Class 10 Science: हमारा पर्यावरण
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Chapter Overview
| Class | 10 |
| Subject | Science |
| Chapter Name | हमारा पर्यावरण |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
हमारा पर्यावरण Revision Notes
1. पर्यावरण (Environment) क्या है?
उत्तर ⇒
किसी भी जीव के चारों ओर उपस्थित सभी जैविक (Biotic) तथा अजैविक (Abiotic) घटकों के समष्टि को पर्यावरण (Environment) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जिस प्राकृतिक वातावरण में कोई जीव रहता है, भोजन प्राप्त करता है, वृद्धि करता है, प्रजनन करता है तथा अपने जीवन की सभी आवश्यक क्रियाएँ सम्पन्न करता है, वही उसका पर्यावरण कहलाता है। पर्यावरण जीवों को जीवन के लिए आवश्यक वायु, जल, भोजन, प्रकाश तथा आवास प्रदान करता है।
पर्यावरण के दो प्रमुख घटक होते हैं। पहला जैव घटक, जिसमें पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव तथा मनुष्य आते हैं। दूसरा अजैव घटक, जिसमें वायु, जल, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश, तापमान, वर्षा, आर्द्रता आदि शामिल हैं। ये सभी घटक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं तथा मिलकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।
यदि पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव सभी जीवों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
पर्यावरण का महत्व निम्नलिखित है—
(i) जीवों को भोजन, जल एवं ऑक्सीजन प्रदान करता है।
(ii) जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है।
(iii) प्राकृतिक संसाधनों का स्रोत है।
(iv) जैव विविधता को बनाए रखता है।
(v) पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने में सहायता करता है।
2. वायु प्रदूषण (Air Pollution) क्या है? इसके प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒
जब वायु में धूल, धुआँ, जहरीली गैसें तथा अन्य हानिकारक कण सामान्य मात्रा से अधिक मिल जाते हैं, जिससे वायु की गुणवत्ता खराब हो जाती है और जीवों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उसे वायु प्रदूषण (Air Pollution) कहते हैं।
आज औद्योगिकीकरण, बढ़ती जनसंख्या तथा वाहनों की संख्या में वृद्धि के कारण वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। इससे श्वसन संबंधी रोग, अम्ल वर्षा, वैश्विक ऊष्मीकरण तथा ओजोन परत का क्षय जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(i) कारखानों एवं उद्योगों से निकलने वाला धुआँ।
(ii) मोटर वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसें।
(iii) कोयला, पेट्रोल एवं डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग।
(iv) कचरे एवं प्लास्टिक को जलाना।
(v) वनों की अंधाधुंध कटाई।
(vi) ज्वालामुखी एवं जंगल की आग जैसी प्राकृतिक घटनाएँ।
वायु प्रदूषण के प्रमुख प्रदूषक—
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)
- नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ)
- धूल एवं धुएँ के सूक्ष्म कण (Particulate Matter)
3. प्रदूषण (Pollution) क्या है? इसके प्रमुख प्रकार लिखिए।
उत्तर ⇒
पर्यावरण में हानिकारक, अवांछित अथवा विषैले पदार्थों के अत्यधिक मात्रा में मिल जाने से जब पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता प्रभावित होती है, तो इस स्थिति को प्रदूषण (Pollution) कहते हैं। प्रदूषण के कारण वायु, जल, मिट्टी तथा जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
प्रदूषण प्राकृतिक कारणों से भी हो सकता है, लेकिन वर्तमान समय में अधिकांश प्रदूषण मानव की गतिविधियों के कारण उत्पन्न हो रहा है। उद्योगों, वाहनों, रासायनिक उर्वरकों तथा प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है।
प्रदूषण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं—
(i) वायु प्रदूषण।
(ii) जल प्रदूषण।
(iii) मृदा (भूमि) प्रदूषण।
(iv) ध्वनि प्रदूषण।
(v) रेडियोधर्मी प्रदूषण।
प्रदूषण के दुष्प्रभाव—
(i) मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(ii) जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ती है।
(iii) जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है।
(iv) प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित हो जाते हैं।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाता है।
4. ओजोन परत (Ozone Layer) का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
वायुमंडल के समताप मंडल (Stratosphere) में लगभग 15 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित ओजोन (O₃) गैस की परत को ओजोन परत (Ozone Layer) कहते हैं। यह पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षात्मक कवच का कार्य करती है।
ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Rays) को अवशोषित कर लेती है और उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यदि यह परत न हो, तो पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं होगा।
ओजोन परत का महत्व निम्नलिखित है—
(i) पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है।
(ii) त्वचा कैंसर की संभावना कम करती है।
(iii) आँखों की बीमारियों जैसे मोतियाबिंद से बचाती है।
(iv) पौधों एवं फसलों की सुरक्षा करती है।
(v) जैव विविधता एवं पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखती है।
5. उत्पादक (Producer) किसे कहते हैं? पारिस्थितिक तंत्र में इनका क्या महत्व है?
उत्तर ⇒
वे जीव जो सूर्य के प्रकाश की सहायता से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, उत्पादक (Producers) कहलाते हैं। इन्हें स्वपोषी (Autotrophs) भी कहा जाता है। हरे पौधे तथा कुछ प्रकाश-संश्लेषी जीवाणु उत्पादकों के प्रमुख उदाहरण हैं।
उत्पादक पारिस्थितिक तंत्र का प्रथम पोषी स्तर (First Trophic Level) बनाते हैं। ये सूर्य की ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलकर अन्य सभी जीवों तक पहुँचाते हैं। यदि उत्पादक न हों, तो पृथ्वी पर कोई भी उपभोक्ता जीव जीवित नहीं रह सकता।
उत्पादकों का महत्व निम्नलिखित है—
(i) अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
(ii) सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को ऊर्जा प्रदान करते हैं।
(iii) वायुमंडल में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बनाए रखते हैं।
(iv) सभी उपभोक्ताओं के लिए भोजन का आधार होते हैं।
(v) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
6. जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable) एवं अजैव निम्नीकरणीय (Non-Biodegradable) अपशिष्ट क्या हैं? पर्यावरण पर इनके प्रभाव लिखिए।
उत्तर ⇒
वे अपशिष्ट पदार्थ जिन्हें सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया एवं कवक प्राकृतिक रूप से अपघटित करके सरल एवं हानिरहित पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं, जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable) अपशिष्ट कहलाते हैं। इसके विपरीत, वे पदार्थ जिनका प्राकृतिक रूप से अपघटन नहीं हो पाता अथवा जिनके अपघटन में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं, अजैव निम्नीकरणीय (Non-Biodegradable) अपशिष्ट कहलाते हैं।
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण में पुनः मिलकर प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बन जाते हैं, जबकि अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ लंबे समय तक मिट्टी, जल तथा वायु में बने रहते हैं और पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाते हैं। प्लास्टिक, DDT, काँच तथा धातुएँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
पर्यावरण पर इनके प्रभाव निम्नलिखित हैं—
(i) जैव निम्नीकरणीय पदार्थ प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं।
(ii) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं।
(iii) ये खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके जैव आवर्धन उत्पन्न करते हैं।
(iv) मिट्टी एवं जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
(v) जीव-जंतुओं तथा मनुष्य के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
7. पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में उत्पादकों की क्या भूमिका है?
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादक (Producers) सबसे महत्वपूर्ण घटक होते हैं। ये ऐसे जीव हैं जो सूर्य के प्रकाश की सहायता से प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे तथा कुछ शैवाल उत्पादकों के प्रमुख उदाहरण हैं। ये सूर्य की ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करके भोजन के रूप में संचित करते हैं।
सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र के सभी उपभोक्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं। यदि उत्पादक समाप्त हो जाएँ, तो खाद्य श्रृंखला टूट जाएगी और अन्य जीवों का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा।
उत्पादकों की प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं—
(i) प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं।
(ii) सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
(iii) वायुमंडल में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बनाए रखते हैं।
(iv) सभी उपभोक्ताओं के लिए भोजन का आधार होते हैं।
(v) जैव विविधता एवं पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं।
8. पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) क्या है? इसके प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒
जीवों तथा उनके आसपास उपस्थित अजैविक वातावरण के बीच होने वाले पारस्परिक संबंध एवं पदार्थ तथा ऊर्जा के आदान-प्रदान से बनने वाली प्राकृतिक व्यवस्था को पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) कहते हैं। प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में जैव एवं अजैव दोनों प्रकार के घटक होते हैं, जो एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
पारिस्थितिक तंत्र छोटा भी हो सकता है, जैसे—तालाब, बगीचा, एक्वेरियम तथा बड़ा भी हो सकता है, जैसे—वन, घास का मैदान अथवा समुद्र।
पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं—
(क) जैव घटक (Biotic Components)
(i) उत्पादक (Producers)
(ii) उपभोक्ता (Consumers)
(iii) अपघटक (Decomposers)
(ख) अजैव घटक (Abiotic Components)
(i) वायु
(ii) जल
(iii) मिट्टी
(iv) सूर्य का प्रकाश
(v) तापमान
पारिस्थितिक तंत्र का महत्व—
(i) ऊर्जा प्रवाह बनाए रखता है।
(ii) पोषक तत्वों का चक्र पूरा करता है।
(iii) पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है।
(iv) सभी जीवों को जीवन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराता है।
9. कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem) क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर ⇒
ऐसा पारिस्थितिक तंत्र जिसे मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार निर्मित एवं नियंत्रित करता है, कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र (Artificial Ecosystem) कहलाता है। इसमें जीवों के जीवन एवं संतुलन को बनाए रखने के लिए मानव का निरंतर हस्तक्षेप आवश्यक होता है।
प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की तुलना में कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र स्वयं संतुलित नहीं होते। इनके रख-रखाव के लिए भोजन, जल, उर्वरक तथा अन्य संसाधन उपलब्ध कराने पड़ते हैं।
कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख उदाहरण—
(i) एक्वेरियम (Aquarium)
(ii) फुलवारी (Garden)
(iii) कृषि क्षेत्र (Crop Field)
(iv) चिड़ियाघर (Zoo)
इनका महत्व—
(i) वैज्ञानिक अध्ययन में उपयोगी।
(ii) कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक।
(iii) जैव विविधता के संरक्षण में उपयोगी।
(iv) मनोरंजन एवं शिक्षा का माध्यम।
10. मैदानी पारिस्थितिक तंत्र (Grassland Ecosystem) में उत्पादक एवं उच्चतम उपभोक्ता कौन होते हैं?
उत्तर ⇒
मैदानी पारिस्थितिक तंत्र (Grassland Ecosystem) वह पारिस्थितिक तंत्र है जहाँ घास एवं छोटे पौधे प्रमुख वनस्पति के रूप में पाए जाते हैं। इस पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह उत्पादकों से प्रारम्भ होकर विभिन्न उपभोक्ताओं तक पहुँचता है।
यहाँ हरे पौधे एवं घास उत्पादक का कार्य करते हैं, क्योंकि ये प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इन्हें शाकाहारी जीव खाते हैं, जिन्हें बाद में मांसाहारी जीव खाते हैं।
उदाहरण स्वरूप आहार श्रृंखला—
घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
या
घास → हिरण → बाघ
इस आहार श्रृंखला में—
- उत्पादक – हरी घास एवं अन्य हरे पौधे।
- प्राथमिक उपभोक्ता – टिड्डा, हिरण।
- द्वितीयक उपभोक्ता – मेंढक अथवा लोमड़ी।
- तृतीयक/उच्चतम उपभोक्ता – बाज अथवा बाघ।
इस प्रकार मैदानी पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादक सम्पूर्ण ऊर्जा का आधार होते हैं तथा उच्चतम उपभोक्ता खाद्य श्रृंखला के अंतिम पोषी स्तर पर स्थित होते हैं।
11. पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के जैविक एवं अजैविक घटकों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र दो प्रकार के प्रमुख घटकों से मिलकर बना होता है— जैविक (Biotic) तथा अजैविक (Abiotic) घटक। जैविक घटकों में सभी जीवित प्राणी आते हैं, जबकि अजैविक घटकों में निर्जीव प्राकृतिक तत्व सम्मिलित होते हैं। दोनों घटक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं तथा मिलकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं। यदि इनमें से किसी एक घटक में असंतुलन उत्पन्न हो जाए, तो सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो जाता है।
| जैविक घटक (Biotic Components) | अजैविक घटक (Abiotic Components) |
|---|---|
| (i) ये जीवित होते हैं। | (i) ये निर्जीव होते हैं। |
| (ii) इनमें पौधे, जन्तु एवं सूक्ष्मजीव आते हैं। | (ii) इनमें वायु, जल, मिट्टी, प्रकाश एवं तापमान आते हैं। |
| (iii) ये भोजन एवं ऊर्जा के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। | (iii) ये जीवों को जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। |
| (iv) ये पारिस्थितिक तंत्र के जैविक भाग हैं। | (iv) ये पारिस्थितिक तंत्र के भौतिक भाग हैं। |
12. पारिस्थितिकी दक्षता (Ecological Efficiency) क्या है?
उत्तर ⇒
एक पोषी स्तर (Trophic Level) से दूसरे पोषी स्तर तक ऊर्जा के स्थानांतरण की दक्षता को पारिस्थितिकी दक्षता (Ecological Efficiency) कहते हैं। जब कोई जीव दूसरे जीव को भोजन के रूप में ग्रहण करता है, तब प्राप्त ऊर्जा का केवल एक छोटा भाग ही उसकी वृद्धि एवं जैविक क्रियाओं में उपयोग होता है। शेष ऊर्जा ऊष्मा के रूप में वातावरण में नष्ट हो जाती है।
सामान्यतः केवल लगभग 10% ऊर्जा ही अगले पोषी स्तर तक पहुँचती है। इसे 10% का नियम (Ten Percent Law) भी कहा जाता है, जिसे वैज्ञानिक लिंडमैन (Lindeman) ने प्रस्तुत किया था।
पारिस्थितिकी दक्षता का महत्व निम्नलिखित है—
(i) ऊर्जा प्रवाह को समझने में सहायता मिलती है।
(ii) खाद्य श्रृंखला की लंबाई निर्धारित होती है।
(iii) विभिन्न पोषी स्तरों के बीच ऊर्जा हानि का ज्ञान होता है।
(iv) पारिस्थितिक संतुलन को समझने में सहायता मिलती है।
(v) ऊर्जा पिरामिड की व्याख्या में उपयोगी है।
13. पोषी स्तर (Trophic Level) क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर ⇒
आहार श्रृंखला (Food Chain) में प्रत्येक चरण, जहाँ समान प्रकार के जीव ऊर्जा प्राप्त करते हैं, पोषी स्तर (Trophic Level) कहलाता है। प्रत्येक पोषी स्तर पर उपस्थित जीव भोजन एवं ऊर्जा प्राप्त करने का समान तरीका अपनाते हैं।
आहार श्रृंखला का पहला पोषी स्तर उत्पादकों का होता है, क्योंकि वे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इसके बाद क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक उपभोक्ता आते हैं।
उदाहरण—
घास → हिरण → बाघ
इस आहार श्रृंखला में—
(i) प्रथम पोषी स्तर – घास (उत्पादक)
(ii) द्वितीय पोषी स्तर – हिरण (प्राथमिक उपभोक्ता)
(iii) तृतीय पोषी स्तर – बाघ (द्वितीयक/उच्च उपभोक्ता)
पोषी स्तर का महत्व—
(i) ऊर्जा प्रवाह को स्पष्ट करता है।
(ii) जीवों के भोजन संबंध को दर्शाता है।
(iii) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
(iv) खाद्य श्रृंखला का अध्ययन सरल बनाता है।
14. यदि पीड़कनाशी (Pesticides) अपघटित न हों, तो खाद्य श्रृंखला पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर ⇒
यदि पीड़कनाशी (Pesticides) प्राकृतिक रूप से अपघटित नहीं होते, तो वे मिट्टी एवं जल में लंबे समय तक बने रहते हैं। पौधे इन्हें अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित कर लेते हैं। इसके बाद ये खाद्य श्रृंखला के माध्यम से एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर तक पहुँचते रहते हैं।
प्रत्येक उच्च पोषी स्तर पर इनकी मात्रा बढ़ती जाती है। इस प्रक्रिया को जैव आवर्धन (Biological Magnification) कहते हैं। अंततः सर्वोच्च उपभोक्ता, जैसे मनुष्य एवं बड़े मांसाहारी जीव, सबसे अधिक मात्रा में इन विषैले पदार्थों को ग्रहण करते हैं।
इसके प्रमुख दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं—
(i) जैव आवर्धन की प्रक्रिया होती है।
(ii) मनुष्य एवं पशुओं में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं।
(iii) कैंसर एवं तंत्रिका संबंधी रोग हो सकते हैं।
(iv) प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
(v) पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाता है।
15. आहार श्रृंखला (Food Chain) क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र में भोजन एवं ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाने वाली वह क्रमबद्ध व्यवस्था, जिसमें एक जीव दूसरे जीव का भोजन बनता है, आहार श्रृंखला (Food Chain) कहलाती है। आहार श्रृंखला का प्रारम्भ सदैव उत्पादकों से होता है तथा अंत उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं पर होता है।
आहार श्रृंखला के माध्यम से सूर्य की ऊर्जा क्रमशः विभिन्न पोषी स्तरों तक पहुँचती है। प्रत्येक स्तर पर कुछ ऊर्जा उपयोग होती है तथा शेष ऊर्जा अगले स्तर तक पहुँचती है।
उदाहरण—
सूर्य → घास → हिरण → बाघ
या
सूर्य → पौधा → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
आहार श्रृंखला का महत्व—
(i) ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाती है।
(ii) जीवों की पारस्परिक निर्भरता को स्पष्ट करती है।
(iii) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करती है।
(iv) विभिन्न पोषी स्तरों का ज्ञान कराती है.
16. आहार-जाल (Food Web) क्या है? इसका महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒
किसी पारिस्थितिक तंत्र में अनेक आहार श्रृंखलाएँ (Food Chains) आपस में जुड़कर एक जाल जैसी संरचना बनाती हैं, जिसे आहार-जाल (Food Web) कहते हैं। प्रकृति में कोई भी जीव केवल एक ही प्रकार के भोजन पर निर्भर नहीं रहता और न ही किसी जीव को केवल एक ही जीव खाता है। इसलिए अधिकांश पारिस्थितिक तंत्रों में अनेक आहार श्रृंखलाएँ परस्पर जुड़ी रहती हैं, जिससे आहार-जाल का निर्माण होता है।
आहार-जाल पारिस्थितिक तंत्र को अधिक स्थिर एवं संतुलित बनाता है। यदि किसी कारणवश एक जीव की संख्या कम हो जाए या वह समाप्त हो जाए, तो अन्य जीव वैकल्पिक भोजन प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार पूरे पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बना रहता है।
आहार-जाल का महत्व निम्नलिखित है—
(i) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखता है।
(ii) जीवों के बीच भोजन की वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
(iii) ऊर्जा का प्रवाह सुचारु रूप से बनाए रखता है।
(iv) किसी एक जीव के समाप्त होने पर भी पारितंत्र को सुरक्षित रखता है।
(v) जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
17. ओजोन (Ozone) क्या है? यह पर्यावरण की रक्षा कैसे करती है?
उत्तर ⇒
ओजोन (O₃) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी एक विशेष गैस है। यह मुख्य रूप से वायुमंडल के समताप मंडल (Stratosphere) में लगभग 15 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई पर पाई जाती है। ओजोन की यह परत पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षात्मक कवच का कार्य करती है।
सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणें जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक होती हैं। ओजोन परत इन किरणों का अधिकांश भाग अवशोषित कर लेती है और उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है। यदि ओजोन परत नष्ट हो जाए, तो मनुष्य, पशु एवं पौधों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
ओजोन परत का महत्व निम्नलिखित है—
(i) पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है।
(ii) त्वचा कैंसर की संभावना कम करती है।
(iii) आँखों के रोग जैसे मोतियाबिंद से बचाती है।
(iv) पौधों एवं फसलों की सुरक्षा करती है।
(v) पृथ्वी पर जीवन के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
18. पारितंत्र में अपघटकों (Decomposers) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
अपघटक (Decomposers) ऐसे सूक्ष्म जीव होते हैं, जो मृत पौधों, मृत जन्तुओं तथा जैविक अपशिष्टों का अपघटन करके उन्हें सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। बैक्टीरिया तथा कवक (Fungi) प्रमुख अपघटक हैं। ये प्रकृति के सफाईकर्मी (Nature’s Cleaners) माने जाते हैं।
यदि अपघटक न हों, तो मृत जीवों एवं जैविक अपशिष्टों का ढेर लग जाएगा और पोषक तत्व पुनः मिट्टी में नहीं पहुँच पाएँगे। इससे पौधों को आवश्यक खनिज नहीं मिलेंगे और सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो जाएगा।
अपघटकों की प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं—
(i) मृत जीवों का अपघटन करते हैं।
(ii) पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में मिलाते हैं।
(iii) पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं।
(iv) पदार्थों के जैव-भूरासायनिक चक्र को पूरा करते हैं।
(v) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं।
19. निचले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या अधिक क्यों होती है?
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र में प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा की मात्रा कम होती जाती है। लगभग 10% ऊर्जा ही अगले पोषी स्तर तक पहुँचती है, जबकि शेष ऊर्जा विभिन्न जैविक क्रियाओं एवं ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। इसलिए उच्च पोषी स्तर के जीवों को जीवित रहने के लिए अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।
इसी कारण प्रथम पोषी स्तर (उत्पादकों) तथा द्वितीय पोषी स्तर (शाकाहारी जीवों) की संख्या अधिक होती है, जबकि तृतीय एवं चतुर्थ पोषी स्तर (मांसाहारी जीवों) की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(i) प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा की कमी होती जाती है।
(ii) उच्च उपभोक्ताओं को अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।
(iii) उत्पादक सबसे अधिक संख्या में पाए जाते हैं।
(iv) ऊर्जा पिरामिड सदैव आधार पर चौड़ा होता है।
(v) इससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
20. उपभोक्ता (Consumers) किसे कहते हैं? प्राथमिक एवं द्वितीयक उपभोक्ता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते तथा भोजन के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं, उपभोक्ता (Consumers) कहलाते हैं। सभी जन्तु उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं।
जो जीव सीधे उत्पादकों (हरे पौधों) को खाते हैं, उन्हें प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers) कहते हैं। जबकि जो जीव प्राथमिक उपभोक्ताओं का भोजन करते हैं, उन्हें द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers) कहा जाता है।
| प्राथमिक उपभोक्ता | द्वितीयक उपभोक्ता |
|---|---|
| (i) उत्पादकों को खाते हैं। | (i) प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं। |
| (ii) सामान्यतः शाकाहारी होते हैं। | (ii) सामान्यतः मांसाहारी होते हैं। |
| (iii) दूसरे पोषी स्तर पर पाए जाते हैं। | (iii) तीसरे पोषी स्तर पर पाए जाते हैं। |
| (iv) उदाहरण – गाय, बकरी, हिरण, खरगोश। | (iv) उदाहरण – शेर, बाघ, साँप, लोमड़ी। |
उपभोक्ताओं का महत्व—
(i) ऊर्जा के प्रवाह को बनाए रखते हैं।
(ii) खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखते हैं।
(iii) विभिन्न जीवों की जनसंख्या नियंत्रित करते हैं।
(iv) पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
21. ऐरोसॉल (Aerosols) क्या हैं? इनके हानिकारक प्रभाव लिखिए।
उत्तर ⇒
ऐरोसॉल (Aerosols) ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जो गैस अथवा सूक्ष्म द्रव कणों के रूप में वायुमंडल में फैल जाते हैं। इनका उपयोग सामान्यतः परफ्यूम (Perfume), डियोडरेंट (Deodorant), शेविंग फोम, कीटनाशक स्प्रे, पेंट स्प्रे तथा अन्य स्प्रे उत्पादों में किया जाता है। पहले इन उत्पादों में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैस का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था।
जब CFC वायुमंडल के ऊपरी भाग में पहुँचती है, तो यह ओजोन परत को धीरे-धीरे नष्ट करने लगती है। ओजोन परत के पतले होने से सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक अधिक मात्रा में पहुँचती हैं, जिससे मानव, पशु-पक्षी एवं पौधों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
ऐरोसॉल के प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं—
(i) ओजोन परत का क्षय करते हैं।
(ii) पराबैंगनी किरणों की मात्रा पृथ्वी पर बढ़ जाती है।
(iii) त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिंद का खतरा बढ़ता है।
(iv) पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है।
(v) पौधों एवं फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है।
22. संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers) क्या है?
उत्तर ⇒
किसी पारिस्थितिक तंत्र में विभिन्न पोषी स्तरों (Trophic Levels) पर उपस्थित जीवों की संख्या को पिरामिड के रूप में प्रदर्शित करने वाली आकृति को संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers) कहते हैं। यह दर्शाता है कि प्रत्येक पोषी स्तर पर जीवों की संख्या कितनी है।
अधिकांश पारिस्थितिक तंत्रों में उत्पादकों की संख्या सबसे अधिक होती है। जैसे-जैसे हम उच्च पोषी स्तर की ओर बढ़ते हैं, जीवों की संख्या कम होती जाती है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पोषी स्तर पर ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है।
संख्या के पिरामिड की विशेषताएँ—
(i) आधार पर उत्पादकों की संख्या सबसे अधिक होती है।
(ii) उच्च पोषी स्तरों पर जीवों की संख्या कम होती जाती है।
(iii) यह ऊर्जा प्रवाह को अप्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है।
(iv) पारिस्थितिक संतुलन को समझने में सहायता करता है।
(v) खाद्य श्रृंखला के अध्ययन में उपयोगी है।
23. अजैव निम्नीकरणीय (Non-Biodegradable) पदार्थ पर्यावरण को किन-किन प्रकार से प्रभावित करते हैं?
उत्तर ⇒
अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ ऐसे पदार्थ होते हैं, जिनका प्राकृतिक रूप से अपघटन नहीं होता। ये वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं तथा धीरे-धीरे मिट्टी, जल एवं वायु को प्रदूषित करते हैं। प्लास्टिक, DDT, काँच, एल्यूमिनियम तथा रेडियोधर्मी पदार्थ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके जैव आवर्धन (Biological Magnification) उत्पन्न करते हैं, जिससे मनुष्य सहित सभी जीवों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं—
(i) पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं।
(ii) मिट्टी एवं जल प्रदूषण बढ़ाते हैं।
(iii) जैव आवर्धन का कारण बनते हैं।
(iv) मानव एवं पशुओं में अनेक रोग उत्पन्न करते हैं।
(v) पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करते हैं।
24. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों की मात्रा वातावरण में बढ़ने के प्रमुख कारण क्या हैं?
उत्तर ⇒
आधुनिक औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग के कारण अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इन पदार्थों का प्राकृतिक रूप से अपघटन नहीं होता, इसलिए ये वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं।
कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा, प्लास्टिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग, रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग तथा इलेक्ट्रॉनिक कचरा इस समस्या के प्रमुख कारण हैं।
मुख्य कारण निम्नलिखित हैं—
(i) उद्योगों एवं कारखानों का विस्तार।
(ii) प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग।
(iii) रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अधिक प्रयोग।
(iv) ई-कचरे (E-Waste) में वृद्धि।
(v) कचरे का उचित प्रबंधन न होना।
25. पारिस्थितिक तंत्र के जैविक घटकों का वर्णन कीजिए। उत्पादक एवं उपभोक्ता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र के जैविक घटकों में सभी जीवित जीव सम्मिलित होते हैं। इन्हें मुख्य रूप से उत्पादक (Producers), उपभोक्ता (Consumers) तथा अपघटक (Decomposers) में विभाजित किया जाता है। ये तीनों मिलकर ऊर्जा प्रवाह एवं पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखते हैं।
उत्पादक एवं उपभोक्ता में अंतर—
| उत्पादक (Producer) | उपभोक्ता (Consumer) |
|---|---|
| (i) अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। | (i) अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते। |
| (ii) प्रकाश-संश्लेषण करते हैं। | (ii) भोजन के लिए उत्पादकों या अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। |
| (iii) प्रथम पोषी स्तर पर होते हैं। | (iii) द्वितीय या उच्च पोषी स्तर पर होते हैं। |
| (iv) उदाहरण – हरे पौधे, शैवाल। | (iv) उदाहरण – गाय, हिरण, शेर, मनुष्य। |
जैविक घटकों का महत्व—
(i) ऊर्जा प्रवाह बनाए रखते हैं।
(ii) खाद्य श्रृंखला का निर्माण करते हैं।
(iii) पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।
(iv) जैव विविधता को बनाए रखने में सहायता करते हैं.
26. पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) एवं जीवोम (Biome) में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) जीवों तथा उनके आसपास के जैविक एवं अजैविक वातावरण से मिलकर बनी एक प्राकृतिक इकाई है, जिसमें ऊर्जा का प्रवाह एवं पदार्थों का चक्र निरंतर चलता रहता है। दूसरी ओर, जीवोम (Biome) पृथ्वी का बहुत बड़ा भौगोलिक क्षेत्र होता है, जहाँ समान जलवायु, समान वनस्पति तथा समान प्रकार के जीव पाए जाते हैं। एक जीवोम के अंतर्गत अनेक छोटे-छोटे पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित होते हैं।
उदाहरण के लिए एक तालाब एक पारिस्थितिक तंत्र है, जबकि वन जीवोम (Forest Biome) के अंतर्गत अनेक तालाब, नदियाँ, घास के मैदान तथा जंगल शामिल हो सकते हैं।
| पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) | जीवोम (Biome) |
|---|---|
| (i) यह छोटी प्राकृतिक इकाई है। | (i) यह बहुत बड़ा भौगोलिक क्षेत्र होता है। |
| (ii) इसमें जैव एवं अजैव घटक मिलकर कार्य करते हैं। | (ii) इसमें अनेक पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित होते हैं। |
| (iii) इसका क्षेत्रफल अपेक्षाकृत छोटा होता है। | (iii) इसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा होता है। |
| (iv) उदाहरण – तालाब, बगीचा, खेत। | (iv) उदाहरण – मरुस्थल, वन, घासस्थल, टुण्ड्रा। |
27. जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable) एवं अजैव निम्नीकरणीय (Non-Biodegradable) अपशिष्टों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒
प्रकृति में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट पदार्थ दो प्रकार के होते हैं— जैव निम्नीकरणीय तथा अजैव निम्नीकरणीय। जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का अपघटन बैक्टीरिया एवं कवक जैसे सूक्ष्मजीव आसानी से कर देते हैं, जबकि अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का प्राकृतिक रूप से अपघटन नहीं होता या बहुत लंबे समय में होता है।
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत कम हानिकारक होते हैं, जबकि अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं और प्रदूषण का कारण बनते हैं।
| जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट | अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट |
|---|---|
| (i) सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित हो जाते हैं। | (i) सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित नहीं होते। |
| (ii) पर्यावरण में शीघ्र मिल जाते हैं। | (ii) वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं। |
| (iii) खाद (Compost) बन सकते हैं। | (iii) जैव आवर्धन का कारण बनते हैं। |
| (iv) उदाहरण – पत्तियाँ, गोबर, भोजन के अवशेष। | (iv) उदाहरण – प्लास्टिक, DDT, काँच, धातुएँ। |
28. जैव आवर्धन (Biological Magnification) क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर ⇒
जब कोई विषैला तथा अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ जैसे DDT, पारा (Mercury) अथवा सीसा (Lead) खाद्य श्रृंखला के माध्यम से एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर तक पहुँचता है और प्रत्येक उच्च पोषी स्तर पर उसकी सांद्रता (Concentration) बढ़ती जाती है, तो इस प्रक्रिया को जैव आवर्धन (Biological Magnification) कहते हैं।
चूँकि ये पदार्थ अपघटित नहीं होते, इसलिए ये जीवों के शरीर में जमा होते रहते हैं। सबसे अधिक मात्रा सर्वोच्च उपभोक्ता, जैसे मनुष्य, बाज या बाघ के शरीर में पाई जाती है।
उदाहरण—
DDT → घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज
इस आहार श्रृंखला में DDT की सर्वाधिक मात्रा बाज के शरीर में होगी।
जैव आवर्धन के दुष्प्रभाव—
(i) कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं।
(ii) तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो सकता है।
(iii) प्रजनन क्षमता कम हो सकती है।
(iv) वन्य जीवों की संख्या घट सकती है।
(v) पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता है।
29. 10% का नियम (Ten Percent Law) क्या है?
उत्तर ⇒
पारिस्थितिक तंत्र में एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर तक केवल लगभग 10 प्रतिशत ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है। शेष लगभग 90 प्रतिशत ऊर्जा श्वसन, वृद्धि, गति तथा अन्य जैविक क्रियाओं में उपयोग होकर ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। इस सिद्धांत को 10% का नियम (Ten Percent Law) कहा जाता है। इसे वैज्ञानिक रेमंड लिंडमैन (Raymond Lindeman) ने प्रस्तुत किया था।
उदाहरण के लिए यदि उत्पादकों के पास 10,000 जूल ऊर्जा है, तो प्राथमिक उपभोक्ता को लगभग 1,000 जूल, द्वितीयक उपभोक्ता को लगभग 100 जूल तथा तृतीयक उपभोक्ता को केवल 10 जूल ऊर्जा प्राप्त होगी।
10% नियम का महत्व—
(i) ऊर्जा प्रवाह को स्पष्ट करता है।
(ii) खाद्य श्रृंखला की लंबाई सीमित करता है।
(iii) उच्च पोषी स्तरों पर जीवों की संख्या कम होने का कारण बताता है।
(iv) ऊर्जा पिरामिड को समझने में सहायता करता है।
(v) पारिस्थितिक संतुलन की व्याख्या करता है।
30. ‘हमारा पर्यावरण’ अध्याय का निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर ⇒
पर्यावरण पृथ्वी पर जीवन का आधार है। इसमें जैव एवं अजैव दोनों प्रकार के घटक सम्मिलित होते हैं, जो एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक मिलकर ऊर्जा के प्रवाह तथा पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखते हैं। आहार श्रृंखला, आहार-जाल तथा विभिन्न पोषी स्तर पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं।
आज बढ़ता प्रदूषण, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, रासायनिक अपशिष्ट, वनों की कटाई तथा ओजोन परत का क्षय पर्यावरण के सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का उपयोग बढ़ाना, प्लास्टिक का कम प्रयोग करना, वृक्षारोपण करना तथा Reduce, Reuse, Recycle (3R) के सिद्धांत को अपनाना आवश्यक है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बने और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे, तो पृथ्वी पर जीवन लंबे समय तक सुरक्षित एवं संतुलित रह सकता है।