. लोग बैंक में धन क्यों जमा करते हैं?
उत्तर ⇒ लोग अपने धन की सुरक्षा, ब्याज प्राप्त करने तथा आवश्यकता पड़ने पर आसानी से धन निकालने की सुविधा के लिए बैंक में पैसा जमा करते हैं। घर पर नकद रखने की अपेक्षा बैंक अधिक सुरक्षित होते हैं। इसके अतिरिक्त बैंक खाते के माध्यम से भुगतान एवं अन्य बैंकिंग सुविधाओं का लाभ भी मिलता है।
(i) धन सुरक्षित रहता है।
(ii) जमा राशि पर ब्याज मिलता है।
(iii) आवश्यकता पड़ने पर धन निकाला जा सकता है।
(iv) भुगतान करना आसान होता है।
(v) बैंकिंग सुविधाओं का लाभ मिलता है।
18. माँग जमा (Demand Deposit) क्या है?
उत्तर ⇒ बैंक खाते में जमा वह धन जिसे खाताधारक अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी समय निकाल सकता है, माँग जमा (Demand Deposit) कहलाता है। बचत खाता एवं चालू खाता इसके प्रमुख उदाहरण हैं। माँग जमा आधुनिक मुद्रा का एक महत्वपूर्ण रूप है क्योंकि इसका उपयोग भुगतान के साधन के रूप में भी किया जाता है।
(i) कभी भी निकाला जा सकता है।
(ii) बचत एवं चालू खाते में रखा जाता है।
(iii) भुगतान के लिए उपयोग किया जाता है।
(iv) आधुनिक मुद्रा का रूप है।
(v) बैंकिंग व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है।
19. माँग जमा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ माँग जमा ऐसी जमा राशि होती है जिसे खाताधारक अपनी आवश्यकता के अनुसार कभी भी निकाल सकता है। इसका उपयोग चेक, डेबिट कार्ड, UPI एवं अन्य बैंकिंग माध्यमों से भुगतान करने में किया जाता है। इसलिए यह आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा का महत्वपूर्ण रूप माना जाता है।
(i) धन कभी भी निकाला जा सकता है।
(ii) भुगतान के साधन के रूप में उपयोग होता है।
(iii) बैंक खाते में सुरक्षित रहता है।
(iv) आधुनिक मुद्रा का महत्वपूर्ण रूप है।
(v) लेन-देन को आसान बनाता है।
20. चेक (Cheque) क्या है?
उत्तर ⇒ चेक एक लिखित आदेश है जिसके द्वारा खाताधारक अपने बैंक को निर्देश देता है कि उसके खाते से चेक पर लिखे गए व्यक्ति को निश्चित राशि का भुगतान किया जाए। चेक के माध्यम से बिना नकद ले जाए सुरक्षित एवं सुविधाजनक भुगतान किया जा सकता है। यह बैंकिंग प्रणाली का एक महत्वपूर्ण भुगतान साधन है।
(i) बैंक को दिया गया लिखित आदेश होता है।
(ii) खाताधारक के खाते से भुगतान किया जाता है।
(iii) नकद ले जाने की आवश्यकता नहीं होती।
(iv) सुरक्षित एवं सुविधाजनक भुगतान का माध्यम है।
(v) बैंकिंग प्रणाली का महत्वपूर्ण साधन है।
21. चेक की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ चेक बैंक द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक सुरक्षित भुगतान माध्यम है। इसके माध्यम से खाताधारक बिना नकद धन ले जाए किसी अन्य व्यक्ति को भुगतान कर सकता है। चेक के उपयोग से बड़ी राशि का लेन-देन सुरक्षित एवं सुविधाजनक हो जाता है तथा भुगतान सीधे बैंक खाते से किया जाता है।
(i) नकद ले जाने की आवश्यकता नहीं होती।
(ii) सुरक्षित भुगतान का माध्यम है।
(iii) बैंक खाते से सीधे भुगतान होता है।
(iv) बड़ी राशि के लेन-देन में उपयोगी है।
(v) सुविधाजनक एवं विश्वसनीय है।
22. बैंक जमा राशि का उपयोग कैसे करते हैं?
उत्तर ⇒ बैंक लोगों द्वारा जमा की गई राशि का केवल एक छोटा भाग नकद भंडार (Cash Reserve) के रूप में रखते हैं। शेष राशि को वे विभिन्न व्यक्तियों एवं संस्थाओं को ऋण के रूप में देते हैं। इससे बैंक को आय होती है तथा अर्थव्यवस्था में निवेश एवं उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।
(i) थोड़ा भाग नकद भंडार के रूप में रखते हैं।
(ii) शेष राशि ऋण के रूप में देते हैं।
(iii) निवेश एवं उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।
(iv) बैंक की आय बढ़ती है।
(v) अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह बढ़ता है।
23. बैंक जमाकर्ताओं एवं ऋण लेने वालों के बीच मध्यस्थ कैसे होते हैं?
उत्तर ⇒ बैंक उन लोगों से धन जमा के रूप में स्वीकार करते हैं जिनके पास अतिरिक्त धन होता है तथा उसी धन को ऋण के रूप में उन लोगों को देते हैं जिन्हें धन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार बैंक जमाकर्ताओं एवं ऋण लेने वालों के बीच मध्यस्थ (Mediator) का कार्य करते हैं तथा अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह को बनाए रखते हैं।
(i) लोगों से धन जमा करते हैं।
(ii) आवश्यकता वाले लोगों को ऋण देते हैं।
(iii) धन के प्रवाह को बनाए रखते हैं।
(iv) बचत एवं निवेश को बढ़ावा देते हैं।
(v) अर्थव्यवस्था के विकास में सहायता करते हैं।
24. बैंक की आय का प्रमुख स्रोत क्या है?
उत्तर ⇒ बैंक जमा राशि पर ग्राहकों को अपेक्षाकृत कम ब्याज देते हैं तथा ऋण पर अधिक ब्याज वसूलते हैं। जमा पर दिए गए ब्याज एवं ऋण पर लिए गए ब्याज के बीच का अंतर ही बैंक की आय का प्रमुख स्रोत होता है। इसे ब्याज का अंतर (Interest Spread) भी कहा जाता है।
(i) ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं।
(ii) जमा पर कम ब्याज देते हैं।
(iii) दोनों के अंतर से आय प्राप्त होती है।
(iv) यही बैंक की मुख्य कमाई है।
(v) बैंकिंग व्यवस्था इसी पर आधारित है।
25. ऋण (Loan/Credit) क्या है?
उत्तर ⇒ ऋण वह व्यवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति, संस्था या व्यवसाय अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति या संस्था से धन उधार लेता है तथा उसे भविष्य में ब्याज सहित वापस करने का वचन देता है। ऋण का उपयोग कृषि, व्यापार, उद्योग, शिक्षा, मकान निर्माण एवं अन्य आवश्यक कार्यों के लिए किया जाता है। यदि इसका सही उपयोग किया जाए तो यह आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(i) आवश्यकता के अनुसार धन उधार लिया जाता है।
(ii) भविष्य में ब्याज सहित वापस किया जाता है।
(iii) कृषि, व्यापार एवं उद्योग में उपयोग होता है।
(iv) आर्थिक विकास में सहायक है।
(v) आय बढ़ाने का साधन बन सकता है।
26. ऋण (साख) की सकारात्मक भूमिका क्या है?
उत्तर ⇒ जब ऋण का उपयोग उत्पादन, व्यापार, कृषि या अन्य आय बढ़ाने वाले कार्यों के लिए किया जाता है और इससे व्यक्ति की आय एवं आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, तो इसे ऋण की सकारात्मक भूमिका कहा जाता है। ऐसे ऋण से उत्पादन बढ़ता है, रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं तथा जीवन-स्तर में सुधार होता है। इसलिए साख आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण साधन मानी जाती है।
(i) आय बढ़ाने में सहायता करता है।
(ii) उत्पादन एवं व्यापार को बढ़ावा देता है।
(iii) रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
(iv) आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
(v) विकास को गति मिलती है।
27. ऋण (साख) की नकारात्मक भूमिका क्या है?
उत्तर ⇒ जब ऋण व्यक्ति की आर्थिक स्थिति सुधारने के बजाय उसे आर्थिक संकट में डाल देता है, तो इसे ऋण की नकारात्मक भूमिका कहा जाता है। यदि किसी कारणवश आय नहीं होती या फसल नष्ट हो जाती है, तो ऋण चुकाना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपनी संपत्ति बेचनी पड़ सकती है या नया ऋण लेना पड़ता है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।
(i) आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
(ii) ऋण चुकाना कठिन हो जाता है।
(iii) संपत्ति बेचनी पड़ सकती है।
(iv) नया ऋण लेना पड़ सकता है।
(v) कर्ज-जाल की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
28. कर्ज-जाल (Debt Trap) क्या है?
उत्तर ⇒ कर्ज-जाल वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है और पुराने ऋण का भुगतान करने के लिए नया ऋण लेने को विवश हो जाता है। इस प्रकार उसका ऋण लगातार बढ़ता जाता है तथा उसकी आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती जाती है। कर्ज-जाल व्यक्ति को लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों में फँसा देता है।
(i) ऋण चुकाने में असमर्थता की स्थिति होती है।
(ii) पुराने ऋण के लिए नया ऋण लेना पड़ता है।
(iii) ऋण का बोझ लगातार बढ़ता है।
(iv) आर्थिक स्थिति खराब होती जाती है।
(v) व्यक्ति लंबे समय तक कर्ज में फँसा रहता है।
29. कर्ज-जाल उत्पन्न होने के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒ कर्ज-जाल तब उत्पन्न होता है जब व्यक्ति समय पर ऋण नहीं चुका पाता। फसल खराब होना, बेरोजगारी, आय का अनिश्चित होना, अधिक ब्याज दर पर ऋण लेना तथा पुराने ऋण को चुकाने के लिए नया ऋण लेना इसके प्रमुख कारण हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती है।
(i) समय पर ऋण न चुका पाना।
(ii) आय का अनिश्चित होना।
(iii) अधिक ब्याज दर पर ऋण लेना।
(iv) पुराने ऋण के लिए नया ऋण लेना।
(v) संपत्ति बेचने की नौबत आना।
30. ऋण की शर्तें (Terms of Credit) क्या हैं?
उत्तर ⇒ ऋण की शर्तों से तात्पर्य उन नियमों एवं शर्तों से है जिनके आधार पर ऋण दिया जाता है। इनमें ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार (Collateral), आवश्यक दस्तावेज़, ऋण की अवधि तथा भुगतान की विधि शामिल होती है। ये शर्तें ऋणदाता एवं ऋण लेने वाले की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
(i) ब्याज दर।
(ii) समर्थक ऋणाधार (Collateral)।
(iii) आवश्यक दस्तावेज़।
(iv) ऋण चुकाने की अवधि।
(v) भुगतान की विधि।
31. ऋण की शर्तों में भिन्नता क्यों होती है?
उत्तर ⇒ ऋण की शर्तें सभी व्यक्तियों के लिए समान नहीं होतीं। ये ऋणदाता की प्रकृति, कर्जदार की आर्थिक स्थिति, ऋण के उद्देश्य, समर्थक ऋणाधार (Collateral) तथा आवश्यक दस्तावेज़ों पर निर्भर करती हैं। बैंक सामान्यतः कम ब्याज दर पर ऋण देते हैं, जबकि साहूकार अधिक ब्याज वसूलते हैं। इसलिए अलग-अलग परिस्थितियों में ऋण की शर्तें भिन्न होती हैं।
(i) ऋणदाता की प्रकृति पर निर्भर करती हैं।
(ii) कर्जदार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती हैं।
(iii) ऋण के उद्देश्य के अनुसार बदलती हैं।
(iv) समर्थक ऋणाधार एवं दस्तावेज़ों पर निर्भर करती हैं।
(v) ब्याज दर अलग-अलग होती है।
32. समर्थक ऋणाधार (Collateral) क्या है?
उत्तर ⇒ समर्थक ऋणाधार वह संपत्ति होती है जिसे कर्जदार ऋण की गारंटी के रूप में ऋणदाता के पास गिरवी रखता है। यदि कर्जदार समय पर ऋण नहीं चुका पाता, तो ऋणदाता उस संपत्ति को बेचकर अपनी राशि की वसूली कर सकता है। भूमि, मकान, आभूषण, बैंक जमा एवं वाहन आदि समर्थक ऋणाधार के सामान्य उदाहरण हैं।
(i) ऋण की गारंटी के रूप में रखी जाती है।
(ii) कर्जदार द्वारा गिरवी रखी जाती है।
(iii) ऋण न चुकाने पर बेची जा सकती है।
(iv) ऋणदाता की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
(v) भूमि, मकान एवं आभूषण इसके उदाहरण हैं।
33. ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण के प्रमुख स्रोत लिखिए।
उत्तर ⇒ ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न स्रोतों से ऋण प्राप्त करते हैं। इनमें साहूकार, व्यापारी, बैंक, सहकारी समितियाँ तथा नियोक्ता प्रमुख हैं। प्रत्येक स्रोत की ब्याज दर, ऋण की शर्तें एवं सुविधाएँ अलग-अलग होती हैं। किसानों एवं ग्रामीण लोगों के लिए बैंक एवं सहकारी समितियाँ अपेक्षाकृत सस्ते ऋण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
(i) साहूकार।
(ii) व्यापारी।
(iii) बैंक।
(iv) सहकारी समितियाँ।
(v) नियोक्ता (जमींदार)।
34. कुछ लोगों को बैंक से ऋण क्यों नहीं मिल पाता?
उत्तर ⇒ कई लोगों को बैंक से ऋण इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि उनके पास पर्याप्त समर्थक ऋणाधार (Collateral), नियमित आय या आवश्यक दस्तावेज़ नहीं होते। कई बार वे बैंक की निर्धारित शर्तों को भी पूरा नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप ऐसे लोग साहूकारों एवं अन्य अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हो जाते हैं।
(i) समर्थक ऋणाधार का अभाव।
(ii) नियमित आय का स्रोत नहीं होता।
(iii) आवश्यक दस्तावेज़ नहीं होते।
(iv) बैंक की शर्तें पूरी नहीं कर पाते।
(v) अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हो जाते हैं।
35. औपचारिक एवं अनौपचारिक ऋण स्रोतों में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ ऋण के स्रोतों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है—औपचारिक एवं अनौपचारिक। औपचारिक स्रोत सरकारी नियमों के अनुसार कार्य करते हैं तथा उनकी निगरानी RBI करता है, जबकि अनौपचारिक स्रोतों पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता और वे प्रायः अधिक ब्याज दर पर ऋण देते हैं।
| औपचारिक ऋण स्रोत | अनौपचारिक ऋण स्रोत |
|---|---|
| बैंक एवं सहकारी समितियाँ। | साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार आदि। |
| RBI द्वारा नियंत्रित। | सरकारी नियंत्रण नहीं होता। |
| ब्याज दर कम होती है। | ब्याज दर अधिक होती है। |
| ऋण की शर्तें स्पष्ट होती हैं। | ऋण की शर्तें मनमानी हो सकती हैं। |
| अपेक्षाकृत सुरक्षित एवं सस्ता ऋण। | महँगा एवं जोखिमपूर्ण ऋण। |
36. औपचारिक क्षेत्रक ऋण (Formal Sector Credit) क्या है?
उत्तर ⇒ औपचारिक क्षेत्रक ऋण वह ऋण है जो बैंकों, सहकारी समितियों तथा अन्य सरकारी मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिया जाता है। ये संस्थाएँ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार कार्य करती हैं। औपचारिक क्षेत्र से मिलने वाले ऋण की ब्याज दर अपेक्षाकृत कम होती है तथा इसकी शर्तें स्पष्ट एवं पारदर्शी होती हैं।
(i) बैंक एवं सहकारी समितियाँ ऋण देती हैं।
(ii) RBI के नियमों के अनुसार कार्य होता है।
(iii) ब्याज दर अपेक्षाकृत कम होती है।
(iv) ऋण की शर्तें स्पष्ट होती हैं।
(v) सुरक्षित एवं विश्वसनीय ऋण स्रोत है।
37. अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण (Informal Sector Credit) क्या है?
उत्तर ⇒ अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण वह ऋण है जो साहूकारों, व्यापारियों, जमींदारों, रिश्तेदारों एवं मित्रों द्वारा दिया जाता है। इन ऋणदाताओं पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता। इसलिए वे प्रायः अधिक ब्याज दर वसूलते हैं तथा ऋण की शर्तें अपनी सुविधा के अनुसार निर्धारित करते हैं।
(i) साहूकार एवं व्यापारी ऋण देते हैं।
(ii) सरकारी नियंत्रण नहीं होता।
(iii) ब्याज दर अधिक होती है।
(iv) ऋण की शर्तें मनमानी हो सकती हैं।
(v) कर्ज-जाल का खतरा अधिक रहता है।
38. महँगे ऋण (Expensive Credit) के प्रमुख नुकसान लिखिए।
उत्तर ⇒ महँगे ऋण पर ब्याज दर बहुत अधिक होती है, जिससे कर्जदार की आय का बड़ा भाग ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। इससे उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है तथा वह कर्ज-जाल में फँस सकता है। अधिक ब्याज के कारण नया व्यवसाय शुरू करना एवं निवेश करना भी कठिन हो जाता है।
(i) ब्याज दर बहुत अधिक होती है।
(ii) आय का बड़ा भाग ब्याज में चला जाता है।
(iii) कर्ज-जाल की संभावना बढ़ जाती है।
(iv) आर्थिक स्थिति कमजोर होती है।
(v) निवेश एवं व्यवसाय प्रभावित होते हैं।
39. सस्ता ऋण (Cheap Credit) क्यों आवश्यक है?
उत्तर ⇒ सस्ता ऋण आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इससे किसान, छोटे व्यापारी एवं उद्यमी कम ब्याज दर पर ऋण लेकर उत्पादन एवं व्यवसाय बढ़ा सकते हैं। इससे रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, लोगों की आय में वृद्धि होती है तथा गरीबी कम करने में सहायता मिलती है। इसलिए सस्ता एवं सुलभ ऋण देश के समग्र विकास का महत्वपूर्ण आधार है।
(i) उत्पादन एवं व्यवसाय को बढ़ावा मिलता है।
(ii) रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
(iii) आय में वृद्धि होती है।
(iv) गरीबी कम करने में सहायता मिलती है।
(v) आर्थिक विकास को गति मिलती है।
40. स्वयं सहायता समूह (SHG – Self Help Group) क्या है? इसके प्रमुख लाभ लिखिए।
उत्तर ⇒ स्वयं सहायता समूह (SHG) ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं का छोटा समूह होता है, जिसमें सामान्यतः 15–20 सदस्य होते हैं। सदस्य नियमित रूप से बचत करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर समूह से कम ब्याज दर पर ऋण प्राप्त करते हैं। SHG के माध्यम से गरीब लोगों को बिना समर्थक ऋणाधार के भी ऋण मिल जाता है। इससे साहूकारों पर निर्भरता कम होती है, महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण होता है तथा स्वरोज़गार एवं ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है।
(i) गरीबों को सस्ता ऋण उपलब्ध होता है।
(ii) साहूकारों पर निर्भरता कम होती है।
(iii) महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण होता है।
(iv) बिना समर्थक ऋणाधार के ऋण मिल सकता है।
(v) स्वरोज़गार एवं ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है।
More Class 10 Economics Revision Notes
| Chapter 1: विकास |
| Chapter 2: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक |
| Chapter 3: मुद्रा और साख |
| Chapter 4: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था |
| Chapter 5: उपभोक्ता अधिकार |