Class 10 Economics: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक
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Chapter Overview
| Class | 10 |
| Subject | Economics |
| Chapter Name | भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक Revision Notes
1. आर्थिक क्रियाकलाप (Economic Activities) क्या हैं?
उत्तर ⇒ वे सभी गतिविधियाँ जिनके माध्यम से व्यक्ति आय अर्जित करता है तथा अपनी आजीविका चलाता है, आर्थिक क्रियाकलाप कहलाते हैं। इन गतिविधियों में वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन, वितरण तथा उपभोग शामिल होता है। आर्थिक क्रियाकलाप किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होते हैं तथा रोजगार एवं राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
(i) आय अर्जित करने के लिए किए जाते हैं।
(ii) आजीविका का साधन होते हैं।
(iii) उत्पादन, वितरण एवं उपभोग शामिल होते हैं।
(iv) अर्थव्यवस्था का आधार हैं।
(v) राष्ट्रीय आय में योगदान देते हैं।
2. अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of Economy) क्या हैं?
उत्तर ⇒ अर्थव्यवस्था में होने वाली सभी आर्थिक गतिविधियों को उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न भागों में बाँटा जाता है, जिन्हें अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक कहते हैं। सामान्यतः अर्थव्यवस्था को तीन प्रमुख क्षेत्रकों में विभाजित किया जाता है—प्राथमिक क्षेत्रक, द्वितीयक क्षेत्रक तथा तृतीयक क्षेत्रक। इन तीनों क्षेत्रकों के संयुक्त योगदान से किसी देश की अर्थव्यवस्था का विकास होता है।
(i) आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण होता है।
(ii) तीन प्रमुख क्षेत्रक होते हैं।
(iii) प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक शामिल हैं।
(iv) सभी क्षेत्रक अर्थव्यवस्था के विकास में योगदान देते हैं।
(v) राष्ट्रीय आय का आधार हैं।
3. प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ प्राथमिक क्षेत्रक वह क्षेत्र है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का सीधे उपयोग करके वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में कृषि, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, वानिकी एवं खनन जैसी गतिविधियाँ शामिल होती हैं। यह अन्य सभी क्षेत्रकों का आधार माना जाता है क्योंकि इन्हीं से कच्चा माल प्राप्त होता है।
(i) प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है।
(ii) कृषि एवं सहायक क्षेत्रक कहलाता है।
(iii) कच्चे माल का उत्पादन करता है।
(iv) अन्य क्षेत्रकों का आधार है।
(v) कृषि, खनन एवं मत्स्य पालन इसके उदाहरण हैं।
4. प्राथमिक क्षेत्रक को ‘प्राथमिक’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर ⇒ प्राथमिक क्षेत्रक को ‘प्राथमिक’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तथा अन्य सभी क्षेत्रकों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है। कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन एवं खनन जैसी गतिविधियों से प्राप्त संसाधनों के बिना उद्योग एवं सेवा क्षेत्र का विकास संभव नहीं है। इसलिए इसे अर्थव्यवस्था का आधारभूत क्षेत्र माना जाता है।
(i) मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
(ii) कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(iii) अन्य सभी क्षेत्रकों का आधार है।
(iv) प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है।
(v) आर्थिक विकास की शुरुआत इसी से होती है।
5. प्राथमिक क्षेत्रक की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ प्राथमिक क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों के प्रत्यक्ष उपयोग पर आधारित होता है। इसमें कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी एवं खनन जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं। यह क्षेत्र वर्षा, जलवायु एवं प्राकृतिक परिस्थितियों पर अधिक निर्भर रहता है तथा अन्य सभी क्षेत्रकों के लिए आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(i) प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है।
(ii) वर्षा एवं जलवायु पर निर्भर करता है।
(iii) प्राकृतिक उत्पाद प्राप्त होते हैं।
(iv) अन्य क्षेत्रकों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(v) अर्थव्यवस्था का आधारभूत क्षेत्र है।
6. द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ द्वितीयक क्षेत्रक वह क्षेत्र है जिसमें प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को संसाधित करके नई एवं उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहा जाता है क्योंकि इसमें विभिन्न प्रकार के उद्योग एवं विनिर्माण कार्य शामिल होते हैं। इस क्षेत्र में वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है तथा लोगों के लिए रोजगार के अनेक अवसर उत्पन्न होते हैं।
(i) कच्चे माल से नई वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
(ii) इसे औद्योगिक क्षेत्रक कहते हैं।
(iii) विनिर्माण प्रक्रिया होती है।
(iv) वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है।
(v) उद्योगों का विकास होता है।
7. द्वितीयक क्षेत्रक के प्रमुख उदाहरण लिखिए।
उत्तर ⇒ द्वितीयक क्षेत्रक में प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को संसाधित करके उपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। उदाहरण के लिए कपास से सूत एवं कपड़ा बनाना, गन्ने से चीनी बनाना, मिट्टी से ईंट बनाना तथा लोहे के अयस्क से मशीनें एवं वाहन बनाना इस क्षेत्र की प्रमुख गतिविधियाँ हैं।
(i) कपास से कपड़ा बनाना।
(ii) गन्ने से चीनी बनाना।
(iii) मिट्टी से ईंट बनाना।
(iv) लोहे से मशीन एवं वाहन बनाना।
(v) उद्योगों में वस्तुओं का निर्माण करना।
8. द्वितीयक क्षेत्रक की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ द्वितीयक क्षेत्रक प्राथमिक क्षेत्रक पर आधारित होता है क्योंकि इसे कच्चा माल वहीं से प्राप्त होता है। इसमें कारखानों, उद्योगों एवं कार्यशालाओं में वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। इस क्षेत्र में विनिर्माण प्रक्रिया के माध्यम से कच्चे माल का मूल्य बढ़ाकर उसे उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित किया जाता है।
(i) प्राथमिक क्षेत्रक पर निर्भर होता है।
(ii) कच्चे माल का उपयोग किया जाता है।
(iii) कारखानों एवं उद्योगों में उत्पादन होता है।
(iv) विनिर्माण प्रक्रिया आवश्यक होती है।
(v) वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है।
9. तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ तृतीयक क्षेत्रक वह क्षेत्र है जो वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता, बल्कि प्राथमिक एवं द्वितीयक क्षेत्रकों को विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करता है। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में परिवहन, बैंकिंग, बीमा, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी एवं अन्य सेवाएँ शामिल होती हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था में इसका महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
(i) सेवा क्षेत्रक कहलाता है।
(ii) वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता।
(iii) अन्य क्षेत्रकों को सेवाएँ प्रदान करता है।
(iv) आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है।
(v) शिक्षा, स्वास्थ्य एवं बैंकिंग इसके उदाहरण हैं।
10. तृतीयक क्षेत्रक की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ तृतीयक क्षेत्रक का मुख्य कार्य सेवाएँ प्रदान करना है। यह उत्पादन, व्यापार एवं वितरण को सुचारु रूप से चलाने में सहायता करता है। परिवहन, संचार, बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सेवाएँ इसी क्षेत्र में आती हैं। वर्तमान समय में यह क्षेत्र रोजगार एवं राष्ट्रीय आय का प्रमुख स्रोत बन गया है।
(i) सेवाएँ प्रदान करता है।
(ii) उत्पादन एवं व्यापार में सहायता करता है।
(iii) आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
(iv) रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
(v) राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
11. प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रकों में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों का कार्य अलग-अलग होता है। प्राथमिक क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों से कच्चा माल प्राप्त करता है, द्वितीयक क्षेत्रक उसी कच्चे माल से नई वस्तुओं का निर्माण करता है तथा तृतीयक क्षेत्रक इन दोनों क्षेत्रकों को आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है। तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं और अर्थव्यवस्था के विकास में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
| प्राथमिक क्षेत्रक | द्वितीयक क्षेत्रक | तृतीयक क्षेत्रक |
|---|---|---|
| प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है। | कच्चे माल से नई वस्तुएँ बनाता है। | सेवाएँ प्रदान करता है। |
| कृषि एवं सहायक क्षेत्रक कहलाता है। | औद्योगिक क्षेत्रक कहलाता है। | सेवा क्षेत्रक कहलाता है। |
| प्राकृतिक उत्पाद प्राप्त होते हैं। | निर्मित वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। | परिवहन, बैंकिंग, शिक्षा जैसी सेवाएँ मिलती हैं। |
| उदाहरण – कृषि, खनन। | उदाहरण – चीनी मिल, कपड़ा उद्योग। | उदाहरण – बैंक, अस्पताल, विद्यालय। |
12. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) क्या है?
उत्तर ⇒ सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि (सामान्यतः एक वर्ष) में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को कहते हैं। GDP किसी देश की आर्थिक स्थिति एवं उत्पादन क्षमता का प्रमुख संकेतक है। इसके माध्यम से देश की आर्थिक प्रगति का आकलन किया जाता है।
(i) अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का कुल बाजार मूल्य है।
(ii) एक निश्चित अवधि के लिए मापा जाता है।
(iii) देश की आर्थिक स्थिति का संकेत देता है।
(iv) आर्थिक विकास का प्रमुख मापदण्ड है।
(v) राष्ट्रीय उत्पादन को दर्शाता है।
13. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना कैसे की जाती है?
उत्तर ⇒ सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों—प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक—द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को जोड़कर की जाती है। इस प्रकार GDP किसी देश के कुल उत्पादन का आर्थिक मूल्य बताता है।
GDP = प्राथमिक क्षेत्रक + द्वितीयक क्षेत्रक + तृतीयक क्षेत्रक के कुल मूल्य का योग
(i) तीनों क्षेत्रकों का योगदान शामिल होता है।
(ii) अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य जोड़ा जाता है।
(iii) एक वर्ष के उत्पादन का आकलन होता है।
(iv) आर्थिक विकास का संकेत मिलता है।
(v) राष्ट्रीय आय के अध्ययन में उपयोगी है।
14. भारत में GDP का मापन कौन करता है?
उत्तर ⇒ भारत में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मापन केंद्र सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा किया जाता है। यह मंत्रालय विभिन्न राज्यों एवं विभागों से आँकड़े एकत्र करके देश के कुल उत्पादन एवं आर्थिक गतिविधियों का आकलन करता है।
(i) केंद्र सरकार द्वारा मापन किया जाता है।
(ii) सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय जिम्मेदार है।
(iii) राज्यों से आँकड़े एकत्र किए जाते हैं।
(iv) आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाता है।
(v) GDP का आधिकारिक आँकड़ा जारी किया जाता है।
15. सकल मूल्य वर्धित (GVA – Gross Value Added) क्या है?
उत्तर ⇒ सकल मूल्य वर्धित (GVA) वह मापदण्ड है जिसके माध्यम से अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों—प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक—के वास्तविक योगदान का आकलन किया जाता है। GVA यह बताता है कि प्रत्येक क्षेत्रक ने कुल उत्पादन में कितना मूल्य जोड़ा है। यह GDP से भिन्न है क्योंकि इसमें कर एवं सब्सिडी का अलग समायोजन किया जाता है।
(i) तीनों क्षेत्रकों के योगदान को मापता है।
(ii) मूल्य वृद्धि का आकलन करता है।
(iii) GDP से अलग मापदण्ड है।
(iv) कर एवं सब्सिडी का समायोजन किया जाता है।
(v) आर्थिक विश्लेषण में उपयोगी है।
16. GDP एवं GVA में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल मूल्य वर्धित (GVA) दोनों किसी देश की आर्थिक गतिविधियों को मापने के महत्वपूर्ण मापदण्ड हैं। GDP देश में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को दर्शाता है, जबकि GVA अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों द्वारा जोड़े गए वास्तविक मूल्य को बताता है। GDP में उत्पादन पर लगाए गए कर एवं सब्सिडी को शामिल किया जाता है, जबकि GVA मुख्य रूप से क्षेत्रकों के योगदान को दर्शाता है।
| GDP | GVA |
|---|---|
| देश में कुल उत्पादन का बाजार मूल्य बताता है। | विभिन्न क्षेत्रकों द्वारा जोड़े गए मूल्य को दर्शाता है। |
| कर एवं सब्सिडी का प्रभाव शामिल होता है। | क्षेत्रकों के वास्तविक योगदान को दर्शाता है। |
| देश की कुल आर्थिक गतिविधि का माप है। | उत्पादन में क्षेत्रकों के योगदान का माप है। |
| आर्थिक विकास का प्रमुख संकेतक है। | क्षेत्रवार विश्लेषण के लिए उपयोगी है। |
17. तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) का महत्व क्यों बढ़ रहा है?
उत्तर ⇒ आधुनिक समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, परिवहन, संचार, पर्यटन एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सेवाओं की माँग तेजी से बढ़ रही है। कृषि एवं उद्योग के विकास के साथ इन सेवाओं की आवश्यकता भी बढ़ती है। लोगों की आय बढ़ने पर वे बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, होटल, पर्यटन एवं अन्य सेवाओं का अधिक उपयोग करने लगते हैं। यही कारण है कि सेवा क्षेत्रक का महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
(i) शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की माँग बढ़ी है।
(ii) बैंकिंग एवं परिवहन का विस्तार हुआ है।
(iii) सूचना प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है।
(iv) लोगों की आय बढ़ने से सेवाओं की माँग बढ़ी है।
(v) आधुनिक अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र प्रमुख बन गया है।
18. सेवा क्षेत्रक की सभी सेवाओं में समान विकास क्यों नहीं हुआ है?
उत्तर ⇒ सेवा क्षेत्र की सभी गतिविधियों का विकास समान गति से नहीं हुआ है। कुछ सेवाओं, जैसे सूचना प्रौद्योगिकी एवं बैंकिंग में उच्च कौशल वाले लोगों को अच्छे रोजगार मिलते हैं, जबकि अनेक लोग छोटी दुकानों, मरम्मत कार्य, परिवहन एवं अन्य कम आय वाली सेवाओं में कार्य करते हैं। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण कई लोग कम आय वाले कार्य करने के लिए विवश होते हैं।
(i) सभी सेवाओं में समान रोजगार नहीं मिलता।
(ii) उच्च कौशल वाली सेवाओं में बेहतर अवसर होते हैं।
(iii) कम आय वाली सेवाओं में अधिक लोग कार्यरत हैं।
(iv) रोजगार के सीमित विकल्प होते हैं।
(v) सेवा क्षेत्र में असमान विकास देखा जाता है।
19. प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रकों में परस्पर निर्भरता कैसे होती है?
उत्तर ⇒ अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं। प्राथमिक क्षेत्रक उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है। द्वितीयक क्षेत्रक उसी कच्चे माल से उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करता है। तृतीयक क्षेत्रक परिवहन, बैंकिंग, बीमा, संचार एवं व्यापार जैसी सेवाएँ प्रदान करके दोनों क्षेत्रकों की सहायता करता है। किसी एक क्षेत्रक की प्रगति अन्य दोनों क्षेत्रकों के विकास को भी प्रभावित करती है।
(i) प्राथमिक क्षेत्रक कच्चा माल देता है।
(ii) द्वितीयक क्षेत्रक वस्तुओं का निर्माण करता है।
(iii) तृतीयक क्षेत्रक सेवाएँ प्रदान करता है।
(iv) तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
(v) संतुलित विकास के लिए सभी आवश्यक हैं।
20. खुली बेरोजगारी (Open Unemployment) क्या है?
उत्तर ⇒ जब कोई व्यक्ति काम करने के लिए योग्य एवं इच्छुक हो, लेकिन उसे कोई रोजगार प्राप्त न हो और वह पूरी तरह बेरोजगार हो, तो इसे खुली बेरोजगारी कहते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति कार्य करना चाहता है, फिर भी उसे रोजगार का अवसर नहीं मिलता। यह समस्या विशेष रूप से शिक्षित युवाओं एवं शहरी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है।
(i) व्यक्ति काम करने के लिए तैयार होता है।
(ii) रोजगार उपलब्ध नहीं होता।
(iii) व्यक्ति पूरी तरह बेरोजगार रहता है।
(iv) शिक्षित युवाओं में भी यह समस्या होती है।
(v) यह आर्थिक विकास की प्रमुख चुनौती है।
21. प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) क्या है?
उत्तर ⇒ जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हों और उनमें से कुछ लोगों को हटा देने पर भी कुल उत्पादन में कोई कमी न आए, तो ऐसी स्थिति को प्रच्छन्न (छिपी हुई) बेरोजगारी कहते हैं। इसमें व्यक्ति कार्य करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसकी पूरी कार्य क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता। यह समस्या मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में अधिक पाई जाती है।
(i) आवश्यकता से अधिक लोग कार्य करते हैं।
(ii) कुछ लोगों के हटने पर भी उत्पादन प्रभावित नहीं होता।
(iii) व्यक्ति काम करता हुआ दिखाई देता है।
(iv) इसे छिपी हुई बेरोजगारी भी कहते हैं।
(v) कृषि क्षेत्र में यह अधिक पाई जाती है।
22. प्रच्छन्न बेरोजगारी को ‘छिपी हुई बेरोजगारी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर ⇒ प्रच्छन्न बेरोजगारी को ‘छिपी हुई बेरोजगारी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति बाहर से कार्य करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में उसकी श्रम क्षमता का पूरा उपयोग नहीं होता। यदि ऐसे कुछ लोगों को कार्य से अलग भी कर दिया जाए, तो उत्पादन में कोई कमी नहीं आती। इसलिए यह बेरोजगारी दिखाई नहीं देती, बल्कि छिपी रहती है।
(i) व्यक्ति काम करता हुआ दिखाई देता है।
(ii) उसकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं होता।
(iii) उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
(iv) यह प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती।
(v) कृषि में सबसे अधिक पाई जाती है।
23. क्या प्रच्छन्न बेरोजगारी केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ नहीं, प्रच्छन्न बेरोजगारी केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह सेवा क्षेत्र के असंगठित भागों तथा छोटे व्यवसायों में भी देखने को मिलती है। शहरों में कई लोग प्लम्बर, पेंटर, ठेला चालक एवं छोटे विक्रेता जैसे कार्य करते हैं, जहाँ उनकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता तथा आय भी बहुत कम होती है।
(i) केवल कृषि तक सीमित नहीं है।
(ii) सेवा क्षेत्र में भी पाई जाती है।
(iii) छोटे व्यवसायों में भी देखी जाती है।
(iv) आय अपेक्षाकृत कम होती है।
(v) रोजगार के बेहतर अवसरों का अभाव होता है।
24. कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के प्रमुख उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, ग्रामीण सड़कों एवं भंडारण की व्यवस्था, किसानों को सस्ती दर पर ऋण, कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना तथा बहुफसली खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। इन उपायों से कृषि उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में वृद्धि होगी तथा नए रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।
(i) सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
(ii) ग्रामीण सड़क एवं भंडारण का विकास।
(iii) सस्ती कृषि साख उपलब्ध कराना।
(iv) कृषि आधारित उद्योग स्थापित करना।
(v) बहुफसली खेती को बढ़ावा देना।
25. सेवा क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएँ कैसे बढ़ाई जा सकती हैं?
उत्तर ⇒ सेवा क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार सेवाओं का विस्तार करके रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। अधिक विद्यालय, अस्पताल एवं प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने से शिक्षकों, डॉक्टरों, नर्सों एवं अन्य कर्मचारियों के लिए रोजगार उत्पन्न होता है। पर्यटन एवं सूचना प्रौद्योगिकी के विकास से भी बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होता है।
(i) शिक्षा क्षेत्र का विस्तार किया जाए।
(ii) स्वास्थ्य सेवाओं का विकास किया जाए।
(iii) पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।
(iv) सूचना प्रौद्योगिकी का विकास किया जाए।
(v) नए सेवा क्षेत्रों में रोजगार सृजित किए जाएँ।
26. राज्यों में रोजगार वृद्धि के प्रमुख स्रोत लिखिए।
उत्तर ⇒ प्रत्येक राज्य में रोजगार बढ़ाने के लिए उसकी भौगोलिक, प्राकृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों का विकास किया जा सकता है। पर्यटन, क्षेत्रीय हस्तशिल्प, सूचना प्रौद्योगिकी, लघु उद्योग एवं सेवा क्षेत्र रोजगार सृजन के प्रमुख स्रोत हैं। यदि सरकार इन क्षेत्रों के विकास के लिए उचित योजना, निवेश एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था करे, तो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।
(i) पर्यटन का विकास।
(ii) क्षेत्रीय हस्तशिल्प को बढ़ावा।
(iii) सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार।
(iv) लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास।
(v) सरकारी सहायता एवं योजनाएँ।
27. शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment) क्या है?
उत्तर ⇒ जब शिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्ति को उसकी योग्यता एवं शिक्षा के अनुसार रोजगार प्राप्त नहीं होता, तो उसे शिक्षित बेरोजगारी कहते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति पढ़ा-लिखा होने के बावजूद या तो बेरोजगार रहता है अथवा अपनी योग्यता से कम स्तर का कार्य करने के लिए विवश होता है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से युवाओं में अधिक देखने को मिलती है।
(i) शिक्षित व्यक्ति को रोजगार नहीं मिलता।
(ii) योग्यता के अनुसार कार्य नहीं मिलता।
(iii) युवाओं में अधिक पाई जाती है।
(iv) आर्थिक समस्या उत्पन्न करती है।
(v) मानव संसाधन का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।
28. महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) क्या है?
उत्तर ⇒ महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) केंद्र सरकार द्वारा लागू किया गया एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को रोजगार की कानूनी गारंटी प्रदान करना है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के इच्छुक वयस्क सदस्य को प्रतिवर्ष 100 दिनों का अकुशल रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है। यदि रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो बेरोजगारी भत्ता देने का भी प्रावधान है।
(i) ग्रामीण रोजगार की कानूनी गारंटी देता है।
(ii) प्रति वर्ष 100 दिनों का रोजगार प्रदान करता है।
(iii) केंद्र सरकार द्वारा लागू किया गया है।
(iv) रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता मिलता है।
(v) ग्रामीण विकास को बढ़ावा देता है।
29. MGNREGA की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ MGNREGA का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराना एवं ग्रामीण आधारभूत ढाँचे का विकास करना है। इस योजना के अंतर्गत रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाती है तथा ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाती है जो भूमि की उत्पादकता एवं ग्रामीण विकास को बढ़ावा दें। इससे ग्रामीण बेरोजगारी कम करने में सहायता मिलती है।
(i) प्रति वर्ष 100 दिनों का रोजगार।
(ii) रोजगार की कानूनी गारंटी।
(iii) रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता।
(iv) भूमि एवं जल संरक्षण जैसे कार्यों को प्राथमिकता।
(v) ग्रामीण विकास एवं रोजगार सृजन।
30. संगठित क्षेत्रक (Organised Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ संगठित क्षेत्रक में वे संस्थाएँ एवं उद्यम शामिल होते हैं जो सरकार द्वारा पंजीकृत होते हैं तथा सरकारी नियमों एवं श्रम कानूनों का पालन करते हैं। इस क्षेत्र में कर्मचारियों को नियमित रोजगार, निश्चित कार्य समय, उचित वेतन, भविष्य निधि (PF), पेंशन, चिकित्सा सुविधा एवं अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त होते हैं। इसलिए संगठित क्षेत्रक में रोजगार अधिक सुरक्षित माना जाता है।
(i) सरकार द्वारा पंजीकृत होता है।
(ii) श्रम कानूनों का पालन किया जाता है।
(iii) नियमित एवं सुरक्षित रोजगार मिलता है।
(iv) सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
(v) निश्चित कार्य समय एवं उचित वेतन मिलता है।
31. असंगठित क्षेत्रक (Unorganised Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ असंगठित क्षेत्रक में वे संस्थाएँ एवं कार्यस्थल आते हैं जो सरकार में पंजीकृत नहीं होते तथा जहाँ श्रम कानूनों का पूर्ण पालन नहीं किया जाता। इस क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों को नियमित वेतन, निश्चित कार्य समय, पेंशन, भविष्य निधि (PF), चिकित्सा सुविधा एवं अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ सामान्यतः प्राप्त नहीं होते। भारत में अधिकांश श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं।
(i) सरकार में पंजीकृत नहीं होता।
(ii) श्रम कानूनों का पूर्ण पालन नहीं होता।
(iii) सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं का अभाव होता है।
(iv) रोजगार अस्थायी होता है।
(v) भारत के अधिकांश श्रमिक इसी क्षेत्र में कार्य करते हैं।
32. संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ संगठित एवं असंगठित क्षेत्रकों में मुख्य अंतर सरकारी पंजीकरण, श्रम कानूनों के पालन तथा कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं का होता है। संगठित क्षेत्र में रोजगार सुरक्षित एवं नियमित होता है, जबकि असंगठित क्षेत्र में रोजगार अस्थायी तथा सुविधाएँ सीमित होती हैं।
| संगठित क्षेत्रक | असंगठित क्षेत्रक |
|---|---|
| सरकार में पंजीकृत होता है। | सरकार में पंजीकृत नहीं होता। |
| श्रम कानूनों का पालन किया जाता है। | श्रम कानूनों का पूर्ण पालन नहीं होता। |
| नियमित वेतन एवं नौकरी की सुरक्षा होती है। | नौकरी की सुरक्षा नहीं होती। |
| PF, पेंशन, चिकित्सा सुविधा मिलती है। | सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ नहीं मिलतीं। |
| उदाहरण – सरकारी कार्यालय, बैंक, बड़ी कंपनियाँ। | उदाहरण – दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार। |
33. सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ सार्वजनिक क्षेत्रक वह क्षेत्र है जहाँ उद्योग, संस्थान एवं उद्यमों का स्वामित्व एवं नियंत्रण सरकार के पास होता है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि जनता को आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा देश का समग्र विकास करना होता है। रेलवे, डाक विभाग एवं सरकारी बैंक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
(i) सरकार का स्वामित्व एवं नियंत्रण होता है।
(ii) जनहित के लिए कार्य करता है।
(iii) आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराता है।
(iv) राष्ट्रीय विकास में योगदान देता है।
(v) उदाहरण – रेलवे, डाक विभाग, सरकारी बैंक।
34. निजी क्षेत्रक (Private Sector) क्या है?
उत्तर ⇒ निजी क्षेत्रक वह क्षेत्र है जहाँ उद्योग एवं व्यवसाय का स्वामित्व और संचालन निजी व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। निजी क्षेत्र में उत्पादन, व्यापार एवं सेवाओं के अनेक कार्य किए जाते हैं तथा यह रोजगार सृजन एवं आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(i) निजी व्यक्तियों या कंपनियों का स्वामित्व होता है।
(ii) लाभ कमाना मुख्य उद्देश्य होता है।
(iii) उत्पादन एवं सेवाएँ प्रदान करता है।
(iv) रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है।
(v) आर्थिक विकास में योगदान देता है।
35. सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रकों में मुख्य अंतर स्वामित्व, उद्देश्य एवं नियंत्रण का होता है। सार्वजनिक क्षेत्र सरकार के नियंत्रण में कार्य करता है तथा जनहित को प्राथमिकता देता है, जबकि निजी क्षेत्र निजी व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा संचालित होता है और लाभ कमाना उसका प्रमुख उद्देश्य होता है।
| सार्वजनिक क्षेत्रक | निजी क्षेत्रक |
|---|---|
| सरकार के स्वामित्व में होता है। | निजी व्यक्तियों या कंपनियों के स्वामित्व में होता है। |
| जनहित मुख्य उद्देश्य होता है। | लाभ कमाना मुख्य उद्देश्य होता है। |
| सरकार द्वारा संचालित होता है। | निजी प्रबंधन द्वारा संचालित होता है। |
| आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराता है। | व्यापार एवं उद्योग पर अधिक ध्यान देता है। |
| उदाहरण – रेलवे, SBI, डाक विभाग। | उदाहरण – टाटा, रिलायंस, इंफोसिस आदि। |
36. सार्वजनिक क्षेत्रक की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर ⇒ सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि जनता को आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा देश का संतुलित विकास सुनिश्चित करना होता है। ऐसे अनेक कार्य हैं जिन्हें निजी क्षेत्र लाभ कम होने के कारण नहीं करता, इसलिए सरकार उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से संचालित करती है। बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रेलवे एवं डाक जैसी आवश्यक सेवाएँ सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं।
(i) जनहित को प्राथमिकता दी जाती है।
(ii) आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
(iii) संतुलित क्षेत्रीय विकास होता है।
(iv) रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
(v) राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
37. निजी क्षेत्रक की अर्थव्यवस्था में क्या भूमिका है?
उत्तर ⇒ निजी क्षेत्रक उत्पादन, व्यापार एवं सेवाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता है। यह निवेश बढ़ाता है, नए उद्योग स्थापित करता है तथा रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है। प्रतिस्पर्धा के कारण वस्तुओं एवं सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
(i) उत्पादन एवं व्यापार को बढ़ावा देता है।
(ii) निवेश में वृद्धि करता है।
(iii) रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है।
(iv) प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है।
(v) आर्थिक विकास में योगदान देता है।
38. ‘अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक’ अध्याय से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर ⇒ यह अध्याय हमें बताता है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तीन प्रमुख क्षेत्रकों—प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक—पर आधारित होती है। ये तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा राष्ट्रीय आय एवं रोजगार में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक तथा सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक का संतुलित विकास देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है।
(i) सभी क्षेत्रक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
(ii) तीनों क्षेत्रक परस्पर निर्भर हैं।
(iii) रोजगार सृजन में योगदान देते हैं।
(iv) राष्ट्रीय आय में वृद्धि करते हैं।
(v) संतुलित विकास आवश्यक है।
39. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्रक का अपना अलग महत्व है। प्राथमिक क्षेत्रक कच्चा माल उपलब्ध कराता है, द्वितीयक क्षेत्रक उससे वस्तुओं का निर्माण करता है तथा तृतीयक क्षेत्रक आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है। यदि तीनों क्षेत्रकों का संतुलित विकास हो, तो उत्पादन, रोजगार, आय एवं जीवन-स्तर में सुधार होता है तथा देश का समग्र आर्थिक विकास संभव होता है।
(i) प्राथमिक क्षेत्रक कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
(ii) द्वितीयक क्षेत्रक वस्तुओं का निर्माण करता है।
(iii) तृतीयक क्षेत्रक सेवाएँ प्रदान करता है।
(iv) रोजगार एवं आय में वृद्धि होती है।
(v) देश का समग्र विकास होता है।
40. ‘अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक’ अध्याय का निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर ⇒ ‘अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक’ अध्याय से स्पष्ट होता है कि किसी भी देश की आर्थिक प्रगति तीनों क्षेत्रकों के संतुलित विकास पर निर्भर करती है। प्राथमिक क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों से कच्चा माल उपलब्ध कराता है, द्वितीयक क्षेत्रक उसका प्रसंस्करण करके उपयोगी वस्तुएँ बनाता है तथा तृतीयक क्षेत्रक इन दोनों को आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है। संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रक सभी मिलकर रोजगार, उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि करते हैं। इसलिए सभी क्षेत्रकों का समन्वित विकास ही एक सशक्त एवं समृद्ध अर्थव्यवस्था की आधारशिला है।
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| Chapter 1: विकास |
| Chapter 2: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक |
| Chapter 3: मुद्रा और साख |
| Chapter 4: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था |
| Chapter 5: उपभोक्ता अधिकार |