Class 9 Science Revision Notes
कार्य तथा ऊर्जा
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Chapter Overview
| Class | 9 |
| Subject | Science |
| Chapter Name | कार्य तथा ऊर्जा |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
कार्य तथा ऊर्जा Revision Notes
1. जैव प्रक्रम (Life Process) क्या है?
उत्तर ⇒ जीवित रहने के लिए सभी सजीवों को अनेक आवश्यक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, जैसे भोजन प्राप्त करना, श्वसन करना, वृद्धि करना, उत्सर्जन करना तथा प्रजनन करना। इन सभी आवश्यक जीवन क्रियाओं को जैव प्रक्रम (Life Process) कहा जाता है। ये प्रक्रियाएँ जीवों के शरीर को जीवित रखने तथा उसके सामान्य कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक होती हैं। यदि ये जैव प्रक्रम बंद हो जाएँ, तो जीवित रहना संभव नहीं होता। इसलिए प्रत्येक सजीव के जीवन के लिए जैव प्रक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
(i) जैव प्रक्रम जीवन के लिए आवश्यक क्रियाएँ हैं।
(ii) ये केवल सजीवों में पाए जाते हैं।
(iii) इनके बिना जीवन संभव नहीं है।
(iv) श्वसन, पोषण एवं उत्सर्जन इसके उदाहरण हैं।
(v) ये शरीर को स्वस्थ एवं सक्रिय बनाए रखते हैं।
2. कार्य (Work) क्या है?
उत्तर ⇒ जब किसी वस्तु पर बल लगाने से उसमें विस्थापन या परिवर्तन होता है, तब कहा जाता है कि कार्य (Work) हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टि से केवल बल लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बल के प्रभाव से वस्तु का विस्थापन होना भी आवश्यक है। यदि वस्तु पर बल लगाया जाए लेकिन वह अपनी जगह से न हिले, तो कार्य शून्य माना जाता है। कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सजीवों को ऊर्जा भोजन से तथा मशीनों को ईंधन से प्राप्त होती है।
(i) कार्य के लिए बल आवश्यक है।
(ii) कार्य के लिए विस्थापन भी आवश्यक है।
(iii) केवल बल लगाने से कार्य नहीं होता।
(iv) कार्य करने के लिए ऊर्जा चाहिए।
(v) कार्य का वैज्ञानिक अर्थ दैनिक जीवन से भिन्न है।
3. दैनिक जीवन एवं विज्ञान की दृष्टि से कार्य में क्या अंतर है?
उत्तर ⇒ दैनिक जीवन में किसी भी शारीरिक या मानसिक परिश्रम को कार्य कहा जाता है, जैसे पढ़ाई करना, खेलना, चित्र बनाना या बातचीत करना। लेकिन विज्ञान में कार्य तभी माना जाता है जब किसी वस्तु पर बल लगाया जाए और वह बल की दिशा में विस्थापित हो। यदि बल लगाया गया लेकिन वस्तु नहीं हिली, तो वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य नहीं हुआ। इसलिए विज्ञान में कार्य की स्पष्ट परिभाषा बल और विस्थापन पर आधारित होती है।
| दैनिक जीवन में कार्य | विज्ञान में कार्य |
|---|---|
| शारीरिक या मानसिक परिश्रम को कार्य कहते हैं। | बल लगाने से विस्थापन होने पर कार्य होता है। |
| विस्थापन आवश्यक नहीं है। | विस्थापन आवश्यक है। |
| सामान्य अर्थ में प्रयोग होता है। | वैज्ञानिक नियमों पर आधारित होता है। |
(i) दैनिक जीवन का अर्थ सामान्य होता है।
(ii) विज्ञान में बल आवश्यक है।
(iii) विज्ञान में विस्थापन आवश्यक है।
(iv) बिना विस्थापन कार्य शून्य होता है।
(v) दोनों की परिभाषाएँ अलग हैं।
4. कार्य होने की आवश्यक शर्तें लिखिए।
उत्तर ⇒ वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य होने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं। सबसे पहले वस्तु पर बल लगाया जाना चाहिए। दूसरा, बल लगाने के कारण वस्तु में विस्थापन होना चाहिए। तीसरा, बल का कम-से-कम कुछ भाग विस्थापन की दिशा में होना चाहिए। यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती, तो कार्य नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, चट्टान को धक्का देने पर यदि वह नहीं हिलती, तो कार्य शून्य होगा।
(i) वस्तु पर बल लगाया जाए।
(ii) वस्तु में विस्थापन हो।
(iii) बल का कुछ भाग विस्थापन की दिशा में हो।
(iv) बिना विस्थापन कार्य नहीं होता।
(v) सभी शर्तें पूरी होने पर ही कार्य होता है।
5. कार्य का सूत्र एवं SI मात्रक लिखिए।
उत्तर ⇒ जब बल और विस्थापन एक ही दिशा में हों, तब कार्य का सूत्र निम्नलिखित होता है—
कार्य (W) = बल (F) × विस्थापन (s)
W = F × s
कार्य का SI मात्रक न्यूटन-मीटर (N-m) है, जिसे जूल (J) कहा जाता है। यदि किसी वस्तु पर 1 न्यूटन का बल लगाकर उसे बल की दिशा में 1 मीटर विस्थापित किया जाए, तो किया गया कार्य 1 जूल कहलाता है।
(i) कार्य का सूत्र W = F × s है।
(ii) W कार्य को दर्शाता है।
(iii) F बल को दर्शाता है।
(iv) s विस्थापन को दर्शाता है।
(v) SI मात्रक जूल (J) है।
6. कार्य के कुछ उदाहरण लिखिए।
उत्तर ⇒ कार्य के अनेक उदाहरण हमारे दैनिक जीवन में देखने को मिलते हैं। जब किसी गुटके (Block) को धक्का देने पर वह आगे खिसकता है, तब कार्य होता है। किसी ट्रॉली को खींचने पर वह आगे बढ़ती है, इसलिए कार्य किया जाता है। इसी प्रकार किसी पुस्तक को ऊपर उठाने पर भी बल लगाने से विस्थापन होता है, इसलिए कार्य होता है। इन सभी उदाहरणों में बल और विस्थापन दोनों उपस्थित होते हैं।
(i) गुटके को धक्का देना।
(ii) ट्रॉली को खींचना।
(iii) पुस्तक को ऊपर उठाना।
(iv) सभी में बल एवं विस्थापन होता है।
(v) इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य होता है।
7. धनात्मक एवं ऋणात्मक कार्य क्या है?
उत्तर ⇒ जब लगाया गया बल विस्थापन की दिशा में होता है, तब किया गया कार्य धनात्मक कार्य कहलाता है। उदाहरण के लिए, सीढ़ियाँ चढ़ना या खिलौना कार को खींचना। जब बल विस्थापन की विपरीत दिशा में होता है, तब किया गया कार्य ऋणात्मक कार्य कहलाता है। उदाहरण के लिए, चलती हुई कार पर ब्रेक लगाना या ऊपर फेंकी गई गेंद पर गुरुत्वाकर्षण बल का कार्य।
| धनात्मक कार्य | ऋणात्मक कार्य |
|---|---|
| बल और विस्थापन एक ही दिशा में होते हैं। | बल और विस्थापन विपरीत दिशा में होते हैं। |
| कार्य का मान धनात्मक होता है। | कार्य का मान ऋणात्मक होता है। |
| उदाहरण: सीढ़ियाँ चढ़ना। | उदाहरण: ब्रेक लगाना। |
(i) बल समान दिशा में हो तो धनात्मक कार्य होता है।
(ii) बल विपरीत दिशा में हो तो ऋणात्मक कार्य होता है।
(iii) सीढ़ियाँ चढ़ना धनात्मक कार्य है।
(iv) ब्रेक लगाना ऋणात्मक कार्य है।
(v) गुरुत्वाकर्षण कई स्थितियों में ऋणात्मक कार्य करता है।
8. ऊर्जा (Energy) क्या है?
उत्तर ⇒ किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा (Energy) कहते हैं। यदि किसी वस्तु में कार्य करने की क्षमता है, तो उसमें ऊर्जा विद्यमान होती है। ऊर्जा अनेक रूपों में पाई जाती है, जैसे गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा तथा प्रकाश ऊर्जा। कार्य करने पर ऊर्जा का एक रूप दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकता है। ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है।
(i) ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है।
(ii) ऊर्जा अनेक रूपों में पाई जाती है।
(iii) कार्य करने के लिए ऊर्जा आवश्यक है।
(iv) इसका SI मात्रक जूल है।
(v) ऊर्जा का रूपांतरण संभव है।
9. ऊर्जा का मात्रक एवं कार्य से उसका संबंध लिखिए।
उत्तर ⇒ ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है, जो कार्य का भी SI मात्रक है। 1 जूल वह ऊर्जा है, जो 1 जूल कार्य करने के लिए आवश्यक होती है। बड़े मानों के लिए किलोजूल (kJ) का उपयोग किया जाता है, जहाँ 1 kJ = 1000 J होता है। जब कोई वस्तु कार्य करती है, तो उसकी ऊर्जा कम हो जाती है तथा जिस वस्तु पर कार्य किया जाता है, उसकी ऊर्जा बढ़ जाती है। इस प्रकार कार्य के दौरान ऊर्जा का स्थानांतरण होता है।
(i) ऊर्जा का SI मात्रक जूल है।
(ii) कार्य और ऊर्जा का मात्रक समान है।
(iii) 1 kJ = 1000 J होता है।
(iv) कार्य करने वाली वस्तु की ऊर्जा घटती है।
(v) कार्य के दौरान ऊर्जा स्थानांतरित होती है।
10. ऊर्जा के विभिन्न रूप लिखिए।
उत्तर ⇒ प्रकृति में ऊर्जा अनेक रूपों में पाई जाती है। परिस्थितियों के अनुसार ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती है। ऊर्जा के प्रमुख रूप हैं— स्थितिज ऊर्जा, गतिज ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा तथा प्रकाश ऊर्जा। इन सभी रूपों का उपयोग हमारे दैनिक जीवन, उद्योगों तथा वैज्ञानिक उपकरणों में किया जाता है।
(i) स्थितिज ऊर्जा।
(ii) गतिज ऊर्जा।
(iii) ऊष्मीय ऊर्जा।
(iv) रासायनिक एवं विद्युत ऊर्जा।
(v) प्रकाश ऊर्जा।
11. गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) क्या है?
उत्तर ⇒ किसी गतिमान वस्तु में उसकी गति के कारण जो ऊर्जा होती है, उसे गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) कहते हैं। यदि कोई वस्तु स्थिर है, तो उसमें गतिज ऊर्जा नहीं होती। वस्तु की गति जितनी अधिक होगी, उसकी गतिज ऊर्जा भी उतनी ही अधिक होगी। गतिज ऊर्जा का उपयोग वस्तुएँ कार्य करने में करती हैं। उदाहरण के लिए, चलती हुई कार, बहता हुआ पानी, उड़ता हुआ हवाई जहाज़ तथा दौड़ता हुआ खिलाड़ी सभी में गतिज ऊर्जा होती है। गतिज ऊर्जा वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग दोनों पर निर्भर करती है।
(i) गतिमान वस्तु में गतिज ऊर्जा होती है।
(ii) यह गति के कारण उत्पन्न होती है।
(iii) स्थिर वस्तु में गतिज ऊर्जा नहीं होती।
(iv) अधिक वेग पर गतिज ऊर्जा अधिक होती है।
(v) चलती हुई कार इसका उदाहरण है।
12. गतिज ऊर्जा के उदाहरण लिखिए।
उत्तर ⇒ हमारे दैनिक जीवन में गतिज ऊर्जा के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। ऊँचाई से गिरता हुआ नारियल, सड़क पर चलती हुई कार, लुढ़कता हुआ पत्थर, उड़ता हुआ हवाई जहाज़, बहता हुआ पानी, बहती हुई हवा तथा दौड़ता हुआ खिलाड़ी सभी गतिज ऊर्जा के उदाहरण हैं। इन सभी वस्तुओं में गति होने के कारण कार्य करने की क्षमता होती है। इसलिए इन्हें गतिज ऊर्जा प्राप्त होती है।
(i) गिरता हुआ नारियल।
(ii) गतिशील कार।
(iii) उड़ता हुआ हवाई जहाज़।
(iv) बहता हुआ पानी।
(v) दौड़ता हुआ खिलाड़ी।
13. स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) क्या है?
उत्तर ⇒ किसी वस्तु में उसकी स्थिति या विन्यास के कारण संचित ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) कहते हैं। जब किसी वस्तु को किसी विशेष स्थान पर रखा जाता है या उसमें कोई परिवर्तन किया जाता है, तो उसमें स्थितिज ऊर्जा संचित हो जाती है। यह ऊर्जा आवश्यकता पड़ने पर गतिज ऊर्जा में परिवर्तित होकर कार्य करती है। उदाहरण के लिए, खिंचा हुआ धनुष तथा कसी हुई स्प्रिंग में स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है।
(i) स्थिति के कारण उत्पन्न ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा है।
(ii) यह वस्तु में संचित रहती है।
(iii) यह कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है।
(iv) यह गतिज ऊर्जा में बदल सकती है।
(v) खिंचा हुआ धनुष इसका उदाहरण है।
14. स्थितिज ऊर्जा के उदाहरण लिखिए।
उत्तर ⇒ स्थितिज ऊर्जा के अनेक उदाहरण हमारे आसपास देखने को मिलते हैं। कसी हुई स्प्रिंग में ऊर्जा संचित रहती है, जो खुलने पर खिलौना कार को चलाती है। इसी प्रकार धनुष की खींची हुई डोरी में स्थितिज ऊर्जा संचित होती है, जो तीर छोड़ने पर गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। ऊँचाई पर रखी हुई वस्तुओं में भी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा होती है।
(i) कसी हुई स्प्रिंग।
(ii) धनुष की तनित डोरी।
(iii) ऊँचाई पर रखा पत्थर।
(iv) जलाशय में संग्रहित जल।
(v) सभी में ऊर्जा संचित रहती है।
15. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा क्या है?
उत्तर ⇒ किसी वस्तु को पृथ्वी की सतह से ऊपर उठाने पर उसमें जो ऊर्जा संचित होती है, उसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा वस्तु की ऊँचाई के कारण उत्पन्न होती है। किसी वस्तु को जितनी अधिक ऊँचाई तक उठाया जाएगा, उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी। यह ऊर्जा वस्तु के गिरने पर गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।
सूत्र :
Ep = mgh
जहाँ—
- Ep = स्थितिज ऊर्जा
- m = द्रव्यमान
- g = गुरुत्वीय त्वरण
- h = ऊँचाई
(i) यह ऊँचाई के कारण उत्पन्न होती है।
(ii) इसका सूत्र Ep = mgh है।
(iii) ऊँचाई बढ़ने पर ऊर्जा बढ़ती है।
(iv) गिरने पर यह गतिज ऊर्जा बन जाती है।
(v) यह गुरुत्वाकर्षण से संबंधित है।
16. स्थितिज ऊर्जा एवं गतिज ऊर्जा में अंतर लिखिए।
उत्तर ⇒ स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा दोनों ऊर्जा के महत्वपूर्ण रूप हैं, परंतु दोनों की उत्पत्ति अलग-अलग कारणों से होती है। स्थितिज ऊर्जा वस्तु की स्थिति पर निर्भर करती है, जबकि गतिज ऊर्जा वस्तु की गति पर निर्भर करती है।
| स्थितिज ऊर्जा | गतिज ऊर्जा |
|---|---|
| स्थिति पर निर्भर करती है। | गति पर निर्भर करती है। |
| वस्तु के स्थिर रहने पर भी हो सकती है। | केवल गतिमान वस्तु में होती है। |
| mgh से ज्ञात की जाती है। | गति के कारण उत्पन्न होती है। |
| संचित ऊर्जा होती है। | कार्य करने वाली ऊर्जा होती है। |
| ऊँचाई इसका कारण है। | वेग इसका कारण है। |
(i) स्थितिज ऊर्जा स्थिति पर निर्भर करती है।
(ii) गतिज ऊर्जा गति पर निर्भर करती है।
(iii) स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है।
(iv) गतिज ऊर्जा गतिमान वस्तु में होती है।
(v) दोनों एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकती हैं।
17. ऊर्जा रूपांतरण (Energy Transformation) क्या है?
उत्तर ⇒ जब ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है, तो इस प्रक्रिया को ऊर्जा रूपांतरण कहते हैं। ऊर्जा का रूप बदल सकता है, लेकिन कुल ऊर्जा का मान अपरिवर्तित रहता है। उदाहरण के लिए, विद्युत ऊर्जा मोटर में यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है तथा बैटरी में रासायनिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होती है। प्रकृति में ऊर्जा रूपांतरण निरंतर होता रहता है।
(i) ऊर्जा का एक रूप दूसरे रूप में बदलता है।
(ii) कुल ऊर्जा अपरिवर्तित रहती है।
(iii) यह प्रकृति में निरंतर होता है।
(iv) विद्युत मोटर इसका उदाहरण है।
(v) बैटरी भी ऊर्जा रूपांतरण करती है।
18. ऊर्जा रूपांतरण के मुख्य उदाहरण लिखिए।
उत्तर ⇒ हमारे दैनिक जीवन में ऊर्जा रूपांतरण के अनेक उदाहरण मिलते हैं। विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है। बैटरी रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। विद्युत बल्ब विद्युत ऊर्जा को प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा में बदलता है तथा भाप इंजन ऊष्मीय ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। ये सभी ऊर्जा रूपांतरण के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
(i) विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा।
(ii) रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा।
(iii) विद्युत ऊर्जा → प्रकाश ऊर्जा।
(iv) विद्युत ऊर्जा → ऊष्मीय ऊर्जा।
(v) ऊष्मीय ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा।
19. ऊर्जा संरक्षण का नियम लिखिए।
उत्तर ⇒ ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार, ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। किसी भी ऊर्जा रूपांतरण के पहले तथा बाद में कुल ऊर्जा का मान समान रहता है। यह नियम सभी भौतिक प्रक्रियाओं एवं ऊर्जा रूपांतरणों पर लागू होता है।
(i) ऊर्जा उत्पन्न नहीं की जा सकती।
(ii) ऊर्जा नष्ट नहीं की जा सकती।
(iii) ऊर्जा केवल रूप बदलती है।
(iv) कुल ऊर्जा सदैव स्थिर रहती है।
(v) यह नियम सार्वभौमिक है।
20. ऊर्जा संरक्षण के नियम का सत्यापन लिखिए।
उत्तर ⇒ जब कोई वस्तु ऊँचाई से नीचे गिरती है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा धीरे-धीरे घटती जाती है तथा गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है। गिरने के प्रत्येक क्षण में दोनों ऊर्जाओं का योग समान रहता है। इसलिए कुल ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसे निम्न सूत्र से व्यक्त किया जाता है—
mgh + ½mv² = अचर
इससे सिद्ध होता है कि ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है, परंतु उसकी कुल मात्रा अपरिवर्तित रहती है।
(i) गिरने पर स्थितिज ऊर्जा घटती है।
(ii) गतिज ऊर्जा बढ़ती है।
(iii) कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
(iv) सूत्र: mgh + ½mv² = अचर।
(v) यही ऊर्जा संरक्षण का प्रमाण है।
21. शक्ति (Power) क्या है?
उत्तर ⇒ किसी कार्य को करने की दर (Rate) या ऊर्जा रूपांतरण की दर को शक्ति (Power) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति या मशीन जितनी कम समय में अधिक कार्य करती है, उसकी शक्ति उतनी अधिक होती है। समान कार्य को यदि दो व्यक्ति अलग-अलग समय में पूरा करें, तो जो कम समय लेगा उसकी शक्ति अधिक होगी। शक्ति कार्य की गति को दर्शाती है, न कि कार्य की मात्रा को। शक्ति का उपयोग मशीनों, मोटरों तथा विद्युत उपकरणों की क्षमता बताने के लिए किया जाता है।
(i) शक्ति कार्य करने की दर है।
(ii) यह ऊर्जा रूपांतरण की दर भी है।
(iii) कम समय में अधिक कार्य करने पर शक्ति अधिक होती है।
(iv) शक्ति कार्य की गति को दर्शाती है।
(v) इसका उपयोग मशीनों की क्षमता बताने में होता है।
22. शक्ति का सूत्र एवं SI मात्रक लिखिए।
उत्तर ⇒ शक्ति कार्य तथा समय पर निर्भर करती है। यदि किसी वस्तु द्वारा किया गया कार्य W तथा उसे करने में लगा समय t हो, तो शक्ति का सूत्र निम्नलिखित है—
सूत्र :
P = W / t
जहाँ—
- P = शक्ति
- W = कार्य
- t = समय
शक्ति का SI मात्रक वाट (Watt) है। यह मात्रक प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स वाट के सम्मान में रखा गया है। 1 वाट = 1 जूल/सेकंड (1 W = 1 J/s) अर्थात यदि 1 सेकंड में 1 जूल कार्य किया जाए, तो शक्ति 1 वाट होगी।
(i) शक्ति का सूत्र P = W/t है।
(ii) SI मात्रक वाट (W) है।
(iii) 1 W = 1 J/s होता है।
(iv) यह जेम्स वाट के नाम पर रखा गया है।
(v) शक्ति समय पर निर्भर करती है।
23. शक्ति का बड़ा मात्रक लिखिए।
उत्तर ⇒ शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है, परंतु बड़े विद्युत उपकरणों एवं मशीनों की शक्ति व्यक्त करने के लिए किलोवाट (kW) का प्रयोग किया जाता है। एक किलोवाट, एक हजार वाट के बराबर होता है। बड़े उद्योगों, विद्युत मोटरों, जनरेटरों तथा घरेलू उपकरणों की शक्ति सामान्यतः किलोवाट में व्यक्त की जाती है।
संबंध :
1 kW = 1000 W
(i) बड़ा मात्रक किलोवाट (kW) है।
(ii) 1 kW = 1000 W होता है।
(iii) बड़े उपकरणों में इसका प्रयोग होता है।
(iv) विद्युत मोटरों की शक्ति kW में लिखी जाती है।
(v) वाट शक्ति का SI मात्रक है।
24. औसत शक्ति (Average Power) क्या है?
उत्तर ⇒ जब किसी व्यक्ति, मशीन या उपकरण की शक्ति समय के साथ बदलती रहती है, तब पूरे समय में किए गए कुल कार्य या कुल उपयोग की गई ऊर्जा के आधार पर जो शक्ति प्राप्त होती है, उसे औसत शक्ति (Average Power) कहते हैं। यह किसी कार्य को पूरा करने में लगी कुल ऊर्जा तथा कुल समय के अनुपात से ज्ञात की जाती है। औसत शक्ति का उपयोग उन परिस्थितियों में किया जाता है जहाँ शक्ति समान नहीं रहती।
सूत्र :
औसत शक्ति = कुल कार्य / कुल समय
या
औसत शक्ति = कुल ऊर्जा / कुल समय
(i) यह बदलती हुई शक्ति का औसत मान है।
(ii) कुल कार्य पर आधारित होती है।
(iii) कुल समय पर निर्भर करती है।
(iv) कुल ऊर्जा से भी ज्ञात की जाती है।
(v) इसका उपयोग व्यावहारिक गणनाओं में होता है।
25. कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति में संबंध लिखिए।
उत्तर ⇒ कार्य, ऊर्जा तथा शक्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए भौतिक राशियाँ हैं। कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। यदि किसी वस्तु में ऊर्जा है, तो वह कार्य कर सकती है। जितनी अधिक ऊर्जा होगी, उतना अधिक कार्य किया जा सकेगा। इसी प्रकार समान कार्य को कम समय में करने पर शक्ति अधिक होगी।
| कार्य | ऊर्जा | शक्ति |
|---|---|---|
| बल द्वारा किया गया कार्य | कार्य करने की क्षमता | कार्य करने की दर |
| मात्रक: जूल | मात्रक: जूल | मात्रक: वाट |
| W = Fs | ऊर्जा कार्य करने में खर्च होती है | P = W/t |
(i) कार्य के लिए ऊर्जा आवश्यक है।
(ii) शक्ति कार्य करने की दर है।
(iii) कार्य एवं ऊर्जा का मात्रक जूल है।
(iv) शक्ति का मात्रक वाट है।
(v) तीनों राशियाँ परस्पर संबंधित हैं।
26. कार्य कब शून्य होता है?
उत्तर ⇒ वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य तभी होता है जब वस्तु पर बल लगाने से उसमें विस्थापन हो। यदि बल लगाने के बाद भी वस्तु अपनी जगह से नहीं हिलती या विस्थापन शून्य होता है, तो कार्य भी शून्य होता है। उदाहरण के लिए, भारी चट्टान को बहुत प्रयास करने पर भी यदि वह नहीं हिलती, तो वैज्ञानिक दृष्टि से कार्य नहीं हुआ। इसी प्रकार सिर पर बोझ रखकर स्थिर खड़े रहने पर भी कार्य शून्य होता है।
(i) विस्थापन शून्य होने पर कार्य शून्य होता है।
(ii) केवल बल लगाने से कार्य नहीं होता।
(iii) चट्टान को धक्का देना इसका उदाहरण है।
(iv) स्थिर खड़े रहने पर भी कार्य शून्य है।
(v) बल एवं विस्थापन दोनों आवश्यक हैं।
27. ऊर्जा के संरक्षण का दैनिक जीवन में महत्व लिखिए।
उत्तर ⇒ ऊर्जा संरक्षण का नियम हमें यह समझाता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, बल्कि केवल अपना रूप बदलती है। दैनिक जीवन में बिजली, ईंधन तथा अन्य ऊर्जा स्रोतों का उचित उपयोग करना आवश्यक है। ऊर्जा का संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों की बचत करता है तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने में भी सहायता करता है। इसलिए ऊर्जा का सोच-समझकर उपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
(i) ऊर्जा नष्ट नहीं होती।
(ii) केवल रूप बदलती है।
(iii) ऊर्जा की बचत आवश्यक है।
(iv) प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है।
(v) पर्यावरण संरक्षण में सहायता मिलती है।
28. स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में कैसे परिवर्तित होती है?
उत्तर ⇒ जब किसी वस्तु को ऊँचाई पर रखा जाता है, तो उसमें स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है। जैसे ही वह वस्तु नीचे गिरती है, उसकी ऊँचाई कम होती जाती है और स्थितिज ऊर्जा घटती जाती है। इसके साथ ही वस्तु का वेग बढ़ता है तथा गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है। भूमि पर पहुँचने तक अधिकांश स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में कुल ऊर्जा का मान स्थिर रहता है।
(i) ऊँचाई पर स्थितिज ऊर्जा होती है।
(ii) गिरने पर स्थितिज ऊर्जा घटती है।
(iii) गतिज ऊर्जा बढ़ती है।
(iv) कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
(v) यह ऊर्जा संरक्षण का उदाहरण है।
29. कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति के SI मात्रक लिखिए।
उत्तर ⇒ कार्य, ऊर्जा तथा शक्ति भौतिकी की महत्वपूर्ण राशियाँ हैं और इनके अलग-अलग SI मात्रक होते हैं। कार्य तथा ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है, जबकि शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है। इन मात्रकों का उपयोग वैज्ञानिक गणनाओं तथा व्यावहारिक जीवन में व्यापक रूप से किया जाता है।
| राशि | SI मात्रक | प्रतीक |
|---|---|---|
| कार्य | जूल | J |
| ऊर्जा | जूल | J |
| शक्ति | वाट | W |
(i) कार्य का मात्रक जूल है।
(ii) ऊर्जा का मात्रक जूल है।
(iii) शक्ति का मात्रक वाट है।
(iv) जूल कार्य एवं ऊर्जा दोनों का SI मात्रक है।
(v) वाट शक्ति का SI मात्रक है।
30. अध्याय का निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर ⇒ इस अध्याय में हमने कार्य, ऊर्जा तथा शक्ति की मूल अवधारणाओं का अध्ययन किया। साथ ही कार्य की शर्तें, कार्य का सूत्र, धनात्मक एवं ऋणात्मक कार्य, ऊर्जा के विभिन्न रूप, गतिज एवं स्थितिज ऊर्जा, गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा, ऊर्जा रूपांतरण, ऊर्जा संरक्षण का नियम तथा शक्ति एवं औसत शक्ति के बारे में जाना। यह अध्याय हमें बताता है कि कार्य, ऊर्जा और शक्ति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं तथा इनके सिद्धांत दैनिक जीवन एवं विज्ञान दोनों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
(i) कार्य के लिए बल एवं विस्थापन आवश्यक हैं।
(ii) ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है।
(iii) शक्ति कार्य करने की दर है।
(iv) ऊर्जा का संरक्षण होता है।
(v) कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति परस्पर संबंधित राशियाँ हैं।