Class 9 Science Revision Notes
खाद्य संसाधनों में सुधार
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Chapter Overview
| Class | 9 |
| Subject | Science |
| Chapter Name | खाद्य संसाधनों में सुधार (Improvement in Food Resources) |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
खाद्य संसाधनों में सुधार Revision Notes
1. भोजन की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर ⇒ सभी जीवों को जीवित रहने, वृद्धि करने तथा शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को सुचारु रूप से चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन से हमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन तथा खनिज लवण प्राप्त होते हैं। कार्बोहाइड्रेट और वसा शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं, प्रोटीन शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों की मरम्मत में सहायक होता है, जबकि विटामिन और खनिज लवण शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं। संतुलित भोजन से शरीर का विकास सही ढंग से होता है तथा रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
(i) भोजन जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
(ii) भोजन ऊर्जा प्रदान करता है।
(iii) यह शरीर की वृद्धि में सहायक है।
(iv) भोजन रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
(v) संतुलित भोजन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
2. भोजन के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर ⇒ भोजन मुख्य रूप से पौधों तथा जानवरों से प्राप्त होता है। अधिकांश खाद्य पदार्थ कृषि तथा पशुपालन से प्राप्त होते हैं। अनाज, दालें, फल, सब्जियाँ एवं तिलहन पौधों से मिलते हैं, जबकि दूध, अंडा, मांस, मछली तथा शहद पशुओं से प्राप्त होते हैं। इन दोनों स्रोतों से प्राप्त खाद्य पदार्थ मानव शरीर को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इसलिए पौधों एवं पशुओं दोनों का खाद्य उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान है।
(i) भोजन पौधों से प्राप्त होता है।
(ii) भोजन पशुओं से भी प्राप्त होता है।
(iii) कृषि प्रमुख स्रोत है।
(iv) पशुपालन भी महत्वपूर्ण स्रोत है।
(v) दोनों स्रोत पोषक तत्व प्रदान करते हैं।
3. भारत में खाद्य संसाधनों में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर ⇒ भारत की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है, इसलिए खाद्यान्न की माँग भी लगातार बढ़ रही है। कृषि के लिए नई भूमि उपलब्ध नहीं है क्योंकि अधिकांश भूमि पहले से खेती के अंतर्गत है। ऐसी स्थिति में उपलब्ध भूमि से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करना आवश्यक हो गया है। इसलिए कृषि एवं पशुपालन में वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके उत्पादन क्षमता बढ़ाना आवश्यक है, ताकि बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
(i) जनसंख्या लगातार बढ़ रही है।
(ii) खाद्यान्न की माँग बढ़ रही है।
(iii) नई कृषि भूमि उपलब्ध नहीं है।
(iv) उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
(v) वैज्ञानिक कृषि की आवश्यकता है।
4. हरित क्रांति एवं श्वेत क्रांति क्या हैं?
उत्तर ⇒ हरित क्रांति के माध्यम से भारत में फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जबकि श्वेत क्रांति के द्वारा दूध के उत्पादन एवं प्रबंधन में बड़ी सफलता प्राप्त हुई। इन दोनों क्रांतियों ने देश की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि इन तकनीकों के अत्यधिक उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों का अधिक दोहन हुआ, जिससे पर्यावरणीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा। इसलिए आज संपोषणीय कृषि की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
(i) हरित क्रांति से फसल उत्पादन बढ़ा।
(ii) श्वेत क्रांति से दूध उत्पादन बढ़ा।
(iii) दोनों ने खाद्य सुरक्षा में योगदान दिया।
(iv) प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग हुआ।
(v) पर्यावरण संरक्षण भी आवश्यक है।
5. संपोषणीय कृषि प्रणाली (Sustainable Agriculture) क्या है?
उत्तर ⇒ संपोषणीय कृषि वह कृषि प्रणाली है जिसमें वर्तमान पीढ़ी की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जाता है। इसमें फसल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी, जल, पर्यावरण तथा जैव विविधता का संरक्षण भी किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिक उत्पादन प्राप्त करना तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है।
(i) पर्यावरण के अनुकूल कृषि है।
(ii) प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करती है।
(iii) भविष्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखती है।
(iv) उत्पादन एवं संरक्षण दोनों पर बल देती है।
(v) टिकाऊ कृषि प्रणाली है।
6. खाद्य सुरक्षा की चुनौती क्या है?
उत्तर ⇒ केवल अधिक मात्रा में अनाज पैदा करना ही पर्याप्त नहीं है। लोगों के पास भोजन खरीदने के लिए पर्याप्त आय भी होनी चाहिए। यदि उत्पादन अधिक हो लेकिन लोगों की क्रय-शक्ति कम हो, तो भूख और कुपोषण की समस्या बनी रहती है। इसलिए खाद्य सुरक्षा के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाना तथा सभी लोगों तक भोजन की पहुँच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
(i) केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं है।
(ii) आय भी आवश्यक है।
(iii) किसानों की आय बढ़नी चाहिए।
(iv) भूख एवं कुपोषण समाप्त करना लक्ष्य है।
(v) सभी तक भोजन पहुँचना चाहिए।
7. भोजन के विभिन्न पोषक तत्वों के स्रोत लिखिए।
उत्तर ⇒ विभिन्न पोषक तत्व अलग-अलग खाद्य पदार्थों से प्राप्त होते हैं। कार्बोहाइड्रेट गेहूँ, चावल, मक्का एवं बाजरा से, प्रोटीन दालों से, वसा तिलहन फसलों जैसे सरसों, मूँगफली एवं सोयाबीन से प्राप्त होती है। विटामिन एवं खनिज लवण मुख्यतः फल, सब्जियों एवं मसालों से मिलते हैं। पशुओं के भोजन के लिए बरसीम, जई तथा सूडान घास जैसी चारा फसलें उगाई जाती हैं।
| पोषक तत्व | प्रमुख स्रोत |
|---|---|
| कार्बोहाइड्रेट | गेहूँ, चावल, मक्का |
| प्रोटीन | दालें |
| वसा | सरसों, मूँगफली, सोयाबीन |
| विटामिन एवं खनिज | फल एवं सब्जियाँ |
(i) कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा देते हैं।
(ii) प्रोटीन शरीर की वृद्धि करते हैं।
(iii) वसा ऊर्जा का स्रोत है।
(iv) फल एवं सब्जियाँ विटामिन देती हैं।
(v) चारा फसलें पशुओं के लिए होती हैं।
8. खरीफ एवं रबी फसलों में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ भारत में फसलों को बोने के मौसम के आधार पर मुख्यतः खरीफ एवं रबी फसलों में बाँटा जाता है। खरीफ फसलें वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं, जबकि रबी फसलें शीत ऋतु में बोई जाती हैं।
| खरीफ फसल | रबी फसल |
|---|---|
| जून–अक्टूबर | नवंबर–अप्रैल |
| वर्षा ऋतु में बोई जाती है | शीत ऋतु में बोई जाती है |
| धान, मक्का, सोयाबीन | गेहूँ, चना, सरसों |
(i) खरीफ वर्षा ऋतु की फसल है।
(ii) रबी शीत ऋतु की फसल है।
(iii) धान खरीफ फसल है।
(iv) गेहूँ रबी फसल है।
(v) दोनों का बोने का समय अलग है।
9. कृषि में शामिल प्रणालियों के प्रमुख चरण लिखिए।
उत्तर ⇒ कृषि उत्पादन की प्रक्रिया को मुख्यतः तीन प्रमुख चरणों में बाँटा जाता है। पहला चरण उत्तम बीजों का चयन है। दूसरा चरण फसल की उचित देखभाल, जिसमें सिंचाई, खाद एवं उर्वरकों का उपयोग तथा खरपतवार नियंत्रण शामिल है। तीसरा चरण फसल की सुरक्षा एवं भंडारण है, जिससे कटाई के बाद फसल को खराब होने से बचाया जा सके। इन तीनों चरणों का सही प्रबंधन अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
(i) उत्तम बीजों का चयन।
(ii) फसल की उचित देखभाल।
(iii) फसल की सुरक्षा।
(iv) उचित भंडारण।
(v) सभी चरण उत्पादन बढ़ाते हैं।
10. फसल उत्पादन में सुधार के प्रमुख वर्ग लिखिए।
उत्तर ⇒ फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है। पहला फसल की किस्मों में सुधार, जिसमें अधिक उत्पादन एवं रोग-प्रतिरोधी किस्में विकसित की जाती हैं। दूसरा फसल उत्पादन प्रबंधन, जिसमें सिंचाई, खाद एवं कृषि तकनीकों का उचित उपयोग किया जाता है। तीसरा फसल सुरक्षा प्रबंधन, जिसमें खरपतवार, कीट एवं रोगों से फसल की रक्षा की जाती है। इन तीनों के समन्वित उपयोग से कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
(i) फसल की किस्मों में सुधार।
(ii) फसल उत्पादन प्रबंधन।
(iii) फसल सुरक्षा प्रबंधन।
(iv) उत्पादन बढ़ाने में सहायक हैं।
(v) आधुनिक कृषि का आधार हैं।
11. फसल की किस्मों में सुधार क्या है?
उत्तर ⇒ फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली नई किस्मों का चयन एवं विकास करना फसल की किस्मों में सुधार कहलाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिक उत्पादन प्राप्त करना, रोग एवं कीट-प्रतिरोधी किस्में विकसित करना, कम जल एवं उर्वरक में अधिक उपज प्राप्त करना तथा अच्छी गुणवत्ता वाली फसलें तैयार करना है। फसल सुधार के लिए वैज्ञानिक संकरण तथा आनुवंशिक रूपांतरण जैसी विधियों का उपयोग करते हैं। इससे किसानों को अधिक लाभ तथा उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता का भोजन प्राप्त होता है।
(i) नई एवं उन्नत किस्में विकसित की जाती हैं।
(ii) अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।
(iii) रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
(iv) कम संसाधनों में अच्छी उपज मिलती है।
(v) फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है।
12. फसल सुधार की प्रमुख विधियाँ लिखिए।
उत्तर ⇒ फसल सुधार के लिए मुख्यतः संकरण (Hybridization) तथा आनुवंशिक रूपांतरण (Genetic Modification) विधियों का उपयोग किया जाता है। संकरण में विभिन्न गुणों वाले पौधों को मिलाकर नई किस्म तैयार की जाती है। आनुवंशिक रूपांतरण में पौधों में इच्छित गुणों वाले जीन प्रविष्ट कराए जाते हैं, जिससे अधिक उत्पादन, रोग-प्रतिरोधक क्षमता तथा बेहतर गुणवत्ता वाली फसलें प्राप्त होती हैं। इन वैज्ञानिक विधियों से कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
(i) संकरण प्रमुख विधि है।
(ii) आनुवंशिक रूपांतरण दूसरी विधि है।
(iii) नई किस्में विकसित होती हैं।
(iv) रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
(v) उत्पादन में वृद्धि होती है।
13. संकरण (Hybridization) क्या है? इसके प्रकार लिखिए।
उत्तर ⇒ विभिन्न आनुवंशिक गुणों वाले पौधों को मिलाकर नई एवं उन्नत किस्म तैयार करने की प्रक्रिया को संकरण (Hybridization) कहते हैं। इस प्रक्रिया से प्राप्त नई किस्मों में दोनों पौधों के अच्छे गुण पाए जाते हैं। संकरण तीन प्रकार का होता है— अंतराकिस्मीय संकरण, अंतरास्पीशीज संकरण तथा अंतरावंशीय संकरण। इन विधियों द्वारा अधिक उत्पादन, रोग प्रतिरोध तथा बेहतर गुणवत्ता वाली फसलें विकसित की जाती हैं।
(i) दो विभिन्न पौधों का संकरण किया जाता है।
(ii) नई किस्म तैयार होती है।
(iii) अंतराकिस्मीय संकरण।
(iv) अंतरास्पीशीज संकरण।
(v) अंतरावंशीय संकरण।
14. आनुवंशिक रूपांतरण (Genetic Modification) क्या है?
उत्तर ⇒ आनुवंशिक रूपांतरण वह विधि है जिसमें पौधों में इच्छित गुणों वाले जीन प्रविष्ट कराए जाते हैं। इससे आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (GM) फसलें प्राप्त होती हैं। इन फसलों में रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है तथा ये अधिक उत्पादन देती हैं। आधुनिक कृषि में इस तकनीक का उपयोग गुणवत्तापूर्ण एवं अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित करने के लिए किया जाता है।
(i) इसमें इच्छित जीन डाले जाते हैं।
(ii) GM फसलें प्राप्त होती हैं।
(iii) रोग-प्रतिरोध बढ़ता है।
(iv) उत्पादन अधिक होता है।
(v) आधुनिक तकनीक है।
15. फसल की किस्मों में सुधार के प्रमुख कारक लिखिए।
उत्तर ⇒ फसल सुधार का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करना नहीं है, बल्कि ऐसी किस्में विकसित करना भी है जो विभिन्न परिस्थितियों में अच्छी उपज दें। इसके प्रमुख कारक हैं— उच्च उत्पादन, उन्नत गुणवत्ता, जैविक एवं अजैविक प्रतिरोधकता, परिपक्वन काल में परिवर्तन, व्यापक अनुकूलता तथा ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण। इन गुणों वाली फसलें किसानों की आय बढ़ाने तथा कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में सहायक होती हैं।
(i) उच्च उत्पादन।
(ii) उन्नत गुणवत्ता।
(iii) जैविक एवं अजैविक प्रतिरोधकता।
(iv) व्यापक अनुकूलता।
(v) ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण।
16. फसल उत्पादन प्रबंधन क्या है?
उत्तर ⇒ फसलों की अधिक एवं अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत, संसाधनों तथा आधुनिक तकनीकों का उचित उपयोग करना फसल उत्पादन प्रबंधन कहलाता है। इसमें बीज, खाद, उर्वरक, सिंचाई, कृषि यंत्र तथा अन्य संसाधनों का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जाता है। किसान की आर्थिक क्षमता के आधार पर उत्पादन प्रणाली बिना लागत, अल्प लागत तथा अधिक लागत उत्पादन प्रणाली में विभाजित की जाती है।
(i) संसाधनों का उचित उपयोग किया जाता है।
(ii) उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य होता है।
(iii) आधुनिक तकनीक अपनाई जाती है।
(iv) आर्थिक क्षमता पर आधारित होती है।
(v) वैज्ञानिक खेती का भाग है।
17. उत्पादन प्रणालियों के प्रकार लिखिए।
उत्तर ⇒ किसानों की आर्थिक स्थिति के आधार पर उत्पादन प्रणालियाँ तीन प्रकार की होती हैं। बिना लागत उत्पादन प्रणाली में पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया जाता है। अल्प लागत उत्पादन प्रणाली में सीमित संसाधनों के साथ बेहतर बीज एवं खाद का उपयोग किया जाता है। अधिक लागत उत्पादन प्रणाली में उन्नत बीज, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक तथा मशीनों का प्रयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जाता है।
| उत्पादन प्रणाली | विशेषता |
|---|---|
| बिना लागत | पारंपरिक खेती |
| अल्प लागत | सीमित संसाधनों का उपयोग |
| अधिक लागत | आधुनिक तकनीक एवं अधिक उत्पादन |
(i) बिना लागत उत्पादन प्रणाली।
(ii) अल्प लागत उत्पादन प्रणाली।
(iii) अधिक लागत उत्पादन प्रणाली।
(iv) आर्थिक क्षमता पर आधारित हैं।
(v) उद्देश्य अधिक उत्पादन है।
18. फसल उत्पादन बढ़ाने की प्रमुख तकनीकें लिखिए।
उत्तर ⇒ फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए मुख्यतः पोषक प्रबंधन, सिंचाई तथा फसल पैटर्न का उपयोग किया जाता है। पोषक प्रबंधन के अंतर्गत पौधों को आवश्यक पोषक तत्व दिए जाते हैं। सिंचाई द्वारा समय पर पानी उपलब्ध कराया जाता है। फसल पैटर्न अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है। इन तीनों तकनीकों का समुचित उपयोग आधुनिक कृषि की सफलता का आधार है।
(i) पोषक प्रबंधन।
(ii) सिंचाई।
(iii) फसल पैटर्न।
(iv) उत्पादन में वृद्धि होती है।
(v) आधुनिक कृषि में आवश्यक हैं।
19. पौधों के पोषक तत्वों के स्रोत एवं प्रकार लिखिए।
उत्तर ⇒ पौधों को आवश्यक पोषक तत्व हवा, पानी तथा मिट्टी से प्राप्त होते हैं। हवा से कार्बन एवं ऑक्सीजन, पानी से हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन तथा मिट्टी से अन्य सभी पोषक तत्व मिलते हैं। पोषक तत्व दो प्रकार के होते हैं— वृहत् पोषक (Macronutrients) तथा सूक्ष्म पोषक (Micronutrients)। वृहत् पोषकों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम आदि तथा सूक्ष्म पोषकों में आयरन, जिंक, बोरॉन आदि सम्मिलित हैं।
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| वृहत् पोषक | N, P, K, Ca, Mg, S |
| सूक्ष्म पोषक | Fe, Zn, B, Cu, Mn |
(i) पोषक तत्व हवा से मिलते हैं।
(ii) पानी से भी प्राप्त होते हैं।
(iii) मिट्टी प्रमुख स्रोत है।
(iv) वृहत् पोषक अधिक मात्रा में चाहिए।
(v) सूक्ष्म पोषक कम मात्रा में चाहिए।
20. पौधों में पोषक तत्वों की कमी के प्रभाव लिखिए।
उत्तर ⇒ यदि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते हैं, तो उनकी वृद्धि रुक जाती है। पत्तियाँ पीली या विकृत हो जाती हैं तथा पौधों की जनन क्रियाएँ प्रभावित होती हैं। ऐसे पौधे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और उत्पादन में कमी आती है। इस समस्या के समाधान के लिए मिट्टी में खाद एवं उर्वरकों का उचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
(i) वृद्धि रुक जाती है।
(ii) पत्तियाँ पीली हो जाती हैं।
(iii) जनन क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
(iv) रोगों का खतरा बढ़ता है।
(v) खाद एवं उर्वरक से कमी दूर की जाती है।
21. खाद (Manure) क्या है? इसके लाभ लिखिए।
उत्तर ⇒ खाद एक प्राकृतिक उर्वरक है, जो पशुओं के अपशिष्ट, गोबर, पत्तियों, खरपतवार तथा अन्य जैविक पदार्थों के सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन से बनती है। इसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता एवं संरचना में सुधार करते हैं। खाद मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ाती है, सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाती है तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायता करती है। यह रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक पर्यावरण-अनुकूल होती है और दीर्घकाल तक मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखती है।
(i) खाद प्राकृतिक उर्वरक है।
(ii) यह जैविक पदार्थों से बनती है।
(iii) मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है।
(iv) जलधारण क्षमता बढ़ाती है।
(v) पर्यावरण के लिए सुरक्षित है।
22. खाद के प्रकार लिखिए।
उत्तर ⇒ खाद मुख्यतः दो प्रकार की होती है— (i) कंपोस्ट एवं वर्मीकम्पोस्ट तथा (ii) हरी खाद। कंपोस्ट कृषि एवं घरेलू जैविक कचरे को सड़ाकर बनाई जाती है, जबकि वर्मीकम्पोस्ट केंचुओं की सहायता से तैयार की जाती है। हरी खाद बनाने के लिए मुख्य फसल बोने से पहले मूँग, ग्वार या पटसन जैसी फसलों को उगाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इनके सड़ने पर मिट्टी में नाइट्रोजन तथा अन्य पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।
(i) कंपोस्ट खाद।
(ii) वर्मीकम्पोस्ट।
(iii) हरी खाद।
(iv) केंचुओं से वर्मीकम्पोस्ट बनती है।
(v) हरी खाद मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
23. उर्वरक (Fertilizer) क्या है? इसके लाभ एवं हानियाँ लिखिए।
उत्तर ⇒ उर्वरक व्यावसायिक रूप से तैयार किए गए रासायनिक पदार्थ हैं, जो पौधों को आवश्यक पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) तथा पोटैशियम (K) प्रदान करते हैं। इनके प्रयोग से पौधों की वृद्धि तेज़ होती है तथा कम समय में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। लेकिन लगातार एवं अधिक मात्रा में प्रयोग करने से मिट्टी की उर्वरता घट सकती है तथा जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसलिए उर्वरकों का प्रयोग उचित मात्रा एवं सही समय पर करना चाहिए।
(i) उर्वरक रासायनिक पदार्थ हैं।
(ii) पौधों को NPK प्रदान करते हैं।
(iii) उत्पादन बढ़ाते हैं।
(iv) अधिक प्रयोग हानिकारक है।
(v) संतुलित उपयोग आवश्यक है।
24. परम्परागत खाद एवं रासायनिक उर्वरकों में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ परम्परागत खाद तथा रासायनिक उर्वरक दोनों का उद्देश्य पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराना है, किन्तु इनकी प्रकृति एवं प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
| परम्परागत खाद | रासायनिक उर्वरक |
|---|---|
| जैविक पदार्थों से बनती है। | रासायनिक पदार्थों से बनते हैं। |
| मिट्टी की संरचना सुधारती है। | मिट्टी की संरचना पर विशेष प्रभाव नहीं। |
| जलधारण क्षमता बढ़ाती है। | जलधारण क्षमता नहीं बढ़ाती। |
| पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। | अधिक प्रयोग से प्रदूषण हो सकता है। |
| पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध कराती है। | पोषक तत्व शीघ्र उपलब्ध कराती है। |
(i) खाद प्राकृतिक होती है।
(ii) उर्वरक रासायनिक होते हैं।
(iii) खाद मिट्टी सुधारती है।
(iv) उर्वरकों का अधिक प्रयोग हानिकारक है।
(v) दोनों का उद्देश्य पोषक तत्व देना है।
25. कार्बनिक खेती (Organic Farming) क्या है?
उत्तर ⇒ कार्बनिक खेती वह कृषि पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं शाकनाशियों का प्रयोग बहुत कम या बिल्कुल नहीं किया जाता। इसमें गोबर की खाद, कंपोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, जैव उर्वरक, नील-हरित शैवाल तथा कृषि अपशिष्टों का उपयोग किया जाता है। कीट नियंत्रण के लिए नीम की पत्तियाँ, हल्दी तथा अन्य प्राकृतिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। यह खेती पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी सहायक होती है।
(i) रासायनिक उर्वरकों का कम प्रयोग होता है।
(ii) जैविक खाद का उपयोग किया जाता है।
(iii) प्राकृतिक कीटनाशक अपनाए जाते हैं।
(iv) पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
(v) मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
26. सिंचाई (Irrigation) क्या है? इसकी आवश्यकता एवं स्रोत लिखिए।
उत्तर ⇒ फसलों को नियमित समयान्तराल पर नियंत्रित मात्रा में पानी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं। भारत की अधिकांश कृषि वर्षा पर निर्भर है, इसलिए समय पर वर्षा न होने पर सिंचाई आवश्यक हो जाती है। सिंचाई के प्रमुख स्रोत कुएँ, नलकूप, नहरें, नदियाँ तथा तालाब हैं। उचित सिंचाई से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।
(i) सिंचाई नियंत्रित जल आपूर्ति है।
(ii) वर्षा पर निर्भरता कम करती है।
(iii) उत्पादन बढ़ाती है।
(iv) प्रमुख स्रोत कुएँ एवं नहरें हैं।
(v) पौधों की वृद्धि में सहायक है।
27. सिंचाई की प्रमुख विधियाँ लिखिए।
उत्तर ⇒ सिंचाई के लिए अनेक विधियाँ अपनाई जाती हैं। इनमें खुदे हुए कुएँ, नलकूप, नहरें, नदी जल उठाव प्रणाली तथा तालाब प्रमुख हैं। आधुनिक कृषि में वर्षा जल संग्रहण, छोटे बाँध तथा जल विभाजन प्रबंधन का भी उपयोग किया जाता है। इन विधियों से जल का संरक्षण होता है तथा आवश्यकता के अनुसार फसलों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
(i) खुदे हुए कुएँ।
(ii) नलकूप।
(iii) नहरें।
(iv) तालाब।
(v) वर्षा जल संग्रहण।
28. फसल पैटर्न (Cropping Pattern) क्या है?
उत्तर ⇒ अधिक उत्पादन प्राप्त करने तथा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए फसलों को वैज्ञानिक ढंग से उगाने की विभिन्न विधियों को फसल पैटर्न कहते हैं। फसल पैटर्न अपनाने से पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग होता है, खरपतवार एवं रोगों का नियंत्रण होता है तथा किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है। इसके प्रमुख प्रकार हैं— मिश्रित खेती, अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र।
(i) मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
(ii) उत्पादन बढ़ता है।
(iii) रोग एवं कीट कम होते हैं।
(iv) पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग होता है।
(v) किसानों को अधिक लाभ मिलता है।
29. मिश्रित खेती, अंतराफसलीकरण एवं फसल चक्र में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ ये तीनों विधियाँ कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए अपनाई जाती हैं, लेकिन इनकी कार्यविधि अलग-अलग होती है।
| मिश्रित खेती | अंतराफसलीकरण | फसल चक्र |
|---|---|---|
| एक साथ दो या अधिक फसलें | निश्चित पंक्तियों में दो या अधिक फसलें | अलग-अलग मौसम में क्रमवार फसलें |
| कोई निश्चित पैटर्न नहीं | निश्चित पैटर्न अपनाया जाता है | पूर्व नियोजित क्रम होता है |
| जोखिम कम होता है | पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग | मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है |
(i) मिश्रित खेती में निश्चित पैटर्न नहीं होता।
(ii) अंतराफसलीकरण में निश्चित पंक्तियाँ होती हैं।
(iii) फसल चक्र में क्रमवार खेती होती है।
(iv) मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
(v) उत्पादन में वृद्धि होती है।
30. फसल सुरक्षा प्रबंधन (Crop Protection Management) क्या है?
उत्तर ⇒ फसलों को खरपतवार, कीट-पीड़कों तथा रोगों से सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को फसल सुरक्षा प्रबंधन कहते हैं। खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्व, जल एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। कीट पौधों की जड़ों, तनों, पत्तियों एवं फलों को नुकसान पहुँचाते हैं, जबकि रोग जीवाणु, कवक एवं विषाणुओं द्वारा फैलते हैं। इनसे बचाव के लिए शाकनाशी, कीटनाशी, कवकनाशी तथा रोग-प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग किया जाता है।
(i) खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है।
(ii) कीट-पीड़क फसल को नुकसान पहुँचाते हैं।
(iii) रोग जीवाणु, कवक एवं विषाणुओं से फैलते हैं।
(iv) शाकनाशी एवं कीटनाशी उपयोगी हैं।
(v) रोग-प्रतिरोधी किस्में सुरक्षा प्रदान करती हैं।
31. खरपतवार (Weeds) क्या हैं? इनके नुकसान एवं नियंत्रण के उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ फसल के साथ खेत में उगने वाले अवांछित पौधों को खरपतवार (Weeds) कहते हैं। ये कृषि योग्य भूमि में अनावश्यक होते हैं तथा फसल के साथ जल, प्रकाश, स्थान एवं पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसके कारण फसल की वृद्धि एवं उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। प्रमुख खरपतवारों में गाजर घास (पारथेनियम), गोखरू (जैन्थियम) तथा मोथा (साइप्रस रोटेंडस) शामिल हैं। इनका नियंत्रण प्रारम्भिक अवस्था में निराई-गुड़ाई, शाकनाशियों के प्रयोग, अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र अपनाकर किया जा सकता है।
(i) खरपतवार अवांछित पौधे होते हैं।
(ii) ये पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
(iii) फसल उत्पादन कम करते हैं।
(iv) शाकनाशी से नियंत्रण किया जाता है।
(v) फसल चक्र भी नियंत्रण में सहायक है।
32. कीट एवं पीड़क फसलों को कैसे नुकसान पहुँचाते हैं?
उत्तर ⇒ कीट एवं पीड़क फसलों की जड़ों, तनों, पत्तियों तथा फलों को नुकसान पहुँचाते हैं। ये मुख्यतः तीन प्रकार से हानि पहुँचाते हैं— (1) पौधों के भागों को काट देते हैं, (2) पौधों का कोशिकीय रस चूस लेते हैं तथा (3) तनों एवं फलों में छेद कर देते हैं। इससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है और उत्पादन घट जाता है। इनसे बचाव के लिए कीटनाशकों का प्रयोग, रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन तथा गर्मियों में गहरी जुताई की जाती है।
(i) जड़, तना एवं पत्तियों को नुकसान पहुँचाते हैं।
(ii) कोशिकीय रस चूसते हैं।
(iii) तनों एवं फलों में छेद करते हैं।
(iv) कीटनाशी उपयोगी हैं।
(v) प्रतिरोधी किस्में बचाव करती हैं।
33. पौध रोग क्या हैं? इनके नियंत्रण के उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ पौधों में होने वाले रोगों को पौध रोग कहा जाता है। ये मुख्यतः जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi) तथा विषाणु (Virus) के कारण होते हैं। ये रोग मिट्टी, जल तथा वायु के माध्यम से एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलते हैं। रोगों के कारण पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादन कम हो जाता है। इनकी रोकथाम के लिए रोग-प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग, उचित कृषि प्रबंधन तथा कवकनाशी एवं अन्य रोगनाशकों का प्रयोग किया जाता है।
(i) रोग जीवाणु, कवक एवं विषाणु से होते हैं।
(ii) मिट्टी, जल एवं वायु से फैलते हैं।
(iii) उत्पादन कम हो जाता है।
(iv) रोग-प्रतिरोधी किस्में उपयोगी हैं।
(v) कवकनाशी से नियंत्रण किया जाता है।
34. अनाज का भंडारण (Storage of Grains) क्या है?
उत्तर ⇒ फसल की कटाई के बाद अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को भंडारण कहते हैं। उचित भंडारण से अनाज की गुणवत्ता, वजन तथा अंकुरण क्षमता बनी रहती है। यदि भंडारण सही ढंग से न किया जाए तो अनाज कीटों, कवकों, जीवाणुओं तथा नमी के कारण खराब हो सकता है। इसलिए भंडारण से पहले अनाज की अच्छी तरह सफाई, धूप एवं छाया में सुखाना तथा आवश्यकतानुसार धूमन (Fumigation) करना चाहिए।
(i) कटाई के बाद भंडारण किया जाता है।
(ii) गुणवत्ता सुरक्षित रहती है।
(iii) अंकुरण क्षमता बनी रहती है।
(iv) नमी से बचाव आवश्यक है।
(v) धूमन उपयोगी है।
35. भंडारण के दौरान होने वाली हानियों के कारण एवं रोकथाम के उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ भंडारण के दौरान अनाज को जैविक तथा अजैविक दोनों प्रकार के कारकों से हानि होती है। जैविक कारकों में कीट, चूहे, कवक, जीवाणु एवं चिंचड़ी शामिल हैं, जबकि अजैविक कारकों में अधिक नमी एवं अनुचित तापमान प्रमुख हैं। इनके कारण अनाज का वजन, गुणवत्ता एवं अंकुरण क्षमता कम हो जाती है। रोकथाम के लिए अनाज को अच्छी तरह सुखाकर साफ स्थान पर संग्रहित करना, धूमन करना तथा उचित ताप एवं नमी बनाए रखना आवश्यक है।
| जैविक कारक | अजैविक कारक |
|---|---|
| कीट, चूहे, कवक, जीवाणु | नमी एवं तापमान |
(i) जैविक कारक अनाज को खाते हैं।
(ii) नमी नुकसान पहुँचाती है।
(iii) गुणवत्ता कम हो जाती है।
(iv) धूप में सुखाना आवश्यक है।
(v) उचित भंडारण से हानि कम होती है।
36. पशुपालन (Animal Husbandry) क्या है? इसका महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ पशुधन के पालन, प्रजनन, भोजन, स्वास्थ्य तथा प्रबंधन से संबंधित कार्यों को पशुपालन कहते हैं। पशुपालन से दूध, मांस, अंडे, ऊन एवं चमड़ा प्राप्त होता है। यह किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है तथा कृषि कार्यों के लिए बैल जैसे पशु भी उपलब्ध कराता है। आधुनिक कृषि में पशुपालन को कृषि का अभिन्न अंग माना जाता है।
(i) पशुओं का वैज्ञानिक प्रबंधन है।
(ii) दूध एवं मांस प्राप्त होता है।
(iii) किसानों की आय बढ़ती है।
(iv) कृषि कार्यों में सहायता मिलती है।
(v) ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
37. पशु कृषि (Mixed Farming) क्या है? इसके उद्देश्य लिखिए।
उत्तर ⇒ कृषि के साथ पशुओं का पालन अथवा पशुपालन के साथ कृषि करना पशु कृषि कहलाता है। इसका उद्देश्य दूध देने वाले पशुओं का पालन करना तथा कृषि कार्यों जैसे हल चलाना, सिंचाई करना एवं बोझ ढोने के लिए पशुओं का उपयोग करना है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है तथा कृषि अधिक लाभदायक बनती है।
(i) कृषि एवं पशुपालन का संयोजन है।
(ii) दूध उत्पादन बढ़ता है।
(iii) कृषि कार्यों में सहायता मिलती है।
(iv) अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
(v) संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है।
38. दूध उत्पादन बढ़ाने के प्रमुख उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए मुख्यतः नस्ल सुधार, स्वच्छता एवं आवास प्रबंधन तथा संतुलित आहार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। देशी एवं विदेशी नस्लों का संकरण करके अधिक दूध देने वाली तथा रोग-प्रतिरोधी नस्लें विकसित की जाती हैं। पशुओं का आवास साफ, सूखा एवं हवादार होना चाहिए। साथ ही उन्हें संतुलित आहार, हरा चारा, सूखा चारा तथा सांद्र आहार उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए।
(i) नस्ल सुधार आवश्यक है।
(ii) स्वच्छ आवास होना चाहिए।
(iii) संतुलित आहार देना चाहिए।
(iv) संकरण से अच्छी नस्लें मिलती हैं।
(v) दूध उत्पादन बढ़ता है।
39. पशुओं में होने वाले रोगों के प्रकार एवं रोकथाम के उपाय लिखिए।
उत्तर ⇒ पशुओं में मुख्यतः बाह्य परजीवी, अंतः परजीवी तथा संक्रामक रोग पाए जाते हैं। बाह्य परजीवी त्वचा पर रहते हैं, जबकि अंतः परजीवी शरीर के अंदर आंत एवं यकृत को प्रभावित करते हैं। संक्रामक रोग जीवाणु एवं विषाणुओं के कारण फैलते हैं। इन रोगों की रोकथाम के लिए नियमित टीकाकरण, स्वच्छता, संतुलित आहार तथा समय-समय पर पशु चिकित्सा आवश्यक होती है।
(i) बाह्य परजीवी त्वचा पर रहते हैं।
(ii) अंतः परजीवी शरीर के अंदर रहते हैं।
(iii) संक्रामक रोग फैलते हैं।
(iv) टीकाकरण आवश्यक है।
(v) स्वच्छता से रोग कम होते हैं।
40. दुधारू पशुओं के संतुलित आहार का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य एवं अधिक दूध उत्पादन के लिए संतुलित आहार अत्यंत आवश्यक है। संतुलित आहार में मोटा चारा (सूखी घास, भूसा) तथा सांद्र आहार (दाना, चोकर, तेल-बीज आदि) दोनों सम्मिलित होते हैं। इसके साथ आवश्यक खनिज लवण एवं सूक्ष्म पोषक तत्व भी दिए जाते हैं। उचित आहार से पशु स्वस्थ रहते हैं, रोग कम होते हैं तथा दूध उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।
(i) संतुलित आहार दूध उत्पादन बढ़ाता है।
(ii) मोटा एवं सांद्र चारा आवश्यक है।
(iii) खनिज लवण भी आवश्यक हैं।
(iv) पशु स्वस्थ रहते हैं।
(v) दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।
41. कुक्कुट पालन (Poultry Farming) क्या है? इसका उद्देश्य लिखिए।
उत्तर ⇒ कुक्कुट पालन वह प्रक्रिया है जिसमें मुर्गियों का पालन मुख्यतः अंडे एवं मांस के उत्पादन के लिए किया जाता है। इसके लिए उन्नत नस्लों की मुर्गियों का चयन किया जाता है ताकि अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके। आधुनिक कुक्कुट पालन में उचित आवास, संतुलित आहार, स्वच्छता तथा रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है तथा देश में प्रोटीनयुक्त भोजन की उपलब्धता बढ़ती है।
(i) कुक्कुट पालन मुर्गियों का पालन है।
(ii) इसका उद्देश्य अंडे एवं मांस उत्पादन है।
(iii) उन्नत नस्लों का उपयोग किया जाता है।
(iv) संतुलित आहार आवश्यक है।
(v) किसानों की आय बढ़ती है।
42. लेयर एवं ब्रॉयलर मुर्गियों में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ कुक्कुट पालन में मुर्गियों को उनके उपयोग के आधार पर दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है— लेयर तथा ब्रॉयलर। लेयर मुर्गियों का पालन अंडा उत्पादन के लिए किया जाता है, जबकि ब्रॉयलर मुर्गियों का पालन मांस उत्पादन के लिए किया जाता है। दोनों की देखभाल एवं आहार की आवश्यकता भी अलग-अलग होती है।
| लेयर (Layer) | ब्रॉयलर (Broiler) |
|---|---|
| अंडा उत्पादन के लिए | मांस उत्पादन के लिए |
| अंडे देने वाली मुर्गियाँ | तेजी से बढ़ने वाली मुर्गियाँ |
| संतुलित आहार आवश्यक | प्रोटीन एवं विटामिन युक्त आहार आवश्यक |
(i) लेयर अंडे देती हैं।
(ii) ब्रॉयलर मांस के लिए पाली जाती हैं।
(iii) दोनों के उद्देश्य अलग हैं।
(iv) आहार की आवश्यकता अलग होती है।
(v) दोनों का आर्थिक महत्व है।
43. मुर्गियों का नस्ल सुधार क्यों किया जाता है?
उत्तर ⇒ मुर्गियों का नस्ल सुधार अधिक अंडे एवं मांस उत्पादन प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसके लिए देशी नस्लों जैसे एसिल तथा विदेशी नस्लों जैसे लेगहार्न का संकरण कराया जाता है। नस्ल सुधार का उद्देश्य अधिक स्वस्थ चूजे प्राप्त करना, गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ाना, कम लागत में पालन करना तथा बेहतर उत्पादन देने वाली नई नस्लें विकसित करना है। इससे कुक्कुट पालन अधिक लाभदायक बनता है।
(i) अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।
(ii) संकरण द्वारा नई नस्लें बनती हैं।
(iii) रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
(iv) कम लागत में पालन संभव होता है।
(v) किसानों को अधिक लाभ मिलता है।
44. ब्रॉयलर उत्पादन (Broiler Production) क्या है?
उत्तर ⇒ ब्रॉयलर वे मुर्गियाँ होती हैं जिन्हें विशेष रूप से मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है। इनकी तेज़ वृद्धि के लिए प्रोटीन, वसा एवं विटामिन से भरपूर संतुलित आहार दिया जाता है। इनके आवास में उचित तापमान, स्वच्छता तथा रोग नियंत्रण का विशेष ध्यान रखा जाता है। उचित प्रबंधन से कम समय में अधिक वजन वाली स्वस्थ मुर्गियाँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें बाजार में मांस के लिए बेचा जाता है।
(i) ब्रॉयलर मांस के लिए पाले जाते हैं।
(ii) संतुलित आहार आवश्यक है।
(iii) तेज़ वृद्धि होती है।
(iv) स्वच्छता आवश्यक है।
(v) कम समय में उत्पादन मिलता है।
45. मुर्गी पालन में रोग प्रबंधन कैसे किया जाता है?
उत्तर ⇒ मुर्गियों में जीवाणु, विषाणु, कवक, परजीवी तथा पोषण की कमी के कारण विभिन्न रोग हो सकते हैं। इन रोगों की रोकथाम के लिए मुर्गीघर की नियमित सफाई, कीटाणुनाशकों का छिड़काव, संतुलित आहार तथा समय-समय पर टीकाकरण आवश्यक है। उचित रोग प्रबंधन अपनाने से महामारी का खतरा कम होता है तथा उत्पादन में होने वाली हानि से बचाव होता है।
(i) नियमित सफाई आवश्यक है।
(ii) कीटाणुनाशक का प्रयोग किया जाता है।
(iii) टीकाकरण आवश्यक है।
(iv) संतुलित आहार दिया जाता है।
(v) रोगों से होने वाली हानि कम होती है।
46. मत्स्य उत्पादन (Fish Production) क्या है?
उत्तर ⇒ भोजन के लिए मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों का उत्पादन मत्स्य उत्पादन कहलाता है। मछली प्रोटीन का समृद्ध, पौष्टिक एवं आसानी से पचने वाला स्रोत है। मत्स्य उत्पादन दो प्रकार से किया जाता है— प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़कर तथा मछली पालन (मत्स्य संवर्धन) द्वारा। इसमें पंखयुक्त मछलियाँ, झींगा, प्रॉन तथा अन्य जलीय जीव भी शामिल होते हैं।
(i) मछली प्रोटीन का स्रोत है।
(ii) प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों विधियाँ हैं।
(iii) मत्स्य पालन से उत्पादन बढ़ता है।
(iv) जलीय जीव भी शामिल हैं।
(v) यह महत्वपूर्ण खाद्य संसाधन है।
47. समुद्री मत्स्यिकी एवं अंतःस्थली मत्स्यिकी में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ मत्स्य उत्पादन को जल स्रोत के आधार पर समुद्री मत्स्यिकी तथा अंतःस्थली मत्स्यिकी में बाँटा जाता है।
| समुद्री मत्स्यिकी | अंतःस्थली मत्स्यिकी |
|---|---|
| समुद्र एवं महासागर में | नदियाँ, तालाब, झील आदि में |
| समुद्री मछलियाँ प्राप्त होती हैं | मीठे पानी की मछलियाँ प्राप्त होती हैं |
| समुद्री जल में होती है | ताजे अथवा खारे जल में होती है |
(i) समुद्री मत्स्यिकी समुद्र में होती है।
(ii) अंतःस्थली मत्स्यिकी मीठे जल में होती है।
(iii) दोनों के जल स्रोत अलग हैं।
(iv) मछलियों की प्रजातियाँ अलग होती हैं।
(v) दोनों खाद्य उत्पादन में महत्वपूर्ण हैं।
48. समुद्री संवर्धन (Mariculture) क्या है?
उत्तर ⇒ समुद्री जल में आर्थिक महत्व वाली मछलियों एवं अन्य जलीय जीवों के पालन को समुद्री संवर्धन (Mariculture) कहते हैं। भविष्य में समुद्री मछलियों की कमी को पूरा करने के लिए यह तकनीक अपनाई जाती है। इसमें मुलेट, भेटकी, पर्लस्पॉट, झींगा, मस्सल तथा ऑएस्टर का पालन किया जाता है। ऑएस्टर का पालन मोती उत्पादन के लिए भी किया जाता है।
(i) समुद्री जल में किया जाता है।
(ii) आर्थिक महत्व वाली प्रजातियाँ पाली जाती हैं।
(iii) झींगा एवं ऑएस्टर शामिल हैं।
(iv) मोती उत्पादन भी होता है।
(v) भविष्य की खाद्य आवश्यकता पूरी करता है।
49. मिश्रित मछली संवर्धन (Composite Fish Culture) क्या है?
उत्तर ⇒ मिश्रित मछली संवर्धन में एक ही तालाब में विभिन्न प्रकार की देशी एवं विदेशी मछलियों को एक साथ पाला जाता है। इन मछलियों का भोजन अलग-अलग होता है, जिससे वे आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं करतीं। उदाहरण के लिए कतला सतह से, रोहू बीच से, मृगल तली से तथा ग्रास कार्प खरपतवार खाती है। इससे तालाब के सभी भागों का उपयोग होता है तथा मछली उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है।
(i) एक ही तालाब में कई प्रजातियाँ पाली जाती हैं।
(ii) भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा कम होती है।
(iii) तालाब का पूरा उपयोग होता है।
(iv) उत्पादन बढ़ता है।
(v) देशी एवं विदेशी दोनों मछलियाँ शामिल हो सकती हैं।
50. मधुमक्खी पालन (Apiculture) क्या है? इसके लाभ लिखिए।
उत्तर ⇒ मधुमक्खी पालन वह प्रक्रिया है जिसमें शहद (मधु) एवं मोम प्राप्त करने के लिए मधुमक्खियों का पालन किया जाता है। यह एक लघु कृषि उद्योग है, जिसमें कम पूँजी लगती है और अधिक लाभ प्राप्त होता है। मधुमक्खियाँ फूलों के परागण में सहायता करती हैं, जिससे फसलों का उत्पादन भी बढ़ता है। इसके प्रमुख उत्पाद शहद एवं मोम हैं, जिनका उपयोग औषधि, सौंदर्य प्रसाधन तथा अन्य उद्योगों में किया जाता है।
(i) शहद एवं मोम प्राप्त होते हैं।
(ii) कम लागत में अधिक लाभ मिलता है।
(iii) परागण में सहायता मिलती है।
(iv) फसल उत्पादन बढ़ता है।
(v) ग्रामीण रोजगार का अच्छा साधन है।
51. मधुमक्खी पालन के मुख्य उत्पाद कौन-कौन से हैं?
उत्तर ⇒ मधुमक्खी पालन से मुख्य रूप से मधु (शहद) तथा मोम (Beeswax) प्राप्त होते हैं। शहद मधुमक्खियाँ फूलों के मकरंद से तैयार करती हैं। इसमें ऊर्जा, खनिज लवण, एंजाइम तथा औषधीय गुण पाए जाते हैं, इसलिए यह पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ माना जाता है। मोम मधुमक्खियों के छत्तों से प्राप्त होता है तथा इसका उपयोग मोमबत्ती, सौंदर्य प्रसाधन, औषधियों तथा विभिन्न उद्योगों में किया जाता है। ये दोनों उत्पाद आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं तथा किसानों की अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत हैं।
(i) मधु प्रमुख उत्पाद है।
(ii) मोम दूसरा प्रमुख उत्पाद है।
(iii) शहद मकरंद से बनता है।
(iv) मोम का औद्योगिक उपयोग होता है।
(v) दोनों से किसानों की आय बढ़ती है।
52. मधुमक्खी पालन के लाभ लिखिए।
उत्तर ⇒ मधुमक्खी पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला कृषि आधारित उद्योग है। इससे शहद एवं मोम प्राप्त होते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। मधुमक्खियाँ फसलों के परागण में सहायता करती हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान करता है तथा किसानों की अतिरिक्त आय का स्रोत बनता है। इसलिए आधुनिक कृषि में मधुमक्खी पालन का विशेष महत्व है।
(i) कम लागत में अधिक लाभ मिलता है।
(ii) शहद एवं मोम प्राप्त होते हैं।
(iii) परागण में सहायता मिलती है।
(iv) फसल उत्पादन बढ़ता है।
(v) रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
53. मधुमक्खियों की प्रमुख किस्में लिखिए।
उत्तर ⇒ मधुमक्खियों की देशी तथा विदेशी दोनों प्रकार की किस्में पाई जाती हैं। देशी किस्मों में ऐपिस सेरना इंडिका, ऐपिस डोरसेटा तथा ऐपिस फ्लोरी प्रमुख हैं। व्यावसायिक स्तर पर सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली विदेशी प्रजाति ऐपिस मेलीफेरा (इटालियन मधुमक्खी) है। यह अधिक शहद एकत्र करती है, कम डंक मारती है तथा लंबे समय तक छत्ते में रहती है। इसी कारण व्यावसायिक मधुमक्खी पालन में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
(i) देशी एवं विदेशी दोनों किस्में होती हैं।
(ii) ऐपिस सेरना इंडिका देशी प्रजाति है।
(iii) ऐपिस मेलीफेरा विदेशी प्रजाति है।
(iv) इटालियन मधुमक्खी अधिक शहद देती है।
(v) व्यावसायिक पालन में इसका अधिक उपयोग होता है।
54. इटालियन मधुमक्खी (Apis mellifera) की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ ऐपिस मेलीफेरा एक विदेशी (इटालियन) मधुमक्खी की प्रजाति है, जिसका उपयोग व्यावसायिक शहद उत्पादन में सबसे अधिक किया जाता है। इसकी मधु संग्रह करने की क्षमता बहुत अधिक होती है। यह कम डंक मारती है, लंबे समय तक छत्ते में रहती है तथा इसकी प्रजनन क्षमता भी अधिक होती है। इन विशेषताओं के कारण यह बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन के लिए सबसे उपयुक्त प्रजाति मानी जाती है।
(i) अधिक शहद एकत्र करती है।
(ii) कम डंक मारती है।
(iii) लंबे समय तक छत्ते में रहती है।
(iv) प्रजनन क्षमता अधिक होती है।
(v) व्यावसायिक पालन के लिए उपयुक्त है।
55. मधु (शहद) की गुणवत्ता किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर ⇒ शहद की गुणवत्ता एवं स्वाद मुख्य रूप से मधुमक्खियों को उपलब्ध फूलों के प्रकार पर निर्भर करता है। मधुमक्खियाँ फूलों से मकरंद एवं पराग एकत्र करती हैं, जिनसे शहद बनता है। यदि पर्याप्त मात्रा में विभिन्न प्रकार के फूल उपलब्ध हों, तो शहद की गुणवत्ता एवं स्वाद बेहतर होता है। इसलिए मधुमक्खी पालन के लिए उचित चरागाह तथा फूलों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।
(i) फूलों की किस्म पर निर्भर करता है।
(ii) मकरंद से शहद बनता है।
(iii) पराग भी आवश्यक है।
(iv) पर्याप्त चरागाह होना चाहिए।
(v) फूलों से स्वाद निर्धारित होता है।
56. खाद्य संसाधनों में सुधार के प्रमुख क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
उत्तर ⇒ खाद्य संसाधनों में सुधार के अंतर्गत कृषि एवं पशुपालन दोनों का विकास किया जाता है। इसके प्रमुख क्षेत्र हैं— फसल उत्पादन, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन। इन सभी क्षेत्रों में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके उत्पादन बढ़ाया जाता है। इससे बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है तथा किसानों की आय में वृद्धि होती है।
(i) फसल उत्पादन।
(ii) पशुपालन।
(iii) कुक्कुट पालन।
(iv) मत्स्य पालन।
(v) मधुमक्खी पालन।
57. फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर ⇒ अधिक फसल उत्पादन के लिए उत्तम बीजों का चयन, उचित सिंचाई, संतुलित खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग, खरपतवार एवं रोग नियंत्रण तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों का उपयोग आवश्यक है। साथ ही फसल चक्र, मिश्रित खेती एवं अंतराफसलीकरण जैसी तकनीकों को अपनाकर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जा सकती है। इन उपायों से कम लागत में अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
(i) उत्तम बीजों का चयन करें।
(ii) उचित सिंचाई करें।
(iii) संतुलित खाद एवं उर्वरक दें।
(iv) रोग एवं खरपतवार नियंत्रित करें।
(v) वैज्ञानिक कृषि अपनाएँ।
58. कृषि एवं पशुपालन का परस्पर संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ कृषि एवं पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। कृषि से पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है, जबकि पशुओं से गोबर एवं अन्य जैविक पदार्थ प्राप्त होते हैं, जिनसे खाद बनाई जाती है। पशुपालन किसानों की आय बढ़ाता है तथा कृषि कार्यों में भी सहायता करता है। दोनों के समन्वित विकास से खाद्य उत्पादन बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
(i) दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
(ii) कृषि से चारा मिलता है।
(iii) पशुओं से गोबर प्राप्त होता है।
(iv) खाद बनाने में सहायता मिलती है।
(v) किसानों की आय बढ़ती है।
59. खाद्य संसाधनों के सुधार में वैज्ञानिक तकनीकों का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग से कृषि एवं पशुपालन दोनों में उत्पादन क्षमता बढ़ी है। उन्नत बीज, संकरण, आनुवंशिक रूपांतरण, आधुनिक सिंचाई, संतुलित पोषक प्रबंधन तथा रोग नियंत्रण जैसी तकनीकों से कम भूमि में अधिक उत्पादन संभव हुआ है। पशुपालन, मत्स्य पालन एवं मधुमक्खी पालन में भी वैज्ञानिक प्रबंधन से उत्पादकता बढ़ी है। इन तकनीकों से खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है तथा किसानों की आय में वृद्धि होती है।
(i) उत्पादन बढ़ता है।
(ii) उन्नत बीज विकसित होते हैं।
(iii) आधुनिक तकनीकें उपयोगी हैं।
(iv) खाद्य सुरक्षा बढ़ती है।
(v) किसानों की आय बढ़ती है।
60. खाद्य संसाधनों में सुधार का महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खाद्य संसाधनों में सुधार अत्यंत आवश्यक है। वैज्ञानिक कृषि, पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन एवं मधुमक्खी पालन के माध्यम से अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, पर्यावरण संतुलन तथा किसानों की आय में वृद्धि भी संभव होती है। इसलिए खाद्य संसाधनों का सतत एवं वैज्ञानिक विकास देश की आर्थिक प्रगति तथा खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(i) खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
(ii) उत्पादन में वृद्धि होती है।
(iii) किसानों की आय बढ़ती है।
(iv) प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है।
(v) देश के सतत विकास में योगदान मिलता है।