Class 9 History Revision Notes
आधुनिक विश्व में चरवाहे
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Chapter Overview
| Class | 9 |
| Subject | History |
| Chapter Name | आधुनिक विश्व में चरवाहे Pastoralists in the Modern World |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
आधुनिक विश्व में चरवाहे Revision Notes
1. घुमंतू चरवाहे कौन होते हैं? उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ घुमंतू चरवाहे वे लोग होते हैं जो किसी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते। वे अपने पशुओं के लिए पानी, चारा और अच्छे चरागाहों की तलाश में मौसम के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। इनके पास भेड़, बकरी, ऊँट, गाय या अन्य पशुओं के बड़े झुंड होते हैं। चरवाहों की आजीविका मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित होती है। वे अपनी यात्रा का मार्ग मौसम, वर्षा, पानी की उपलब्धता और चरागाहों की स्थिति को ध्यान में रखकर तय करते हैं। कई समुदाय खेती, व्यापार और ऊन या कंबल बनाने जैसे कार्य भी करते हैं। इस प्रकार घुमंतू चरवाही प्रकृति के साथ संतुलित जीवन-शैली का उदाहरण है।
(i) एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते।
(ii) पशुओं के साथ लगातार यात्रा करते हैं।
(iii) पानी और चरागाह की तलाश करते हैं।
(iv) पशुपालन इनकी मुख्य आजीविका है।
(v) मौसम के अनुसार स्थान बदलते हैं।
2. भाबर और बुग्याल में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ हिमालय क्षेत्र में भाबर और बुग्याल दो भिन्न प्रकार के प्राकृतिक क्षेत्र हैं। भाबर गढ़वाल और कुमाऊँ की पहाड़ियों के निचले भाग में स्थित शुष्क या सूखे जंगलों का क्षेत्र होता है। सर्दियों में चरवाहे अपने पशुओं के साथ यहीं रहते हैं क्योंकि यहाँ झाड़ियाँ और चारा उपलब्ध रहता है। दूसरी ओर बुग्याल ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित विशाल घास के मैदान होते हैं। गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद यहाँ हरी-भरी घास उगती है, जो पशुओं के लिए उत्तम चारा होती है। इसलिए चरवाहे गर्मियों में बुग्याल की ओर चले जाते हैं।
| भाबर | बुग्याल |
|---|---|
| पहाड़ियों का निचला भाग | ऊँचे पर्वतीय घास के मैदान |
| शुष्क जंगल | हरी-भरी घास |
| सर्दियों का निवास | गर्मियों का चरागाह |
(i) भाबर निचले क्षेत्र में होता है।
(ii) बुग्याल ऊँचे पर्वतों पर होता है।
(iii) भाबर में शुष्क जंगल मिलते हैं।
(iv) बुग्याल में हरी घास मिलती है।
(v) दोनों का उपयोग अलग-अलग मौसम में होता है।
3. जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल चरवाहों की मौसमी जीवनचर्या का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ गुज्जर-बकरवाल जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध घुमंतू चरवाहे हैं। सर्दियों में जब ऊँची पहाड़ियों पर बर्फ जम जाती है, तब वे अपने पशुओं के साथ शिवालिक की निचली पहाड़ियों की ओर उतर आते हैं, जहाँ सूखी झाड़ियों से पशुओं को चारा मिलता है। अप्रैल के अंत में वे उत्तर की ओर यात्रा शुरू करते हैं और पीर पंजाल दर्रा पार करके कश्मीर घाटी पहुँचते हैं। गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद वहाँ हरी घास उपलब्ध होती है, जिससे उनके पशुओं को भरपूर भोजन मिलता है। सितंबर आते ही वे पुनः अपने शीतकालीन ठिकानों की ओर लौट जाते हैं। इस प्रकार उनका जीवन पूरी तरह मौसमी प्रवास पर आधारित है।
(i) सर्दियों में शिवालिक आते हैं।
(ii) गर्मियों में कश्मीर घाटी जाते हैं।
(iii) पीर पंजाल दर्रा पार करते हैं।
(iv) हरी घास वाले चरागाहों का उपयोग करते हैं।
(v) सितंबर में वापस लौट आते हैं।
4. हिमाचल प्रदेश के गद्दी चरवाहों की मौसमी गतिविधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ गद्दी समुदाय हिमाचल प्रदेश का प्रमुख घुमंतू चरवाहा समुदाय है। सर्दियों में ये शिवालिक की निचली पहाड़ियों में रहते हैं और अपने पशुओं को झाड़ियों में चराते हैं। अप्रैल महीने में वे उत्तर की ओर प्रस्थान करते हैं तथा लाहौल और स्पीति की ओर पहुँचते हैं। बर्फ पिघलने के बाद वे ऊँचे घास के मैदानों में अपने पशुओं को चराते हैं। सितंबर में वापसी के समय वे लाहौल-स्पीति के गाँवों में रुककर गर्मियों की फसल काटते और सर्दियों की बुवाई में सहायता करते हैं। इसके बाद पुनः शिवालिक लौट आते हैं। उनका जीवन पशुपालन और कृषि दोनों से जुड़ा हुआ है।
(i) शिवालिक में सर्दियाँ बिताते हैं।
(ii) गर्मियों में लाहौल-स्पीति जाते हैं।
(iii) ऊँचे घास के मैदानों का उपयोग करते हैं।
(iv) खेती में भी सहयोग करते हैं।
(v) हर वर्ष मौसमी प्रवास करते हैं।
5. महाराष्ट्र के धंगर समुदाय की जीवनशैली का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ धंगर महाराष्ट्र का प्रसिद्ध चरवाहा समुदाय है। इनका मुख्य व्यवसाय भेड़-बकरियाँ पालना है, जबकि कुछ लोग कंबल और चादरें भी बनाते हैं। वर्षा ऋतु में ये महाराष्ट्र के शुष्क मध्य पठार में रहते हैं, जहाँ कंटीली झाड़ियाँ उनके पशुओं का भोजन बनती हैं। अक्टूबर में बाजरे की कटाई के बाद वे अपने पशुओं के साथ कोंकण क्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं। वहाँ उनके पशु खेतों की ठूंठ खाते हैं और गोबर से खेतों को उपजाऊ बनाते हैं। बदले में किसान उन्हें चावल देते हैं। मानसून आने पर वे पुनः पठारी क्षेत्रों में लौट जाते हैं।
(i) धंगर महाराष्ट्र का चरवाहा समुदाय है।
(ii) भेड़-बकरियाँ पालते हैं।
(iii) कोंकण की ओर प्रवास करते हैं।
(iv) खेतों को प्राकृतिक खाद मिलती है।
(v) मानसून में वापस लौटते हैं।
6. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के चरवाहों की मौसमी जीवनचर्या स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के चरवाहे सूखे मध्य पठार में रहते थे। यहाँ गोल्ला समुदाय गाय-भैंस पालता था, जबकि कुरुमा और कुरुबा समुदाय भेड़-बकरियाँ पालते थे तथा हाथ से बुने कंबल बेचते थे। इनकी मौसमी यात्रा हिमालयी चरवाहों से अलग थी। ये सर्दी-गर्मी के बजाय वर्षा और सूखे के अनुसार स्थान बदलते थे। सूखे के मौसम में ये तटीय क्षेत्रों की ओर चले जाते थे और मानसून आने पर पुनः पठारी क्षेत्रों में लौट आते थे क्योंकि उस समय तटीय क्षेत्र दलदली हो जाते थे। इस प्रकार उनकी जीवनशैली स्थानीय जलवायु पर आधारित थी।
(i) सूखे पठार में रहते थे।
(ii) वर्षा के अनुसार प्रवास करते थे।
(iii) गोल्ला गाय-भैंस पालते थे।
(iv) कुरुमा और कुरुबा भेड़-बकरियाँ पालते थे।
(v) कंबल बनाना भी उनका कार्य था।
7. उत्तर भारत के बंजारों का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ बंजारे उत्तर भारत के प्रसिद्ध घुमंतू व्यापारी और चरवाहे थे। वे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों में रहते थे। वे लंबी दूरी की यात्राएँ करते थे और गाँव-गाँव जाकर अनाज, चारा तथा अन्य वस्तुओं का व्यापार करते थे। साथ ही वे खेत जोतने वाले पशु भी बेचते थे। अपनी यात्रा के दौरान वे अपने पशुओं के लिए उपयुक्त चरागाहों की भी खोज करते रहते थे। इस प्रकार बंजारों का जीवन व्यापार, परिवहन और पशुपालन का अनूठा मिश्रण था।
(i) बंजारे घुमंतू व्यापारी थे।
(ii) लंबी दूरी की यात्रा करते थे।
(iii) पशुओं का व्यापार करते थे।
(iv) गाँवों से वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे।
(v) चरागाहों की खोज करते थे।
8. राजस्थान के राइका चरवाहों की जीवनचर्या का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ राइका राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों के प्रमुख चरवाहे हैं। वे बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर जैसे क्षेत्रों में रहते हैं। वर्षा ऋतु में स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्ध होने के कारण वे अपने गाँवों में ही रहते हैं। अक्टूबर के बाद जब चरागाह सूख जाते हैं, तब वे अपने पशुओं के साथ दूसरे क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं और अगली वर्षा आने पर वापस लौटते हैं। राइका समुदाय का एक वर्ग ऊँट पालता है, जबकि दूसरा भेड़-बकरियाँ पालता है। उनकी आजीविका चरवाही और खेती दोनों पर आधारित होती है।
(i) राइका राजस्थान के चरवाहे हैं।
(ii) वर्षा में गाँवों में रहते हैं।
(iii) अक्टूबर के बाद प्रवास करते हैं।
(iv) ऊँट तथा भेड़-बकरियाँ पालते हैं।
(v) खेती भी करते हैं।
9. चरवाहा जीवन की सामान्य चुनौतियाँ और रणनीतियाँ लिखिए।
उत्तर ⇒ चरवाहों का जीवन अनेक चुनौतियों से भरा होता है। उन्हें हर वर्ष यह योजना बनानी पड़ती है कि कहाँ और कितने समय तक रुकना है। वे पानी, चारे और सुरक्षा को ध्यान में रखकर अपने मार्ग का चयन करते हैं। रास्ते में आने वाले गाँवों के किसानों से अच्छे संबंध बनाए रखते हैं ताकि उनके पशु खेतों की ठूंठ खाकर खेतों को उपजाऊ बना सकें। अनेक चरवाहे पशुपालन के साथ खेती, व्यापार और ऊन या कंबल बनाने जैसे कार्य भी करते हैं। इस प्रकार वे विभिन्न साधनों से अपनी आजीविका सुरक्षित रखते हैं।
(i) यात्रा की योजना बनानी पड़ती है।
(ii) पानी और चारे का ध्यान रखते हैं।
(iii) किसानों से अच्छे संबंध रखते हैं।
(iv) कई प्रकार के कार्य करते हैं।
(v) पशुपालन मुख्य आजीविका है।
10. भारत में विभिन्न चरवाहा समुदायों की जीवनशैली की तुलना कीजिए।
उत्तर ⇒ भारत के विभिन्न चरवाहा समुदाय अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रकार का जीवन जीते हैं। हिमालय के गुज्जर-बकरवाल और गद्दी सर्दी-गर्मी के अनुसार ऊँचाई बदलते हैं। महाराष्ट्र के धंगर वर्षा और फसलों के अनुसार कोंकण तथा पठार के बीच यात्रा करते हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के चरवाहे वर्षा और सूखे के आधार पर स्थान बदलते हैं, जबकि राजस्थान के राइका रेगिस्तानी परिस्थितियों के अनुसार प्रवास करते हैं। इन सभी समुदायों की जीवनशैली अलग होने पर भी उनका मुख्य आधार पशुपालन और मौसमी प्रवास ही है।
(i) सभी समुदाय पशुपालन करते हैं।
(ii) मौसमी प्रवास करते हैं।
(iii) भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीते हैं।
(iv) विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके अपनाते हैं।
(v) चरवाही उनकी प्रमुख आजीविका है।
11. औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों के जीवन में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों के जीवन में अनेक बड़े परिवर्तन आए। अंग्रेज़ सरकार ने खेती का विस्तार किया, जिससे चरागाहों का क्षेत्र लगातार घटने लगा। वन अधिनियम लागू करके जंगलों में चराई पर प्रतिबंध लगाया गया तथा चरवाहों की आवाजाही पर नियंत्रण स्थापित किया गया। कई घुमंतू समुदायों को संदेह की दृष्टि से देखा गया और उन पर कठोर नियम लागू किए गए। चरवाही कर (Grazing Tax) भी लगाया गया, जिससे उनकी आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ गईं। इन सभी नीतियों के कारण चरवाहों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई और उन्हें नए तरीकों से अपनी आजीविका चलानी पड़ी।
(i) चरागाह कम हो गए।
(ii) वन कानून लागू हुए।
(iii) चरवाही पर नियंत्रण बढ़ा।
(iv) कर लगाया गया।
(v) पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ।
12. खेती के विस्तार से चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ सरकार अधिक लगान प्राप्त करने और उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने हेतु खेती का विस्तार करना चाहती थी। इसके लिए गैर-खेती भूमि और चरागाहों को कृषि भूमि में बदल दिया गया। सरकार ने परती भूमि विकास कानून बनाकर इन क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लिया और खेती के लिए लोगों को दे दिया। परिणामस्वरूप चरवाहों के लिए उपलब्ध चरागाहों का क्षेत्रफल लगातार घटता गया। पशुओं के लिए पर्याप्त चारा नहीं मिल सका और उन्हें नए चरागाहों की खोज में अधिक दूरी तय करनी पड़ी। इससे उनकी आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
(i) चरागाह खेतों में बदल गए।
(ii) चारे की कमी हुई।
(iii) पशुपालन कठिन हुआ।
(iv) नए चरागाह खोजने पड़े।
(v) चरवाहों की समस्याएँ बढ़ीं।
13. वन अधिनियमों का चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेज़ सरकार ने वन अधिनियम लागू किए। इसके अंतर्गत जंगलों को आरक्षित और संरक्षित वनों में बाँट दिया गया। आरक्षित वनों में चरवाहों का प्रवेश लगभग प्रतिबंधित कर दिया गया, जबकि संरक्षित वनों में उनके पारंपरिक अधिकार सीमित कर दिए गए। जंगलों में प्रवेश के लिए परमिट प्रणाली लागू हुई और निर्धारित समय से अधिक रुकने पर जुर्माना लगाया जाता था। इससे चरवाहों की स्वतंत्र आवाजाही समाप्त हो गई तथा उनके पारंपरिक चरागाहों तक पहुँच कठिन हो गई।
(i) वन अधिनियम लागू हुए।
(ii) आरक्षित वन बनाए गए।
(iii) परमिट प्रणाली लागू हुई।
(iv) चराई पर नियंत्रण बढ़ा।
(v) पारंपरिक अधिकार सीमित हुए।
14. अंग्रेज़ घुमंतू चरवाहों पर अविश्वास क्यों करते थे?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ अधिकारियों का मानना था कि एक स्थान पर बसे हुए लोगों पर शासन करना आसान होता है, जबकि घुमंतू लोग लगातार स्थान बदलते रहते हैं, इसलिए उन पर नियंत्रण कठिन होता है। इसी सोच के कारण वे घुमंतू चरवाहों, व्यापारियों और दस्तकारों पर विश्वास नहीं करते थे। वर्ष 1871 में अपराधी जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) लागू किया गया, जिसके अंतर्गत कई घुमंतू समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया। उन्हें निश्चित गाँवों में बसने के लिए मजबूर किया गया तथा बिना अनुमति यात्रा करने पर रोक लगा दी गई।
(i) अंग्रेज़ घुमंतुओं पर भरोसा नहीं करते थे।
(ii) नियंत्रण कठिन माना जाता था।
(iii) अपराधी जनजाति अधिनियम लागू हुआ।
(iv) यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया।
(v) पुलिस निगरानी बढ़ी।
15. चरवाही कर (Grazing Tax) क्या था? इसका प्रभाव बताइए।
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ सरकार ने अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से चरवाही कर लागू किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक चरवाहे को अपने पशुओं पर कर देना पड़ता था। प्रारंभ में कर वसूली का कार्य ठेकेदारों को दिया गया, जो मनमाने ढंग से कर वसूलते थे। बाद में सरकार ने अपने कर्मचारियों के माध्यम से यह कार्य कराया। प्रत्येक चरवाहे को एक पास दिया जाता था, जिसमें पशुओं की संख्या और कर का विवरण दर्ज रहता था। इस अतिरिक्त आर्थिक बोझ के कारण चरवाहों की स्थिति और कठिन हो गई।
(i) प्रत्येक पशु पर कर लगाया गया।
(ii) ठेकेदार कर वसूलते थे।
(iii) बाद में सरकारी कर्मचारी वसूली करने लगे।
(iv) पास प्रणाली लागू हुई।
(v) आर्थिक बोझ बढ़ा।
16. पास (Permit) प्रणाली क्या थी? इसका चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ वन क्षेत्रों में प्रवेश और चराई को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने पास या परमिट प्रणाली लागू की। प्रत्येक चरवाहे को एक पास जारी किया जाता था, जिसमें उसके पशुओं की संख्या तथा भुगतान किए गए कर का विवरण लिखा रहता था। किसी भी चरागाह में प्रवेश करने से पहले यह पास दिखाना अनिवार्य था। यदि कोई चरवाहा निर्धारित अवधि से अधिक समय तक जंगल में रहता या बिना पास के प्रवेश करता, तो उस पर जुर्माना लगाया जाता था। इस व्यवस्था ने चरवाहों की स्वतंत्र आवाजाही को काफी सीमित कर दिया।
(i) पास लेकर चराई करनी पड़ती थी।
(ii) पशुओं का विवरण दर्ज रहता था।
(iii) कर भुगतान अनिवार्य था।
(iv) बिना पास प्रवेश वर्जित था।
(v) स्वतंत्रता सीमित हुई।
17. औपनिवेशिक नीतियों से चरागाहों की स्थिति कैसे प्रभावित हुई?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक नीतियों के कारण चरागाहों का क्षेत्र लगातार घटता गया। अनेक चरागाहों को खेती योग्य भूमि में बदल दिया गया और आरक्षित वनों में चराई पर रोक लगा दी गई। परिणामस्वरूप बचे हुए छोटे चरागाहों पर अधिक संख्या में पशु चरने लगे। अत्यधिक चराई के कारण घास को दोबारा उगने का पर्याप्त समय नहीं मिला। धीरे-धीरे चरागाहों की गुणवत्ता कम होने लगी और चारे की कमी पैदा हो गई। इससे पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ा तथा अनेक जानवर भूख और बीमारियों से मरने लगे।
(i) चरागाहों का क्षेत्र घटा।
(ii) अत्यधिक चराई होने लगी।
(iii) घास की गुणवत्ता कम हुई।
(iv) चारे की कमी हुई।
(v) पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ा।
18. औपनिवेशिक नीतियों के प्रति चरवाहों की क्या प्रतिक्रियाएँ थीं?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक नीतियों के कारण चरवाहों ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार अनेक परिवर्तन किए। कुछ लोगों ने अपने पशुओं की संख्या कम कर दी ताकि सीमित चरागाहों में उनका पालन किया जा सके। कुछ समुदायों ने नए चरागाहों की खोज की, जबकि कुछ संपन्न चरवाहों ने खेती और व्यापार शुरू कर दिया। गरीब चरवाहे कर्ज में डूब गए और मजदूरी करने लगे। अनेक समुदायों ने बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने पारंपरिक व्यवसाय में परिवर्तन किया। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने जीवन को नए ढंग से ढालने का प्रयास किया।
(i) पशुओं की संख्या घटाई।
(ii) नए चरागाह खोजे।
(iii) खेती और व्यापार अपनाया।
(iv) कुछ मजदूर बन गए।
(v) जीवनशैली में परिवर्तन किया।
19. वैज्ञानिक चरवाही को टिकाऊ जीवनशैली क्यों मानते हैं?
उत्तर ⇒ वैज्ञानिकों का मानना है कि सूखे क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों में चरवाही सबसे उपयुक्त और टिकाऊ जीवनशैली है। घुमंतू चरवाहे एक ही स्थान पर लंबे समय तक नहीं रुकते, जिससे चरागाहों को दोबारा विकसित होने का समय मिल जाता है। वे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करते हैं और पर्यावरण पर कम दबाव डालते हैं। इसके अलावा पशुपालन से भोजन, दूध, ऊन और अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी प्राप्त होती हैं। इसलिए आधुनिक पर्यावरण विशेषज्ञ भी चरवाही को टिकाऊ आजीविका का महत्वपूर्ण साधन मानते हैं।
(i) प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग होता है।
(ii) चरागाहों को पुनः विकसित होने का समय मिलता है।
(iii) पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
(iv) पशुपालन से आजीविका मिलती है।
(v) यह टिकाऊ जीवनशैली है।
20. औपनिवेशिक शासन के कारण चरवाहों के जीवन में आए परिवर्तनों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन ने चरवाहों की पारंपरिक जीवनशैली को गहराई से प्रभावित किया। खेती के विस्तार, वन अधिनियमों, चरवाही कर, परमिट प्रणाली तथा घुमंतू समुदायों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण उनकी स्वतंत्र आवाजाही समाप्त हो गई। चरागाहों की कमी से पशुपालन कठिन हो गया और आर्थिक संकट बढ़ा। कई चरवाहों को खेती, व्यापार या मजदूरी अपनानी पड़ी। फिर भी अनेक समुदायों ने नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लिया और अपनी परंपराओं को बचाए रखा। इस प्रकार औपनिवेशिक नीतियों ने चरवाहों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन किए।
(i) चरवाही पर नियंत्रण बढ़ा।
(ii) आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ीं।
(iii) नई आजीविका अपनानी पड़ी।
(iv) पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ।
(v) समाज में व्यापक परिवर्तन आए।
21. अफ्रीका के चरवाहों का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ अफ्रीका में दुनिया की लगभग आधी से अधिक चरवाहा आबादी निवास करती है। लगभग 2.25 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए पशुपालन पर निर्भर हैं। यहाँ के प्रमुख चरवाहा समुदायों में बेदुईन्स, बरबेर्स, मासाई, सोमाली, बोरान और तुर्काना शामिल हैं। ये लोग मुख्यतः अर्ध-शुष्क घास के मैदानों तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ वर्षा आधारित खेती करना कठिन होता है। ये गाय, बैल, ऊँट, भेड़, बकरी और गधे पालते हैं। इनकी आय का मुख्य स्रोत दूध, मांस, ऊन, खाल तथा पशुओं का व्यापार है। कई समुदाय पशुपालन के साथ खेती और व्यापार भी करते हैं।
(i) अफ्रीका में बड़ी चरवाहा आबादी रहती है।
(ii) पशुपालन मुख्य आजीविका है।
(iii) अनेक प्रमुख चरवाहा समुदाय हैं।
(iv) अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में निवास करते हैं।
(v) पशु उत्पादों से आय प्राप्त करते हैं।
22. मासाई समुदाय का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ मासाई पूर्वी अफ्रीका का प्रसिद्ध चरवाहा समुदाय है। इनकी अधिकांश आबादी दक्षिणी कीनिया और तंजानिया में निवास करती है। इनका जीवन मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित है। मासाई समाज दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था—वरिष्ठ जन और योद्धा। वरिष्ठ जन समुदाय का प्रशासन चलाते थे तथा महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। युवा योद्धा समुदाय की रक्षा करते थे और मवेशियों की सुरक्षा का दायित्व निभाते थे। उनके समाज में अधिक पशुधन होना सम्मान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। मासाई समुदाय अपनी साहसिक जीवनशैली और पारंपरिक चरवाही के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
(i) मासाई पूर्वी अफ्रीका में रहते हैं।
(ii) पशुपालन उनकी मुख्य आजीविका है।
(iii) समाज दो वर्गों में विभाजित था।
(iv) वरिष्ठ जन प्रशासन चलाते थे।
(v) पशुधन समृद्धि का प्रतीक था।
23. मासाई समाज की सामाजिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ मासाई समाज सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना वाला समुदाय था। इसमें दो प्रमुख वर्ग होते थे—वरिष्ठ जन और योद्धा। वरिष्ठ जन समुदाय के प्रशासन, न्याय तथा अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों का कार्य करते थे। युवा योद्धा समुदाय की रक्षा करते थे और आवश्यकता पड़ने पर दूसरे समुदायों से संघर्ष भी करते थे। मवेशियों की रक्षा करना और उन्हें बढ़ाना उनका मुख्य दायित्व था। पशुधन की संख्या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति का प्रतीक मानी जाती थी। इस प्रकार मासाई समाज में प्रत्येक वर्ग की अपनी स्पष्ट भूमिका और जिम्मेदारी थी।
(i) समाज दो वर्गों में विभाजित था।
(ii) वरिष्ठ जन निर्णय लेते थे।
(iii) योद्धा सुरक्षा करते थे।
(iv) पशुधन का विशेष महत्व था।
(v) समाज संगठित था।
24. मासाई समुदाय पर औपनिवेशिक शासन का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन ने मासाई समुदाय के पारंपरिक जीवन में अनेक परिवर्तन किए। अंग्रेज़ सरकार ने अपनी इच्छा से मुखियाओं की नियुक्ति की और उन्हें प्रशासनिक अधिकार दिए। योद्धाओं की शक्ति को कमजोर करने के लिए युद्ध और संघर्ष पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे वरिष्ठ जनों और योद्धाओं की पारंपरिक प्रतिष्ठा कम हो गई। औपनिवेशिक हस्तक्षेप के कारण मासाई समाज की पारंपरिक शासन व्यवस्था कमजोर हुई और उनकी स्वतंत्र जीवनशैली पर भी प्रभाव पड़ा।
(i) अंग्रेज़ों ने नए मुखिया नियुक्त किए।
(ii) युद्ध पर प्रतिबंध लगाया गया।
(iii) पारंपरिक सत्ता कमजोर हुई।
(iv) योद्धाओं की भूमिका घटी।
(v) समाज में परिवर्तन आया।
25. औपनिवेशिक शासन के कारण मासाई समाज में आर्थिक असमानता कैसे बढ़ी?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन के दौरान मासाई समाज में अमीर और गरीब के बीच अंतर बढ़ गया। अंग्रेज़ों द्वारा नियुक्त मुखियाओं को नियमित आय मिलने लगी, जिससे उन्होंने अधिक जमीन, पशु और अन्य संपत्ति खरीद ली। वे गरीब लोगों को कर्ज भी देने लगे और व्यापार से अतिरिक्त आय प्राप्त करने लगे। दूसरी ओर सामान्य चरवाहे केवल अपने पशुओं पर निर्भर थे। सूखा या बीमारी आने पर उनके पशु मर जाते थे और उन्हें मजदूरी करने के लिए शहरों में जाना पड़ता था। इस प्रकार औपनिवेशिक नीतियों ने आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया।
(i) अमीर और गरीब का अंतर बढ़ा।
(ii) मुखियाओं की आय बढ़ी।
(iii) गरीब चरवाहे संकट में आए।
(iv) कई लोगों को मजदूरी करनी पड़ी।
(v) आर्थिक असमानता बढ़ी।
26. मासाई समुदाय के चरागाहों के सिमटने के कारण एवं परिणाम लिखिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन से पहले मासाईलैंड बहुत विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ था। बाद में ब्रिटिश और जर्मन सरकारों ने सीमा निर्धारित करके इस क्षेत्र को दो भागों में बाँट दिया। सरकार ने सबसे उपजाऊ चरागाहों पर कब्जा करके उन्हें यूरोपीय बसने वालों को दे दिया। परिणामस्वरूप मासाइयों की लगभग 60 प्रतिशत भूमि उनसे छिन गई। उन्हें छोटे तथा सूखे क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे चारे और पानी की कमी बढ़ी तथा पशुपालन कठिन हो गया।
(i) चरागाहों पर सरकारी कब्जा हुआ।
(ii) भूमि दो भागों में बाँटी गई।
(iii) मासाइयों की भूमि कम हुई।
(iv) चारे की कमी हुई।
(v) पशुपालन प्रभावित हुआ।
27. खेती के विस्तार का मासाई चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय किसानों को खेती का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके कारण अनेक चरागाह कृषि भूमि में बदल गए। पहले जिन क्षेत्रों में पशु चरते थे, वहाँ अब खेती होने लगी। इससे मासाई चरवाहों के लिए उपलब्ध चरागाहों का क्षेत्र कम हो गया। चारे की कमी के कारण पशुओं का पालन कठिन हो गया और उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। खेती के विस्तार ने मासाई समाज की पारंपरिक चरवाही व्यवस्था को गहरा नुकसान पहुँचाया।
(i) चरागाह खेतों में बदल गए।
(ii) चारे की कमी हुई।
(iii) पशुपालन प्रभावित हुआ।
(iv) आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।
(v) पारंपरिक जीवन बदला।
28. राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण से मासाई चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक सरकार ने कई महत्वपूर्ण चरागाहों को राष्ट्रीय उद्यान और शिकारगाह घोषित कर दिया। कीनिया का मारा और साम्बूरू राष्ट्रीय उद्यान तथा तंजानिया का सेरेन्गेटी राष्ट्रीय उद्यान इसी प्रकार बनाए गए। इन क्षेत्रों में मासाई चरवाहों और उनके पशुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। परिणामस्वरूप उनके पारंपरिक चरागाह समाप्त हो गए। इससे पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं रहा और उनकी आजीविका प्रभावित हुई। राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण से वन्य जीवों की सुरक्षा तो हुई, लेकिन चरवाहों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
(i) राष्ट्रीय उद्यान बनाए गए।
(ii) चराई पर प्रतिबंध लगा।
(iii) चरागाह कम हुए।
(iv) पशुपालन प्रभावित हुआ।
(v) आजीविका पर असर पड़ा।
29. औपनिवेशिक पाबंदियों ने अफ्रीकी चरवाहों के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन ने अफ्रीकी चरवाहों की स्वतंत्र आवाजाही पर अनेक प्रतिबंध लगाए। बिना परमिट सीमा पार करना या पशुओं को चराना संभव नहीं था। परमिट प्राप्त करना कठिन था और अधिकारियों द्वारा उन्हें परेशान किया जाता था। नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर दंड दिया जाता था। चरवाहों को गोरे बसने वालों के बाजारों में प्रवेश करने तथा कई प्रकार के व्यापार करने से भी रोका गया। इन प्रतिबंधों के कारण उनकी चरवाही, व्यापार और आर्थिक स्थिति सभी प्रभावित हुई।
(i) आवाजाही सीमित हुई।
(ii) परमिट अनिवार्य हुआ।
(iii) व्यापार प्रभावित हुआ।
(iv) अधिकारियों द्वारा परेशान किया गया।
(v) आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ीं।
30. सूखे का मासाई चरवाहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ सूखे के समय चरागाह सूख जाते थे और पशुओं के लिए चारे तथा पानी की भारी कमी हो जाती थी। पहले मासाई चरवाहे नए चरागाहों की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में चले जाते थे, लेकिन औपनिवेशिक शासन के बाद उन्हें सीमित क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसलिए वे सूखे के समय नए चरागाहों तक नहीं पहुँच सके। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में उनके पशु भूख और प्यास से मर गए। लगातार सूखे और सीमित चराई क्षेत्र के कारण उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई।
(i) सूखे से चरागाह नष्ट हुए।
(ii) चारे की कमी हुई।
(iii) नए चरागाहों तक नहीं जा सके।
(iv) बड़ी संख्या में पशु मरे।
(v) आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।
31. भारत और अफ्रीका के चरवाहों की जीवनशैली की तुलना कीजिए।
उत्तर ⇒ भारत और अफ्रीका दोनों स्थानों के चरवाहों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है तथा वे मौसम और चरागाहों के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। भारत में गुज्जर-बकरवाल, गद्दी, धंगर और राइका जैसे समुदाय प्रसिद्ध हैं, जबकि अफ्रीका में मासाई, सोमाली, बोरान और तुर्काना प्रमुख चरवाहा समुदाय हैं। भारत के चरवाहे हिमालय, पठार और रेगिस्तान जैसी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार प्रवास करते हैं, जबकि अफ्रीका के चरवाहे मुख्यतः अर्ध-शुष्क घास के मैदानों और रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते हैं। दोनों ही क्षेत्रों के चरवाहों को औपनिवेशिक नीतियों, चरागाहों की कमी और सरकारी नियंत्रण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
| भारत | अफ्रीका |
|---|---|
| गुज्जर, गद्दी, धंगर, राइका | मासाई, सोमाली, बोरान |
| विभिन्न भौगोलिक क्षेत्र | अर्ध-शुष्क एवं रेगिस्तानी क्षेत्र |
| मौसमी प्रवास | मौसमी प्रवास |
(i) दोनों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है।
(ii) दोनों मौसमी प्रवास करते हैं।
(iii) अलग-अलग समुदाय पाए जाते हैं।
(iv) औपनिवेशिक नीतियों का प्रभाव पड़ा।
(v) चरागाहों की समस्या समान थी।
32. भारत और अफ्रीका के चरवाहों की समस्याओं की तुलना कीजिए।
उत्तर ⇒ भारत और अफ्रीका दोनों के चरवाहों को अनेक समान समस्याओं का सामना करना पड़ा। भारत में खेती के विस्तार, वन अधिनियम, चरवाही कर और परमिट प्रणाली के कारण चरागाह कम हो गए। अफ्रीका में औपनिवेशिक सरकार ने चरागाहों पर कब्जा किया, राष्ट्रीय उद्यान बनाए और चरवाहों की आवाजाही सीमित कर दी। दोनों स्थानों पर पशुओं के लिए चारे की कमी हुई तथा आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ीं। सूखे और सरकारी प्रतिबंधों ने उनकी पारंपरिक जीवनशैली को भी प्रभावित किया। इस प्रकार दोनों क्षेत्रों के चरवाहों की समस्याएँ लगभग समान थीं।
(i) चरागाह कम हुए।
(ii) सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
(iii) चारे की कमी हुई।
(iv) आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ीं।
(v) पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ।
33. आधुनिक विश्व में चरवाही का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒ आधुनिक समय में भी चरवाही अनेक क्षेत्रों की महत्वपूर्ण आजीविका है। विशेष रूप से सूखे, रेगिस्तानी और पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ खेती कठिन होती है, वहाँ पशुपालन लोगों के जीवन का आधार बना हुआ है। चरवाहों से दूध, मांस, ऊन, खाल तथा अन्य पशु उत्पाद प्राप्त होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि उचित ढंग से की जाने वाली घुमंतू चरवाही प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करती है और पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक होती है। इसलिए आधुनिक विश्व में चरवाही केवल पारंपरिक व्यवसाय नहीं बल्कि टिकाऊ विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
(i) आज भी महत्वपूर्ण आजीविका है।
(ii) सूखे क्षेत्रों में उपयोगी है।
(iii) पशु उत्पाद उपलब्ध कराती है।
(iv) पर्यावरण संरक्षण में सहायक है।
(v) टिकाऊ विकास का माध्यम है।
34. चरवाहों की जीवनशैली को टिकाऊ (Sustainable) क्यों माना जाता है?
उत्तर ⇒ चरवाहों की जीवनशैली को टिकाऊ इसलिए माना जाता है क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करते हैं। वे मौसम के अनुसार अपने पशुओं को अलग-अलग चरागाहों में ले जाते हैं, जिससे किसी एक स्थान पर अत्यधिक दबाव नहीं पड़ता। चरागाहों को पुनः विकसित होने का समय मिलता है और पर्यावरण संतुलित रहता है। पशुपालन से भोजन, दूध, ऊन और अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विशेष रूप से सूखे और पहाड़ी क्षेत्रों में घुमंतू चरवाही सबसे व्यावहारिक और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली है।
(i) प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग होता है।
(ii) चरागाह सुरक्षित रहते हैं।
(iii) पर्यावरण संतुलित रहता है।
(iv) पशुपालन से आजीविका मिलती है।
(v) यह टिकाऊ जीवनशैली है।
35. औपनिवेशिक शासन से पहले और बाद में चरवाहों के जीवन की तुलना कीजिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन से पहले चरवाहे स्वतंत्र रूप से अपने पशुओं के साथ विभिन्न चरागाहों में जा सकते थे। उनके मार्ग और चराई पर बहुत कम प्रतिबंध थे। लेकिन औपनिवेशिक शासन के बाद वन अधिनियम, चरवाही कर, परमिट प्रणाली और सीमाओं के कारण उनकी स्वतंत्र आवाजाही समाप्त हो गई। चरागाहों का क्षेत्र घटने से पशुपालन कठिन हो गया। कई चरवाहों को अपनी आजीविका बदलनी पड़ी। इस प्रकार औपनिवेशिक शासन ने चरवाहों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन किए।
| पहले | बाद में |
|---|---|
| स्वतंत्र आवाजाही | परमिट और प्रतिबंध |
| पर्याप्त चरागाह | चरागाहों की कमी |
| पारंपरिक जीवन | सरकारी नियंत्रण |
(i) पहले अधिक स्वतंत्रता थी।
(ii) बाद में प्रतिबंध बढ़े।
(iii) चरागाह कम हुए।
(iv) आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ीं।
(v) जीवनशैली बदल गई।
36. औपनिवेशिक नीतियों ने पशुपालन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक सरकार की नीतियों ने पशुपालन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। चरागाहों को खेती और राष्ट्रीय उद्यानों में बदल दिया गया, जिससे पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं रहा। वन क्षेत्रों में चराई पर प्रतिबंध लगा दिया गया और चरवाहों की आवाजाही नियंत्रित कर दी गई। चरवाही कर और परमिट प्रणाली ने उनकी आर्थिक समस्याएँ बढ़ा दीं। परिणामस्वरूप पशुओं की संख्या घटने लगी, उनकी उत्पादकता कम हुई और अनेक चरवाहों को अपना पारंपरिक व्यवसाय छोड़ना पड़ा।
(i) चरागाह कम हुए।
(ii) चराई पर रोक लगी।
(iii) कर लगाया गया।
(iv) पशुधन घटा।
(v) पशुपालन प्रभावित हुआ।
37. चरवाहों के लिए चरागाहों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ चरागाह चरवाहों के जीवन का आधार होते हैं। पशुओं को भोजन, पानी और विश्राम के लिए खुले घास के मैदानों की आवश्यकता होती है। यदि पर्याप्त चरागाह उपलब्ध हों तो पशु स्वस्थ रहते हैं और दूध, ऊन तथा अन्य उत्पाद अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं। चरागाहों की कमी होने पर पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ता है, उत्पादन घटता है और चरवाहों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाती है। इसलिए चरागाहों का संरक्षण पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
(i) चरागाह पशुओं का भोजन हैं।
(ii) पशुओं का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
(iii) उत्पादन बढ़ता है।
(iv) आर्थिक लाभ मिलता है।
(v) संरक्षण आवश्यक है।
38. औपनिवेशिक शासन के कारण चरवाहों की आर्थिक स्थिति क्यों कमजोर हुई?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन में चरवाहों को अनेक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चरागाह कम होने से पशुओं के लिए चारा उपलब्ध नहीं रहा और पशुधन घटने लगा। चरवाही कर और अन्य करों का अतिरिक्त बोझ उन पर पड़ा। वन कानूनों के कारण पारंपरिक चरागाहों तक उनकी पहुँच सीमित हो गई। सूखा, बीमारी और सरकारी प्रतिबंधों के कारण कई चरवाहों को अपने पशु बेचने पड़े या मजदूरी करनी पड़ी। इन कारणों से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।
(i) चारे की कमी हुई।
(ii) करों का बोझ बढ़ा।
(iii) पशुधन घटा।
(iv) मजदूरी करनी पड़ी।
(v) आर्थिक संकट बढ़ा।
39. चरवाहों और किसानों के बीच संबंधों का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ चरवाहों और किसानों के बीच पारस्परिक सहयोग का संबंध था। चरवाहों के पशु फसल कटने के बाद खेतों की ठूंठ खा लेते थे और उनका गोबर खेतों को प्राकृतिक खाद प्रदान करता था। इससे भूमि की उर्वरता बढ़ती थी। बदले में किसान चरवाहों को अनाज, चावल या अन्य आवश्यक वस्तुएँ देते थे। इस प्रकार दोनों समुदाय एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। यह संबंध ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संतुलन और सहयोग का अच्छा उदाहरण था।
(i) दोनों में सहयोग था।
(ii) पशु ठूंठ खाते थे।
(iii) गोबर से खेत उपजाऊ होते थे।
(iv) किसान अनाज देते थे।
(v) ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती थी।
40. ‘आधुनिक विश्व में चरवाहे’ अध्याय से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर ⇒ यह अध्याय हमें सिखाता है कि चरवाही केवल एक पारंपरिक व्यवसाय नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। विभिन्न क्षेत्रों के चरवाहों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवनशैली विकसित की। औपनिवेशिक नीतियों ने उनके जीवन को प्रभावित किया, फिर भी उन्होंने बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लिया। यह अध्याय प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग, पर्यावरण संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों के अधिकारों के महत्व को भी स्पष्ट करता है। इसलिए चरवाहों के अनुभव आज भी टिकाऊ विकास के लिए प्रेरणादायक हैं।
(i) चरवाही प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली है।
(ii) पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझ आता है।
(iii) स्थानीय समुदायों के अधिकार आवश्यक हैं।
(iv) औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव का ज्ञान मिलता है।
(v) टिकाऊ विकास की प्रेरणा मिलती है।
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| Chapter 1: फ्रांसीसी क्रान्ति |
| Chapter 2: यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति |
| Chapter 3: नात्सीवाद और हिटलर का उदय |
| Chapter 4: वन्य-समाज और उपनिवेशवाद |