Class 10 Geography: वन और वन्य जीव संसाधन
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Chapter Overview
| Class | 10 |
| Subject | Geography |
| Chapter Name | वन और वन्य जीव संसाधन |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
वन और वन्य जीव संसाधन Revision Notes
1. वन एवं वन्य जीव संसाधन (Forest and Wildlife Resources) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर ⇒
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले वन, वृक्ष, झाड़ियाँ, घास, वनस्पतियाँ तथा जंगलों में रहने वाले सभी प्रकार के पशु-पक्षी, कीट-पतंगे एवं अन्य जीव मिलकर वन एवं वन्य जीव संसाधन (Forest and Wildlife Resources) कहलाते हैं। ये संसाधन पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन हमें लकड़ी, ईंधन, औषधियाँ, फल, गोंद, लाख, बाँस, महुआ, तेंदू पत्ता तथा अनेक लघु वनोपज प्रदान करते हैं, जबकि वन्य जीव जैव विविधता एवं खाद्य श्रृंखला के संतुलन को बनाए रखते हैं।
झारखंड वन एवं खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है। यहाँ का लगभग एक-तिहाई क्षेत्र वनों से आच्छादित है। साल (Sal) के घने वन, सारंडा वन, पलामू टाइगर रिजर्व, बेतला राष्ट्रीय उद्यान, दलमा वन्य जीव अभयारण्य तथा हजारीबाग वन्य जीव अभयारण्य राज्य की प्रमुख प्राकृतिक धरोहर हैं। झारखंड की बड़ी जनसंख्या, विशेषकर आदिवासी समुदाय, अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर है।
वन एवं वन्य जीव संसाधनों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं।
(ii) जैव विविधता का संरक्षण करते हैं।
(iii) लाखों लोगों को आजीविका प्रदान करते हैं।
(iv) जलवायु एवं वर्षा को संतुलित रखते हैं।
(v) वन्य जीवों को प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराते हैं।
2. जैव विविधता (Biodiversity) क्या है? इसका महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले सभी प्रकार के पौधों, पशुओं, पक्षियों, सूक्ष्मजीवों तथा उनके प्राकृतिक आवासों की विविधता को जैव विविधता (Biodiversity) कहा जाता है। यह प्रकृति की सबसे महत्वपूर्ण संपदा है, क्योंकि प्रत्येक जीव पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में अपनी विशेष भूमिका निभाता है।
झारखंड जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध राज्य है। यहाँ साल, सागवान, बाँस, महुआ, पलाश, कुसुम आदि वनस्पतियों के साथ-साथ हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, हिरण, जंगली सूअर एवं अनेक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यदि जैव विविधता नष्ट होती है, तो पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन भी बिगड़ जाता है।
जैव विविधता का महत्व निम्नलिखित है—
(i) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखती है।
(ii) खाद्य श्रृंखला को सुरक्षित रखती है।
(iii) औषधीय पौधों का स्रोत है।
(iv) वन्य जीवों के अस्तित्व की रक्षा करती है।
(v) मानव जीवन एवं कृषि के लिए अत्यंत आवश्यक है।
3. झारखंड में वनों का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
झारखंड को भारत के प्रमुख वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यहाँ के वन केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण तथा आदिवासी जीवन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। राज्य के अनेक ग्रामीण एवं आदिवासी परिवार ईंधन, चारा, फल, महुआ, तेंदू पत्ता, लाख, बाँस एवं अन्य लघु वनोपज प्राप्त करके अपनी आजीविका चलाते हैं।
वन वर्षा लाने, मिट्टी के कटाव को रोकने, वन्य जीवों को आश्रय देने तथा जलवायु को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए झारखंड के सतत विकास के लिए वनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
झारखंड में वनों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) आदिवासी समुदाय की आजीविका का प्रमुख आधार हैं।
(ii) लाख, महुआ, तेंदू पत्ता एवं बाँस जैसे उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।
(iii) मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।
(iv) वर्षा एवं जलवायु को संतुलित रखते हैं।
(v) वन्य जीवों को प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं।
(vi) पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
4. झारखंड के प्रमुख वन्य जीव अभयारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यानों के नाम लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड जैव विविधता एवं वन्य जीवों की दृष्टि से समृद्ध राज्य है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए राज्य में अनेक राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्य स्थापित किए गए हैं। इन संरक्षित क्षेत्रों में वन्य जीवों का शिकार प्रतिबंधित है तथा उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा की जाती है।
झारखंड के प्रमुख संरक्षित क्षेत्र निम्नलिखित हैं—
(i) बेतला राष्ट्रीय उद्यान – पलामू जिला
(ii) पलामू टाइगर रिजर्व – भारत के सबसे पुराने बाघ अभयारण्यों में से एक
(iii) दलमा वन्य जीव अभयारण्य – पूर्वी सिंहभूम
(iv) हजारीबाग वन्य जीव अभयारण्य
(v) लवालौंग वन्य जीव अभयारण्य
(vi) उधवा पक्षी अभयारण्य – साहिबगंज
इन क्षेत्रों में हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, हिरण, जंगली सूअर तथा अनेक पक्षियों की प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है।
5. झारखंड में वनों के विनाश (Deforestation) के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒
पिछले कुछ दशकों में झारखंड के वन क्षेत्र में कमी आई है। इसका मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, खनन गतिविधियाँ, औद्योगीकरण, अवैध कटाई तथा शहरीकरण है। झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है, इसलिए कोयला, लौह अयस्क एवं बॉक्साइट के खनन के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का उपयोग किया गया है।
वनों के विनाश से जैव विविधता प्रभावित होती है, वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है तथा जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। इसलिए वन संरक्षण के प्रभावी उपाय अपनाना आवश्यक है।
झारखंड में वनों के विनाश के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(i) खनन गतिविधियों का विस्तार।
(ii) अवैध वृक्षों की कटाई।
(iii) औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण।
(iv) कृषि भूमि का विस्तार।
(v) जंगलों में आग लगना।
(vi) बढ़ती जनसंख्या एवं अतिक्रमण।
(vii) सड़क एवं अन्य विकास परियोजनाएँ।
6. वनों के संरक्षण (Forest Conservation) की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर ⇒
वन पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं। ये न केवल मानव जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। झारखंड जैसे राज्य में वन आदिवासी समुदायों की आजीविका, संस्कृति एवं परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। वर्तमान समय में खनन, औद्योगीकरण, अवैध कटाई तथा बढ़ती जनसंख्या के कारण वन क्षेत्र लगातार घट रहे हैं। यदि वनों का संरक्षण नहीं किया गया, तो जैव विविधता, जल स्रोत, वन्य जीव तथा जलवायु पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
वन संरक्षण केवल पेड़ों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना भी है। इसके लिए सरकार एवं आम नागरिक दोनों की भागीदारी आवश्यक है।
वन संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित है—
(i) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए।
(ii) जैव विविधता की रक्षा के लिए।
(iii) मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए।
(iv) वर्षा एवं जलवायु को संतुलित रखने के लिए।
(v) वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए।
(vi) भावी पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने के लिए।
7. झारखंड में पाए जाने वाले प्रमुख वन उत्पादों (Forest Products) का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒
झारखंड के वन अनेक प्रकार के लघु एवं प्रमुख वन उत्पादों से समृद्ध हैं। ये उत्पाद राज्य की ग्रामीण एवं आदिवासी अर्थव्यवस्था का आधार हैं। वनों से प्राप्त होने वाले उत्पादों का उपयोग खाद्य पदार्थों, औषधियों, घरेलू उपयोग तथा उद्योगों में किया जाता है। राज्य के हजारों परिवार महुआ, लाख, तेंदू पत्ता एवं बाँस जैसे उत्पादों के संग्रह एवं बिक्री से अपनी आजीविका चलाते हैं।
वन उत्पादों के उचित प्रबंधन एवं प्रसंस्करण से ग्रामीण लोगों की आय बढ़ाई जा सकती है तथा स्थानीय उद्योगों का भी विकास किया जा सकता है।
झारखंड के प्रमुख वन उत्पाद निम्नलिखित हैं—
(i) साल की लकड़ी।
(ii) महुआ।
(iii) लाख (Lac)।
(iv) तेंदू पत्ता।
(v) बाँस।
(vi) गोंद।
(vii) शहद।
(viii) औषधीय पौधे।
8. राष्ट्रीय उद्यान (National Park) क्या है?
उत्तर ⇒
राष्ट्रीय उद्यान (National Park) वह संरक्षित क्षेत्र होता है, जहाँ वनस्पतियों, वन्य जीवों एवं सम्पूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण किया जाता है। इन क्षेत्रों में शिकार, वृक्षों की कटाई तथा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पूर्णतः प्रतिबंधित रहता है। राष्ट्रीय उद्यानों का उद्देश्य संकटग्रस्त वन्य जीवों एवं दुर्लभ वनस्पतियों की रक्षा करना तथा प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखना है।
झारखंड का बेतला राष्ट्रीय उद्यान राज्य का सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है। यह पलामू जिले में स्थित है तथा हाथी, बाघ, तेंदुआ, हिरण, भालू एवं अनेक पक्षियों का प्राकृतिक आवास है।
राष्ट्रीय उद्यानों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) वन्य जीवों का संरक्षण होता है।
(ii) जैव विविधता सुरक्षित रहती है।
(iii) प्राकृतिक आवास की रक्षा होती है।
(iv) पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है।
(v) पर्यटन एवं वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा मिलता है।
9. वन्य जीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary) क्या है?
उत्तर ⇒
वन्य जीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary) वह संरक्षित क्षेत्र है, जहाँ वन्य जीवों एवं उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं। इन क्षेत्रों में वन्य जीवों का शिकार करना, उन्हें पकड़ना अथवा उनके आवास को नुकसान पहुँचाना कानूनन अपराध है। राष्ट्रीय उद्यान की तुलना में यहाँ कुछ सीमित मानवीय गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है।
झारखंड में दलमा वन्य जीव अभयारण्य, हजारीबाग वन्य जीव अभयारण्य, लवालौंग अभयारण्य तथा उधवा पक्षी अभयारण्य प्रमुख वन्य जीव अभयारण्य हैं।
वन्य जीव अभयारण्य का महत्व निम्नलिखित है—
(i) वन्य जीवों की सुरक्षा होती है।
(ii) विलुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है।
(iii) प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहता है।
(iv) जैव विविधता बनी रहती है।
(v) पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
10. झारखंड के सारंडा वन (Saranda Forest) का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
सारंडा वन झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित है। यह एशिया के सबसे बड़े साल (Sal) वनों में से एक माना जाता है। ‘सारंडा’ का अर्थ स्थानीय भाषा में ‘सात सौ पहाड़ियों का क्षेत्र’ होता है। यह वन जैव विविधता, वन्य जीवों एवं प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
सारंडा वन में हाथी, तेंदुआ, भालू, हिरण तथा अनेक दुर्लभ वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इसके साथ ही यह क्षेत्र लौह अयस्क के विशाल भंडार के लिए भी प्रसिद्ध है। खनन गतिविधियों के कारण इस वन पर पर्यावरणीय दबाव बढ़ा है, इसलिए इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
सारंडा वन का महत्व निम्नलिखित है—
(i) एशिया का सबसे बड़ा साल वन है।
(ii) जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है।
(iii) हाथियों का महत्वपूर्ण आवास है।
(iv) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
(v) झारखंड की प्राकृतिक धरोहर एवं पर्यटन का प्रमुख केंद्र है।
11. जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve) क्या है? इसका महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve) वह विस्तृत संरक्षित क्षेत्र होता है, जहाँ वनस्पतियों, वन्य जीवों, सूक्ष्मजीवों तथा उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण किया जाता है। इन क्षेत्रों का उद्देश्य केवल जैव विविधता की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग तथा सतत विकास को बढ़ावा देना भी होता है। यहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण शिक्षा तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जाता है।
यद्यपि झारखंड में कोई अधिसूचित जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र नहीं है, फिर भी राज्य के अनेक वन क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों का संरक्षण पर्यावरण संतुलन एवं वन्य जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का महत्व निम्नलिखित है—
(i) जैव विविधता का संरक्षण होता है।
(ii) दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा होती है।
(iii) वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा मिलता है।
(iv) पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है।
(v) प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग संभव होता है।
12. संकटग्रस्त (Endangered) एवं विलुप्त (Extinct) प्रजातियों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
वन्य जीवों की घटती संख्या के आधार पर वैज्ञानिक उन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करते हैं। संकटग्रस्त प्रजातियाँ वे होती हैं जिनकी संख्या इतनी कम हो गई है कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया, तो वे निकट भविष्य में विलुप्त हो सकती हैं। दूसरी ओर विलुप्त प्रजातियाँ वे होती हैं जो पृथ्वी से पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं और अब प्राकृतिक रूप से कहीं भी जीवित नहीं पाई जातीं।
झारखंड में हाथी, बाघ तथा कुछ अन्य वन्य जीवों की संख्या में कमी देखी गई है। इसलिए इनके संरक्षण के लिए विशेष योजनाएँ चलाई जा रही हैं।
| संकटग्रस्त प्रजातियाँ | विलुप्त प्रजातियाँ |
|---|---|
| (i) संख्या बहुत कम रह गई है। | (i) पृथ्वी से पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। |
| (ii) संरक्षण से बचाई जा सकती हैं। | (ii) दोबारा प्राकृतिक रूप से प्राप्त नहीं की जा सकतीं। |
| (iii) इनके विलुप्त होने का खतरा रहता है। | (iii) इनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। |
13. झारखंड में वनों पर निर्भर आदिवासी समुदायों का जीवन कैसा है?
उत्तर ⇒
झारखंड की बड़ी आदिवासी आबादी जैसे संथाल, मुंडा, उरांव, हो, बिरहोर, पहाड़िया आदि समुदायों का जीवन वनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। ये लोग ईंधन, चारा, लकड़ी, फल, महुआ, लाख, शहद, बाँस तथा तेंदू पत्तों जैसे वन उत्पादों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर रहते हैं। इनके सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में भी वनों का विशेष महत्व है।
वनों के संरक्षण से इन समुदायों की आजीविका सुरक्षित रहती है, जबकि वनों की कटाई से इनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।
आदिवासी समुदायों के लिए वनों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं।
(ii) खाद्य एवं औषधीय सामग्री उपलब्ध कराते हैं।
(iii) सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व रखते हैं।
(iv) रोजगार एवं आय का साधन हैं।
(v) पारंपरिक जीवन शैली का आधार हैं।
14. संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM) क्या है?
उत्तर ⇒
संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM) वन संरक्षण की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सरकार एवं स्थानीय ग्रामीण समुदाय मिलकर वनों का संरक्षण एवं प्रबंधन करते हैं। इस योजना का उद्देश्य वनों की सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना तथा उन्हें वन उत्पादों से लाभ पहुँचाना है।
झारखंड में भी अनेक क्षेत्रों में संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ कार्य कर रही हैं। इनके माध्यम से ग्रामीण लोग अवैध कटाई रोकने, वृक्षारोपण करने तथा जंगलों की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
संयुक्त वन प्रबंधन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
(i) वनों का संरक्षण करना।
(ii) स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
(iii) अवैध कटाई एवं शिकार रोकना।
(iv) वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।
(v) ग्रामीणों को वन उत्पादों से लाभ पहुँचाना।
15. झारखंड में वन संरक्षण के प्रमुख उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड के वन राज्य की प्राकृतिक एवं आर्थिक संपदा हैं। बढ़ती जनसंख्या, खनन, औद्योगीकरण तथा अवैध कटाई के कारण वन क्षेत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसलिए वनों के संरक्षण के लिए सरकार, स्थानीय समुदाय तथा प्रत्येक नागरिक को मिलकर कार्य करना चाहिए। वन संरक्षण से पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता एवं वन्य जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
झारखंड सरकार द्वारा वृक्षारोपण अभियान, संयुक्त वन प्रबंधन तथा वन्य जीव संरक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन प्रयासों को जनसहभागिता से और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
वन संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं—
(i) बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना।
(ii) अवैध कटाई पर सख्ती से रोक लगाना।
(iii) वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध लगाना।
(iv) संयुक्त वन प्रबंधन को बढ़ावा देना।
(v) जंगलों में आग लगने से बचाव करना।
(vi) लोगों में पर्यावरण एवं वन संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना।
(vii) खनन कार्यों के बाद पुनः वृक्षारोपण करना।
16. वन्य जीवों के संरक्षण (Wildlife Conservation) की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर ⇒
वन्य जीव प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। वे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक जीव खाद्य श्रृंखला का एक आवश्यक भाग होता है। यदि किसी एक प्रजाति का अस्तित्व समाप्त हो जाए, तो इसका प्रभाव अन्य जीवों तथा पूरे पर्यावरण पर पड़ता है। वर्तमान समय में वनों की कटाई, अवैध शिकार, खनन, औद्योगीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक वन्य जीवों का अस्तित्व संकट में है।
झारखंड में हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू एवं अन्य वन्य जीवों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। वन्य जीवों का संरक्षण केवल प्राकृतिक संतुलन के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।
वन्य जीवों के संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित है—
(i) जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए।
(ii) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए।
(iii) विलुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए।
(iv) प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए।
(v) पर्यटन एवं वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए।
17. झारखंड में हाथियों के संरक्षण का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
झारखंड भारत के प्रमुख हाथी आवास क्षेत्रों में से एक है। राज्य के दलमा वन्य जीव अभयारण्य, सारंडा वन, पलामू क्षेत्र तथा अन्य वन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में जंगली हाथी पाए जाते हैं। हाथी वनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं तथा जंगलों के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखते हैं।
वनों के सिकुड़ने एवं मानव बस्तियों के विस्तार के कारण मानव–हाथी संघर्ष की घटनाएँ बढ़ी हैं। इसलिए हाथियों के प्राकृतिक गलियारों (Elephant Corridors) की सुरक्षा एवं वन संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
हाथियों के संरक्षण का महत्व निम्नलिखित है—
(i) जैव विविधता की रक्षा होती है।
(ii) वनों का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है।
(iii) बीजों के प्रसार में सहायता मिलती है।
(iv) पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
(v) मानव–वन्य जीव संघर्ष को कम किया जा सकता है।
18. सामाजिक वानिकी (Social Forestry) क्या है?
उत्तर ⇒
सामाजिक वानिकी (Social Forestry) वह कार्यक्रम है जिसके अंतर्गत सरकारी भूमि, सड़क किनारे, नहरों के किनारे, विद्यालयों, ग्राम पंचायतों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर वृक्ष लगाए जाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य ईंधन, चारा, लकड़ी एवं अन्य वन उत्पादों की आवश्यकता को पूरा करना तथा प्राकृतिक वनों पर बढ़ते दबाव को कम करना है।
झारखंड में सामाजिक वानिकी के माध्यम से बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जा रहा है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में हरियाली एवं रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
सामाजिक वानिकी के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
(i) वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।
(ii) प्राकृतिक वनों पर दबाव कम करना।
(iii) पर्यावरण संरक्षण करना।
(iv) ग्रामीण लोगों को ईंधन एवं चारा उपलब्ध कराना।
(v) मिट्टी एवं जल संरक्षण करना।
19. वनों की कटाई (Deforestation) के दुष्परिणाम लिखिए।
उत्तर ⇒
वनों की अंधाधुंध कटाई वर्तमान समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है। झारखंड जैसे वनप्रधान राज्य में खनन, औद्योगीकरण एवं अवैध कटाई के कारण वन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। वनों के नष्ट होने से केवल पेड़ों की संख्या ही कम नहीं होती, बल्कि वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी समाप्त हो जाता है।
इसके अतिरिक्त वर्षा में कमी, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी का कटाव तथा प्राकृतिक आपदाओं की संभावना भी बढ़ जाती है। इसलिए वनों की कटाई पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है।
वनों की कटाई के प्रमुख दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं—
(i) जैव विविधता में कमी आती है।
(ii) वन्य जीवों का आवास नष्ट होता है।
(iii) मिट्टी का कटाव बढ़ता है।
(iv) वर्षा एवं जलवायु प्रभावित होती है।
(v) बाढ़ एवं सूखे जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं।
(vi) पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाता है।
20. झारखंड में वन एवं वन्य जीव संरक्षण के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रमुख प्रयास लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड सरकार वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएँ एवं कार्यक्रम चला रही है। राज्य में राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभयारण्य, हाथी गलियारे (Elephant Corridors), वृक्षारोपण अभियान तथा संयुक्त वन प्रबंधन जैसी योजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा की जा रही है। इसके साथ ही अवैध कटाई एवं शिकार पर रोक लगाने के लिए वन विभाग द्वारा नियमित निगरानी भी की जाती है।
स्थानीय ग्रामीण एवं आदिवासी समुदायों की भागीदारी से वन संरक्षण को और अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लोगों की आजीविका भी सुरक्षित होती है।
वन एवं वन्य जीव संरक्षण के प्रमुख सरकारी प्रयास निम्नलिखित हैं—
(i) राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्यों का विकास।
(ii) संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) को बढ़ावा देना।
(iii) बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाना।
(iv) अवैध कटाई एवं शिकार पर रोक लगाना।
(v) हाथी गलियारों एवं वन्य जीव आवासों का संरक्षण।
(vi) लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना।
(vii) वन संरक्षण से संबंधित कानूनों का सख्ती से पालन कराना।
21. वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980) क्या है?
उत्तर ⇒
भारत सरकार ने देश के घटते वन क्षेत्र को बचाने तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाने के उद्देश्य से वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू किया। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी वन भूमि का उपयोग गैर-वानिकी कार्यों, जैसे उद्योग, खनन, सड़क या भवन निर्माण के लिए केंद्र सरकार की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। इस कानून का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों का संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना तथा प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।
झारखंड जैसे वनसमृद्ध राज्य में इस अधिनियम का विशेष महत्व है, क्योंकि यहाँ खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों के कारण वन क्षेत्रों पर दबाव बना रहता है। इस कानून के माध्यम से वनों की अवैध कटाई एवं अतिक्रमण को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।
वन संरक्षण अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
(i) वनों की अंधाधुंध कटाई रोकना।
(ii) वन भूमि का संरक्षण करना।
(iii) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना।
(iv) गैर-वानिकी कार्यों के लिए अनुमति व्यवस्था लागू करना।
(v) जैव विविधता एवं वन्य जीवों की रक्षा करना।
22. वनों का पर्यावरणीय महत्व (Environmental Importance of Forests) लिखिए।
उत्तर ⇒
वन प्रकृति द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं। ये वायुमंडल में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड के संतुलन को बनाए रखते हैं तथा जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, वर्षा को प्रभावित करते हैं तथा भूजल स्तर बनाए रखने में सहायता करते हैं।
झारखंड के घने साल वन राज्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यदि वन नष्ट हो जाएँ, तो बाढ़, सूखा, मिट्टी का कटाव एवं तापमान वृद्धि जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
वनों का पर्यावरणीय महत्व निम्नलिखित है—
(i) वायु को शुद्ध बनाते हैं।
(ii) वर्षा एवं जलवायु को संतुलित रखते हैं।
(iii) मिट्टी के कटाव को रोकते हैं।
(iv) भूजल संरक्षण में सहायता करते हैं।
(v) कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करते हैं।
(vi) प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करते हैं।
23. झारखंड के प्रमुख वनों के प्रकार (Types of Forests in Jharkhand) का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒
झारखंड की जलवायु, वर्षा एवं भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय पर्णपाती (Tropical Deciduous Forests) वन पाए जाते हैं। इन वनों में वर्ष के एक निश्चित समय पर पेड़ों की पत्तियाँ झड़ जाती हैं। राज्य के अधिकांश भाग में साल (Sal) के वन प्रमुख रूप से विकसित हैं।
इसके अतिरिक्त कुछ क्षेत्रों में बाँस, पलाश, महुआ, कुसुम, सागवान तथा मिश्रित वनस्पतियाँ भी पाई जाती हैं। ये वन राज्य की जैव विविधता एवं वन्य जीवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
झारखंड के प्रमुख वन प्रकार निम्नलिखित हैं—
(i) उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन।
(ii) उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन।
(iii) साल (Sal) के वन।
(iv) मिश्रित वन।
(v) बाँस एवं झाड़ी वाले वन।
24. वन एवं वन्य जीव संसाधनों के संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका लिखिए।
उत्तर ⇒
वन संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी भी अत्यंत आवश्यक है। विशेषकर झारखंड के आदिवासी एवं ग्रामीण समुदाय लंबे समय से वनों के संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग की परंपरा का पालन करते आए हैं। यदि स्थानीय लोगों को वन संरक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो वनों की सुरक्षा अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) जैसी योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोग वृक्षारोपण, अवैध कटाई रोकने तथा जंगलों की निगरानी में सक्रिय योगदान दे रहे हैं।
स्थानीय लोगों की प्रमुख भूमिका निम्नलिखित है—
(i) अवैध कटाई रोकने में सहयोग करना।
(ii) वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भाग लेना।
(iii) वन्य जीवों की सुरक्षा करना।
(iv) जंगलों में आग लगने से बचाव करना।
(v) वन संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना।
(vi) प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करना।
25. झारखंड में मानव–वन्य जीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड में मानव–वन्य जीव संघर्ष एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। वन क्षेत्रों के सिकुड़ने, खनन, सड़क निर्माण, औद्योगीकरण तथा मानव बस्तियों के विस्तार के कारण वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर गाँवों एवं खेतों की ओर आने लगे हैं। विशेष रूप से हाथियों के झुंड फसलों एवं घरों को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे मानव एवं वन्य जीव दोनों को हानि होती है।
इस समस्या के समाधान के लिए वनों का संरक्षण, हाथी गलियारों (Elephant Corridors) की सुरक्षा तथा स्थानीय लोगों की भागीदारी आवश्यक है।
मानव–वन्य जीव संघर्ष के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(i) वनों की कटाई एवं वन क्षेत्र में कमी।
(ii) खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार।
(iii) मानव बस्तियों का जंगलों तक फैलना।
(iv) वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास का नष्ट होना।
(v) हाथी गलियारों में बाधा उत्पन्न होना।
(vi) प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता मानवीय दबाव।
26. वनों का जलवायु (Climate) पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर ⇒
वन पृथ्वी की जलवायु को संतुलित बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे वायु शुद्ध रहती है। वन वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की प्रक्रिया द्वारा वातावरण में नमी बढ़ाते हैं, जिससे वर्षा होने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त वन तापमान को नियंत्रित करते हैं तथा तेज हवाओं एवं धूल भरी आँधियों के प्रभाव को कम करते हैं।
झारखंड के घने साल वन राज्य के तापमान एवं वर्षा को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यदि वन लगातार नष्ट होते रहे, तो जलवायु परिवर्तन, सूखा, अत्यधिक गर्मी तथा वर्षा में असंतुलन जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
वनों का जलवायु पर प्रभाव निम्नलिखित है—
(i) वर्षा को प्रभावित करते हैं।
(ii) वायु को शुद्ध बनाते हैं।
(iii) तापमान को नियंत्रित रखते हैं।
(iv) कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करते हैं।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं।
27. झारखंड में साल (Sal) वृक्ष का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
साल (Sal) झारखंड का सबसे प्रमुख एवं बहुमूल्य वन वृक्ष है। राज्य के अधिकांश वन क्षेत्रों में साल के घने जंगल पाए जाते हैं। इसकी लकड़ी अत्यंत मजबूत एवं टिकाऊ होती है, इसलिए इसका उपयोग भवन निर्माण, फर्नीचर, रेल की स्लीपर तथा अन्य औद्योगिक कार्यों में किया जाता है। साल के पत्तों से दोना-पत्तल बनाए जाते हैं, जो ग्रामीण लोगों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
साल के वन अनेक वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी हैं। झारखंड के सारंडा वन एशिया के सबसे बड़े साल वनों में गिने जाते हैं।
साल वृक्ष का महत्व निम्नलिखित है—
(i) मजबूत एवं टिकाऊ लकड़ी प्रदान करता है।
(ii) वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास है।
(iii) पत्तों से दोना एवं पत्तल बनाए जाते हैं।
(iv) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
(v) ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय की आय का प्रमुख स्रोत है।
28. झारखंड में लाख (Lac) का आर्थिक महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड भारत के प्रमुख लाख उत्पादक राज्यों में से एक है। लाख एक प्राकृतिक राल (Natural Resin) है, जो विशेष प्रकार के कीटों द्वारा कुसुम, पलाश एवं बेर जैसे वृक्षों पर उत्पन्न की जाती है। इसका उपयोग वार्निश, पॉलिश, आभूषण, खिलौने, सौंदर्य प्रसाधन तथा विभिन्न औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
झारखंड के अनेक ग्रामीण एवं आदिवासी परिवार लाख उत्पादन से अपनी आजीविका चलाते हैं। लाख का निर्यात भी किया जाता है, जिससे राज्य एवं देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
लाख का आर्थिक महत्व निम्नलिखित है—
(i) ग्रामीण लोगों को रोजगार प्रदान करती है।
(ii) आदिवासी समुदाय की आय बढ़ाती है।
(iii) विभिन्न उद्योगों में उपयोग होती है।
(iv) निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
(v) ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती है।
29. झारखंड में हाथी गलियारा (Elephant Corridor) क्या है?
उत्तर ⇒
हाथी गलियारा (Elephant Corridor) वह प्राकृतिक मार्ग होता है, जिसके माध्यम से हाथियों के झुंड एक वन क्षेत्र से दूसरे वन क्षेत्र में सुरक्षित रूप से आवागमन करते हैं। झारखंड में दलमा, सारंडा, पलामू तथा अन्य वन क्षेत्रों के बीच ऐसे कई प्राकृतिक गलियारे मौजूद हैं। ये हाथियों के भोजन, पानी एवं प्रजनन के लिए आवश्यक होते हैं।
यदि इन गलियारों में सड़क, रेलवे, खनन अथवा मानव बस्तियाँ विकसित हो जाएँ, तो हाथियों का प्राकृतिक मार्ग बाधित हो जाता है, जिससे मानव–हाथी संघर्ष की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
हाथी गलियारों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) हाथियों के सुरक्षित आवागमन में सहायता करते हैं।
(ii) मानव–वन्य जीव संघर्ष को कम करते हैं।
(iii) जैव विविधता के संरक्षण में सहायक हैं।
(iv) वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास को जोड़ते हैं।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं।
30. वन एवं वन्य जीव संरक्षण में विद्यार्थियों की भूमिका लिखिए।
उत्तर ⇒
वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण केवल सरकार या वन विभाग का कार्य नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। विद्यार्थी पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे वृक्षारोपण कार्यक्रमों में भाग लेकर, पर्यावरण दिवस मनाकर तथा लोगों को वन संरक्षण का महत्व समझाकर प्रकृति की रक्षा में योगदान दे सकते हैं।
झारखंड जैसे वनप्रधान राज्य में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी से वन संरक्षण अभियान को और अधिक सफल बनाया जा सकता है। छोटी-छोटी पहल भी भविष्य में बड़े सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
विद्यार्थियों की प्रमुख भूमिका निम्नलिखित है—
(i) अधिक से अधिक वृक्ष लगाना।
(ii) वनों की अवैध कटाई का विरोध करना।
(iii) वन्य जीवों की सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करना।
(iv) पर्यावरण संरक्षण अभियानों में भाग लेना।
(v) प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना।
(vi) स्वच्छ एवं हरित पर्यावरण बनाए रखने में सहयोग करना।
31. वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) क्या है?
उत्तर ⇒
भारत में वन्य जीवों की घटती संख्या तथा अवैध शिकार की बढ़ती घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act, 1972) लागू किया। इस अधिनियम के अंतर्गत वन्य जीवों के शिकार, व्यापार तथा उनके प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुँचाने पर कानूनी प्रतिबंध लगाया गया है। साथ ही राष्ट्रीय उद्यानों, वन्य जीव अभयारण्यों एवं संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है।
झारखंड में हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू तथा अन्य वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए इस अधिनियम का प्रभावी रूप से पालन किया जाता है। इससे राज्य की जैव विविधता को सुरक्षित रखने में सहायता मिलती है।
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
(i) वन्य जीवों के शिकार पर रोक लगाना।
(ii) संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण करना।
(iii) राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों का विकास करना।
(iv) जैव विविधता की रक्षा करना।
(v) वन्य जीवों के अवैध व्यापार पर नियंत्रण करना।
32. झारखंड में खनन (Mining) का वनों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर ⇒
झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, ताँबा, बॉक्साइट तथा अभ्रक जैसे अनेक खनिज पाए जाते हैं। इन खनिजों के उत्खनन के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का उपयोग किया जाता है। खनन गतिविधियों के कारण अनेक स्थानों पर वन क्षेत्र कम हुए हैं तथा वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हुए हैं।
खनन से वायु एवं जल प्रदूषण बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता कम होती है तथा मानव–वन्य जीव संघर्ष भी बढ़ जाता है। इसलिए खनन कार्यों के साथ-साथ पुनर्वनीकरण (Reforestation) एवं पर्यावरण संरक्षण के उपाय अपनाना आवश्यक है।
वनों पर खनन के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं—
(i) वन क्षेत्र में कमी आती है।
(ii) वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है।
(iii) वायु एवं जल प्रदूषण बढ़ता है।
(iv) मिट्टी का कटाव बढ़ता है।
(v) जैव विविधता प्रभावित होती है।
(vi) मानव–वन्य जीव संघर्ष बढ़ता है।
33. पुनर्वनीकरण (Reforestation) क्या है? इसका महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
किसी क्षेत्र में कटे हुए अथवा नष्ट हो चुके वनों के स्थान पर पुनः वृक्ष लगाकर वन विकसित करने की प्रक्रिया को पुनर्वनीकरण (Reforestation) कहा जाता है। इसका उद्देश्य वन क्षेत्र बढ़ाना, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना है।
झारखंड में वनों की कटाई एवं खनन से प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वनीकरण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इससे वन्य जीवों के लिए नए आवास विकसित होते हैं तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
पुनर्वनीकरण का महत्व निम्नलिखित है—
(i) वन क्षेत्र में वृद्धि होती है।
(ii) पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है।
(iii) मिट्टी का कटाव कम होता है।
(iv) वन्य जीवों को नया आवास मिलता है।
(v) जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।
34. वन एवं वन्य जीव संसाधनों के संरक्षण में जन-जागरूकता का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सहयोग आवश्यक है। यदि लोग वनों के महत्व, जैव विविधता तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होंगे, तो वे वृक्षों की कटाई रोकने, वन्य जीवों की रक्षा करने तथा प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करने के लिए प्रेरित होंगे।
झारखंड में विद्यालयों, ग्राम सभाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं तथा वन विभाग द्वारा समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। इन अभियानों के माध्यम से लोगों को वन संरक्षण के प्रति प्रेरित किया जाता है।
जन-जागरूकता का महत्व निम्नलिखित है—
(i) वनों की अवैध कटाई कम होती है।
(ii) वन्य जीवों के शिकार पर रोक लगाने में सहायता मिलती है।
(iii) वृक्षारोपण को बढ़ावा मिलता है।
(iv) पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी बढ़ती है।
(v) प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित होता है।
35. वन एवं वन्य जीव संसाधनों का झारखंड के आर्थिक विकास में क्या योगदान है?
उत्तर ⇒
झारखंड की अर्थव्यवस्था में वन एवं वन्य जीव संसाधनों का महत्वपूर्ण योगदान है। राज्य के लाखों लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से वनों पर निर्भर हैं। वनों से लकड़ी, महुआ, लाख, तेंदू पत्ता, बाँस, शहद, औषधीय पौधे तथा अन्य लघु वनोपज प्राप्त होते हैं। इन उत्पादों से ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय की आय बढ़ती है।
इसके अतिरिक्त वन पर्यटन, वन आधारित उद्योग तथा पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से भी राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं। इसलिए झारखंड के सतत आर्थिक विकास के लिए वन संसाधनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
झारखंड के आर्थिक विकास में वनों का योगदान निम्नलिखित है—
(i) रोजगार एवं आजीविका प्रदान करते हैं।
(ii) लघु वन उत्पादों से आय होती है।
(iii) वन आधारित उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं।
(iv) पर्यटन को बढ़ावा देते हैं।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हैं।
(vi) ग्रामीण एवं आदिवासी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाते हैं।
36. झारखंड में वन एवं वन्य जीव संसाधनों के संरक्षण में वन विभाग की भूमिका लिखिए।
उत्तर ⇒
झारखंड में वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण की मुख्य जिम्मेदारी वन विभाग (Forest Department) की होती है। वन विभाग राज्य के वनों की सुरक्षा, वन्य जीवों के संरक्षण, वृक्षारोपण, वन अपराधों की रोकथाम तथा वन कानूनों के पालन का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्य जीव अभयारण्यों का प्रबंधन भी वन विभाग द्वारा किया जाता है।
वन विभाग स्थानीय ग्रामीणों एवं वन संरक्षण समितियों के सहयोग से संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) जैसी योजनाओं का संचालन करता है। साथ ही जंगलों में आग लगने से रोकना, अवैध कटाई एवं शिकार पर नियंत्रण रखना तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना भी इसकी प्रमुख जिम्मेदारियाँ हैं।
वन विभाग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
(i) वनों की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।
(ii) अवैध कटाई एवं शिकार पर रोक लगाना।
(iii) वृक्षारोपण अभियान चलाना।
(iv) वन्य जीव अभयारण्यों का प्रबंधन करना।
(v) वन संरक्षण कानूनों का पालन कराना।
(vi) लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना।
37. झारखंड के बेतला राष्ट्रीय उद्यान (Betla National Park) का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒
बेतला राष्ट्रीय उद्यान झारखंड का सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है। यह पलामू जिले में स्थित है तथा पलामू टाइगर रिजर्व का महत्वपूर्ण भाग है। इसकी स्थापना वन्य जीवों एवं प्राकृतिक वनस्पतियों के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी। यहाँ साल, बाँस तथा मिश्रित वन पाए जाते हैं।
बेतला राष्ट्रीय उद्यान हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, हिरण, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर तथा अनेक पक्षियों का प्राकृतिक आवास है। यह झारखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी शामिल है तथा पर्यावरण शिक्षा एवं वन्य जीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
बेतला राष्ट्रीय उद्यान का महत्व निम्नलिखित है—
(i) झारखंड का प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है।
(ii) पलामू टाइगर रिजर्व का भाग है।
(iii) अनेक वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास है।
(iv) जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(v) पर्यटन एवं पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देता है।
38. झारखंड के दलमा वन्य जीव अभयारण्य (Dalma Wildlife Sanctuary) का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
दलमा वन्य जीव अभयारण्य झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में स्थित है। इसकी स्थापना मुख्य रूप से जंगली हाथियों के संरक्षण के उद्देश्य से की गई थी। यह अभयारण्य दलमा पर्वत श्रृंखला में स्थित है तथा घने वनों एवं समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
यहाँ हाथियों के अलावा तेंदुआ, भालू, हिरण, जंगली सूअर तथा अनेक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। दलमा क्षेत्र हाथियों के प्राकृतिक आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग भी है। इसलिए इसका संरक्षण मानव–वन्य जीव संघर्ष को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दलमा अभयारण्य का महत्व निम्नलिखित है—
(i) हाथियों का प्रमुख प्राकृतिक आवास है।
(ii) जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है।
(iii) वन्य जीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(iv) पर्यटन को बढ़ावा देता है।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
39. झारखंड में वृक्षारोपण (Afforestation) का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
वृक्षारोपण का अर्थ है खाली अथवा वनविहीन क्षेत्रों में नए पेड़ लगाना। झारखंड में बढ़ती जनसंख्या, खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों के कारण अनेक क्षेत्रों में वन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। ऐसे क्षेत्रों में वृक्षारोपण करके हरित आवरण बढ़ाया जा सकता है।
वृक्षारोपण से पर्यावरण संरक्षण, जलवायु संतुलन, मिट्टी संरक्षण तथा वन्य जीवों के लिए नए आवास का विकास होता है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन, चारा एवं अन्य वन उत्पादों की उपलब्धता भी बढ़ती है।
वृक्षारोपण का महत्व निम्नलिखित है—
(i) वन क्षेत्र में वृद्धि होती है।
(ii) पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है।
(iii) मिट्टी का कटाव कम होता है।
(iv) वर्षा एवं जलवायु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
(v) वन्य जीवों को नया आवास मिलता है।
(vi) प्रदूषण कम करने में सहायता मिलती है।
40. ‘वन एवं वन्य जीव संसाधन’ अध्याय का निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर ⇒
वन एवं वन्य जीव संसाधन प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। ये केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में ही नहीं, बल्कि मानव जीवन, जैव विविधता तथा आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। झारखंड जैसे वनसमृद्ध राज्य में वनों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ की बड़ी आबादी, विशेषकर आदिवासी समुदाय, अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर है।
खनन, औद्योगीकरण, अवैध कटाई एवं बढ़ती जनसंख्या के कारण वन एवं वन्य जीवों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसलिए वन संरक्षण अधिनियम, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, संयुक्त वन प्रबंधन, वृक्षारोपण तथा जन-जागरूकता जैसे उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है। यदि सरकार, स्थानीय समुदाय एवं नागरिक मिलकर कार्य करें, तो झारखंड के वन एवं वन्य जीव संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रखी जा सकती है।