Class 9 History Revision Notes
वन्य-समाज और उपनिवेशवाद
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Chapter Overview
| Class | 9 |
| Subject | History |
| Chapter Name | वन्य-समाज और उपनिवेशवाद |
| Resource Type | Revision Notes |
| Syllabus | NCERT |
| Suitable For | CBSE, JAC and other state boards |
वन्य-समाज और उपनिवेशवाद Revision Notes
1. हमारे दैनिक जीवन में जंगलों का क्या महत्व है?
उत्तर ⇒ जंगल हमारे जीवन का आधार हैं। हमारे दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएँ सीधे या परोक्ष रूप से जंगलों से प्राप्त होती हैं। कागज़, लकड़ी, बाँस, गोंद, शहद, रबड़, चाय, कॉफी, जड़ी-बूटियाँ, तेंदू पत्ता, फल-फूल तथा जलावन की लकड़ी जैसी अनेक वस्तुएँ जंगलों से मिलती हैं। साल के बीजों से तेल बनाया जाता है तथा टैनिन का उपयोग चमड़ा तैयार करने में किया जाता है। जंगल पर्यावरण को संतुलित रखने, वर्षा कराने, वन्य जीवों को आश्रय देने तथा मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए अमूल्य धरोहर भी हैं।
(i) जंगल दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
(ii) लकड़ी, कागज़ और जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं।
(iii) पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं।
(iv) वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास हैं।
(v) मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
2. वन-विनाश (Deforestation) क्या है? इसके प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒ वनों के लगातार नष्ट होने या उनकी संख्या में कमी आने की प्रक्रिया को वन-विनाश कहा जाता है। औपनिवेशिक काल में वन-विनाश की गति बहुत तेज़ हो गई। जंगलों को कृषि भूमि में बदलने, रेलवे के लिए स्लीपर तैयार करने तथा चाय, कॉफी और रबड़ के बागान लगाने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई। अंग्रेज़ी सरकार जंगलों को अनुपयोगी भूमि मानती थी और उनसे अधिक राजस्व प्राप्त करना चाहती थी। औद्योगीकरण तथा बढ़ती जनसंख्या ने भी जंगलों पर दबाव बढ़ाया। परिणामस्वरूप प्राकृतिक वन तेजी से समाप्त होने लगे और जैव-विविधता को भारी नुकसान पहुँचा।
(i) वनों का समाप्त होना वन-विनाश कहलाता है।
(ii) कृषि विस्तार एक प्रमुख कारण था।
(iii) रेलवे निर्माण के लिए पेड़ काटे गए।
(iv) बागानों के लिए जंगल साफ़ किए गए।
(v) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
3. औपनिवेशिक काल में कृषि विस्तार के कारण वनों का विनाश कैसे हुआ?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेज़ों ने कृषि क्षेत्र का विस्तार करने पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि जंगलों को काटकर खेती योग्य भूमि बनाई जाए ताकि सरकार को अधिक भूमि-राजस्व प्राप्त हो सके। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की माँग भी बढ़ रही थी। इसके अतिरिक्त जूट, कपास, गन्ना, गेहूँ जैसी व्यावसायिक फसलों की खेती को बढ़ावा दिया गया ताकि यूरोप के उद्योगों को कच्चा माल मिल सके। 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य भूमि में लाखों हेक्टेयर की वृद्धि हुई। इसके लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई, जिससे प्राकृतिक वन क्षेत्र लगातार घटता गया।
(i) खेती योग्य भूमि बढ़ाई गई।
(ii) भूमि-राजस्व बढ़ाना उद्देश्य था।
(iii) व्यावसायिक फसलों को बढ़ावा मिला।
(iv) जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई हुई।
(v) प्राकृतिक वन क्षेत्र कम हुआ।
4. रेलवे के विस्तार से वनों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में भारत में रेलवे का तेजी से विस्तार हुआ। रेलवे लाइनों के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता होती थी। पटरियों के नीचे लगाए जाने वाले स्लीपर लकड़ी से बनाए जाते थे। एक मील रेल लाइन के लिए लगभग 1760 से 2000 स्लीपरों की आवश्यकता पड़ती थी। इसलिए लाखों पेड़ काटे गए। केवल मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रतिवर्ष हजारों पेड़ रेलवे के लिए काटे जाते थे। रेलवे लाइनों के आसपास के जंगल तेजी से समाप्त हो गए। इस प्रकार रेलवे के विकास ने भारत में वन-विनाश को बहुत बढ़ावा दिया।
(i) रेलवे के लिए लकड़ी की भारी माँग हुई।
(ii) स्लीपर बनाने हेतु पेड़ काटे गए।
(iii) लाखों पेड़ नष्ट हुए।
(iv) जंगलों का क्षेत्र घटा।
(v) वन-विनाश तेज़ हुआ।
5. बागानों (Plantations) के कारण वनों का विनाश कैसे हुआ?
उत्तर ⇒ यूरोप में चाय, कॉफी और रबड़ की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए अंग्रेज़ों ने भारत के प्राकृतिक जंगलों को काटकर बड़े-बड़े बागान स्थापित किए। औपनिवेशिक सरकार ने जंगलों को अपने अधिकार में लेकर यूरोपीय बागान मालिकों को सस्ती दरों पर भूमि उपलब्ध कराई। प्राकृतिक वनों को साफ़ कर वहाँ केवल एक ही प्रकार की फसल उगाई जाने लगी। इससे जंगलों की जैव-विविधता नष्ट हुई और अनेक वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त हो गया। बागानों के विस्तार ने वनों के संरक्षण की बजाय उनके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा दिया।
(i) प्राकृतिक जंगल काटे गए।
(ii) चाय, कॉफी और रबड़ के बागान लगाए गए।
(iii) जैव-विविधता नष्ट हुई।
(iv) वन्य जीव प्रभावित हुए।
(v) व्यावसायिक खेती को बढ़ावा मिला।
6. डायट्रिच ब्रैंडिस का परिचय एवं योगदान लिखिए।
उत्तर ⇒ डायट्रिच ब्रैंडिस एक जर्मन वन विशेषज्ञ थे जिन्हें अंग्रेज़ सरकार ने भारत बुलाया। उन्हें भारत का पहला वन महानिदेशक (Inspector General of Forests) नियुक्त किया गया। उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से जंगलों के प्रबंधन पर बल दिया। उनके प्रयासों से भारतीय वन सेवा की स्थापना हुई तथा वनों के संरक्षण और उपयोग के लिए कानूनी नियम बनाए गए। उन्होंने पेड़ों की कटाई, चराई तथा वनों के उपयोग पर नियंत्रण लगाने की व्यवस्था की। यद्यपि उनके द्वारा शुरू की गई वैज्ञानिक वानिकी की बाद में आलोचना भी हुई, फिर भी भारतीय वन प्रशासन के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
(i) जर्मन वन विशेषज्ञ थे।
(ii) पहले वन महानिदेशक बने।
(iii) वैज्ञानिक वानिकी को बढ़ावा दिया।
(iv) भारतीय वन सेवा की स्थापना हुई।
(v) वन प्रबंधन के नियम बनाए गए।
7. भारतीय वन अधिनियम (Forest Act) का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ों ने भारत में जंगलों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए वन अधिनियम बनाया। पहला भारतीय वन अधिनियम 1865 में लागू किया गया तथा बाद में 1878 और 1927 में इसमें संशोधन किए गए। 1878 के अधिनियम के अनुसार जंगलों को आरक्षित वन, सुरक्षित वन और ग्रामीण वन तीन भागों में बाँटा गया। आरक्षित वनों में ग्रामीणों के प्रवेश और वन उत्पादों के उपयोग पर कड़ी रोक लगा दी गई। सुरक्षित वनों में सीमित अधिकार दिए गए जबकि ग्रामीण वनों का उपयोग स्थानीय लोग अपनी आवश्यकताओं के लिए कर सकते थे। इन कानूनों से सरकार का नियंत्रण मजबूत हुआ लेकिन ग्रामीणों की कठिनाइयाँ बढ़ गईं।
(i) पहला वन अधिनियम 1865 में बना।
(ii) 1878 और 1927 में संशोधन हुए।
(iii) जंगल तीन श्रेणियों में बाँटे गए।
(iv) सरकार का नियंत्रण बढ़ा।
(v) ग्रामीणों के अधिकार सीमित हुए।
8. आरक्षित वन, सुरक्षित वन और ग्रामीण वन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ 1878 के वन अधिनियम के अंतर्गत जंगलों को तीन भागों में विभाजित किया गया। आरक्षित वन सबसे महत्वपूर्ण माने जाते थे, जहाँ स्थानीय लोगों को लकड़ी, चारा या अन्य वन उत्पाद लेने की अनुमति नहीं थी। सुरक्षित वन में सरकार का नियंत्रण रहता था, लेकिन ग्रामीणों को कुछ सीमित अधिकार दिए जाते थे। ग्रामीण वन स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्धारित किए गए थे, जहाँ ईंधन, चराई तथा अन्य घरेलू कार्यों के लिए वन उत्पादों का उपयोग किया जा सकता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य जंगलों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना था।
| वन का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| आरक्षित वन | प्रवेश और उपयोग पर कड़ी रोक |
| सुरक्षित वन | सीमित अधिकार |
| ग्रामीण वन | स्थानीय उपयोग की अनुमति |
(i) तीन प्रकार के वन बनाए गए।
(ii) आरक्षित वन पर पूर्ण नियंत्रण था।
(iii) सुरक्षित वन में सीमित अधिकार थे।
(iv) ग्रामीण वन स्थानीय उपयोग हेतु थे।
(v) सरकार का नियंत्रण बढ़ा।
9. वैज्ञानिक वानिकी (Scientific Forestry) क्या है?
उत्तर ⇒ वैज्ञानिक वानिकी वह पद्धति है जिसमें पुराने पेड़ों को काटकर उनकी जगह योजनाबद्ध ढंग से नए पेड़ लगाए जाते हैं ताकि भविष्य में फिर से लकड़ी प्राप्त की जा सके। वन विभाग पहले सर्वेक्षण करता था और यह तय करता था कि किस क्षेत्र के पेड़ काटे जाएँगे। इसके बाद वहाँ एक ही प्रकार के पेड़ लगाए जाते थे। इस प्रणाली में प्राकृतिक मिश्रित वनों को हटाकर कृत्रिम बागान विकसित किए गए। बाद में पर्यावरणविदों ने इसकी आलोचना की क्योंकि इससे जंगलों की जैव-विविधता कम हो गई और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ।
(i) योजनाबद्ध ढंग से पेड़ काटे जाते थे।
(ii) नए पेड़ लगाए जाते थे।
(iii) एक ही प्रकार के पेड़ लगाए जाते थे।
(iv) प्राकृतिक वन प्रभावित हुए।
(v) जैव-विविधता कम हुई।
10. वैज्ञानिक वानिकी की प्रमुख विशेषताएँ एवं आलोचनाएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ वैज्ञानिक वानिकी का उद्देश्य जंगलों से नियमित रूप से लकड़ी प्राप्त करना था। इसके अंतर्गत प्राकृतिक वनों को काटकर एक ही प्रजाति के पेड़ों के बागान लगाए गए। वन विभाग यह निर्धारित करता था कि हर वर्ष कितने क्षेत्र में कटाई होगी और वहाँ पुनः वृक्षारोपण किया जाएगा। इससे व्यावसायिक लकड़ी का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन प्राकृतिक वन और उनकी जैव-विविधता नष्ट हो गई। पर्यावरण विशेषज्ञों का मत है कि यह वास्तविक संरक्षण नहीं बल्कि जंगलों के आर्थिक दोहन की नीति थी। इसलिए आज वैज्ञानिक वानिकी की कई नीतियों की आलोचना की जाती है।
(i) लकड़ी उत्पादन पर बल दिया गया।
(ii) प्राकृतिक वन काटे गए।
(iii) एक ही प्रजाति के पेड़ लगाए गए।
(iv) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
(v) पर्यावरणविदों ने इसकी आलोचना की।
11. एक अच्छे जंगल के बारे में वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के विचारों में क्या अंतर था?
उत्तर ⇒ वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों की दृष्टि में “अच्छे जंगल” की परिभाषा अलग-अलग थी। अंग्रेज़ी वन विभाग ऐसे जंगल चाहता था जहाँ सागौन और साल जैसे सीधे तथा मजबूत पेड़ अधिक हों ताकि रेलवे, जहाज़ और उद्योगों के लिए लकड़ी मिल सके। इसके विपरीत ग्रामीण ऐसे जंगल चाहते थे जहाँ विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, घास, लताएँ, फल, फूल और औषधीय पौधे उपलब्ध हों। उनके लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि भोजन, चारा, ईंधन, दवा और आजीविका का आधार था। इसलिए वन विभाग व्यावसायिक उपयोग को महत्व देता था, जबकि ग्रामीण जैव-विविधता और दैनिक आवश्यकताओं को अधिक महत्व देते थे।
| वन विभाग | स्थानीय ग्रामीण |
|---|---|
| व्यावसायिक लकड़ी पर बल | दैनिक आवश्यकताओं पर बल |
| सीधे पेड़ पसंद | विविध पेड़-पौधे पसंद |
| सागौन व साल को बढ़ावा | जैव-विविधता को महत्व |
(i) दोनों की सोच अलग थी।
(ii) वन विभाग लकड़ी चाहता था।
(iii) ग्रामीण विविध वन चाहते थे।
(iv) जैव-विविधता को महत्व दिया गया।
(v) जंगल जीवन का आधार था।
12. स्थानीय ग्रामीणों के जीवन में जंगलों का क्या महत्व था?
उत्तर ⇒ स्थानीय ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह जंगलों पर निर्भर था। उन्हें जंगलों से भोजन के लिए फल, कंद-मूल और शहद प्राप्त होते थे। जड़ी-बूटियों का उपयोग दवाइयों के रूप में किया जाता था। लकड़ी से हल, कृषि उपकरण और घर बनाए जाते थे, जबकि बाँस से टोकरी और बाड़ तैयार की जाती थी। पत्तों से दोने-पत्तल, लौकी से पानी रखने के बर्तन तथा लताओं से रस्सियाँ बनाई जाती थीं। महुए के तेल का उपयोग खाना बनाने और रोशनी के लिए किया जाता था। इस प्रकार जंगल ग्रामीणों के लिए केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि उनके जीवन और संस्कृति का आधार थे।
(i) भोजन जंगल से मिलता था।
(ii) जड़ी-बूटियाँ दवा थीं।
(iii) कृषि उपकरण बनाए जाते थे।
(iv) घरेलू वस्तुएँ जंगल से मिलती थीं।
(v) जंगल जीवन का आधार था।
13. वन अधिनियम का स्थानीय लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ वन अधिनियम लागू होने के बाद स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकार सीमित कर दिए गए। जंगल से लकड़ी काटना, पशुओं को चराना, फल, कंद-मूल और जलावन की लकड़ी एकत्र करना गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। लोगों को अपनी आवश्यकताओं के लिए भी चोरी-छिपे जंगल में जाना पड़ता था। पकड़े जाने पर उन्हें जुर्माना देना पड़ता या अधिकारियों को घूस देनी पड़ती थी। विशेष रूप से महिलाओं को जलावन की लकड़ी लाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस प्रकार वन अधिनियम ने ग्रामीणों के जीवन को अत्यंत कठिन बना दिया।
(i) पारंपरिक अधिकार समाप्त हुए।
(ii) जंगल से लकड़ी लेना अपराध बना।
(iii) लोगों को कठिनाइयाँ हुईं।
(iv) महिलाओं पर अधिक प्रभाव पड़ा।
(v) अधिकारियों का उत्पीड़न बढ़ा।
14. झूम खेती (Shifting Cultivation) क्या है?
उत्तर ⇒ झूम खेती एक पारंपरिक कृषि पद्धति है जो एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित थी। इसमें जंगल के एक छोटे भाग को काटकर और जलाकर भूमि तैयार की जाती थी। पहली वर्षा के बाद उस भूमि पर बीज बो दिए जाते थे तथा कुछ वर्षों तक खेती करने के बाद भूमि को छोड़ दिया जाता था ताकि वहाँ फिर से जंगल उग सके। बाद में किसान दूसरे स्थान पर जाकर यही प्रक्रिया अपनाते थे। भारत में इसे झूम, पोडू, बेवर, धया, पेंदा आदि नामों से जाना जाता है।
(i) यह पारंपरिक खेती है।
(ii) जंगल काटकर भूमि तैयार की जाती है।
(iii) कुछ वर्षों बाद भूमि छोड़ दी जाती है।
(iv) दूसरी जगह खेती शुरू होती है।
(v) भारत में इसके कई स्थानीय नाम हैं।
15. झूम खेती की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ झूम खेती में सबसे पहले जंगल के एक छोटे भाग के पेड़ों को काटकर सुखाया जाता था। बाद में उन्हें जलाकर भूमि तैयार की जाती थी। पहली वर्षा होने पर राख मिली भूमि में बीज बो दिए जाते थे। अक्टूबर-नवंबर में फसल काट ली जाती थी। दो या तीन वर्ष खेती करने के बाद उस भूमि को 12 से 18 वर्षों तक खाली छोड़ दिया जाता था ताकि वहाँ प्राकृतिक रूप से जंगल दोबारा विकसित हो सके। इस खेती में ज्वार, बाजरा, मक्का, फलियाँ तथा अन्य मिश्रित फसलें उगाई जाती थीं। यह खेती प्रकृति के संतुलन पर आधारित थी।
(i) पेड़ काटकर जलाए जाते थे।
(ii) राख में बीज बोए जाते थे।
(iii) मिश्रित फसलें उगाई जाती थीं।
(iv) भूमि कुछ वर्षों बाद छोड़ दी जाती थी।
(v) जंगल पुनः विकसित हो जाते थे।
16. अंग्रेजों ने झूम खेती का विरोध क्यों किया?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ वन अधिकारियों का मानना था कि झूम खेती से जंगलों को नुकसान पहुँचता है। उनके अनुसार जंगलों को जलाने से बहुमूल्य पेड़ नष्ट हो जाते थे और रेलवे तथा उद्योगों के लिए उपयोगी लकड़ी उपलब्ध नहीं हो पाती थी। इसके अतिरिक्त घुमंतू किसानों से कर वसूलना भी कठिन था क्योंकि वे एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते थे। इन कारणों से अंग्रेज़ सरकार ने झूम खेती को हानिकारक घोषित कर दिया और उस पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया। इससे अनेक आदिवासी समुदायों की आजीविका प्रभावित हुई।
(i) जंगल जलते थे।
(ii) बहुमूल्य पेड़ नष्ट होते थे।
(iii) कर वसूलना कठिन था।
(iv) अंग्रेज़ों ने प्रतिबंध लगाया।
(v) आदिवासी प्रभावित हुए।
17. झूम खेती पर प्रतिबंध के परिणाम लिखिए।
उत्तर ⇒ झूम खेती पर प्रतिबंध लगाने के बाद अनेक आदिवासी समुदायों को अपने पारंपरिक निवास स्थान छोड़ने पड़े। उनकी आजीविका का प्रमुख साधन समाप्त हो गया और उन्हें अन्य व्यवसाय अपनाने पड़े। कई लोगों को मजदूरी करनी पड़ी तथा कुछ समुदायों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह भी किया। इस नीति से आदिवासी समाज की आर्थिक और सामाजिक स्थिति कमजोर हो गई। उनका जंगलों से सदियों पुराना संबंध टूटने लगा और वे सरकारी नियंत्रण के अधीन हो गए।
(i) लोगों का विस्थापन हुआ।
(ii) आजीविका समाप्त हुई।
(iii) मजदूरी करनी पड़ी।
(iv) विद्रोह हुए।
(v) आदिवासी जीवन प्रभावित हुआ।
18. औपनिवेशिक वन नीतियों का शिकार पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन से पहले वनवासी लोग भोजन और आजीविका के लिए सीमित मात्रा में शिकार करते थे। अंग्रेज़ों ने नए वन कानून बनाकर इस पारंपरिक शिकार को अवैध घोषित कर दिया। यदि कोई व्यक्ति शिकार करते हुए पकड़ा जाता था तो उसे दंड दिया जाता था। दूसरी ओर अंग्रेज़ अधिकारी स्वयं शिकार को मनोरंजन और खेल के रूप में करते थे। इस प्रकार स्थानीय लोगों पर प्रतिबंध लगाया गया जबकि अंग्रेज़ों को खुली छूट मिली। इससे वनवासियों के पारंपरिक अधिकारों का हनन हुआ।
(i) स्थानीय शिकार पर प्रतिबंध लगा।
(ii) शिकार अपराध घोषित हुआ।
(iii) अंग्रेज़ शिकार करते रहे।
(iv) वनवासियों के अधिकार छीने गए।
(v) भेदभावपूर्ण नीति अपनाई गई।
19. अंग्रेजों द्वारा वन्य जीवों के शिकार को क्यों बढ़ावा दिया गया?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ अधिकारियों का मानना था कि बाघ, तेंदुए और भेड़िए जैसे जंगली जानवर किसानों और समाज के लिए खतरा हैं। इसलिए उन्होंने इनके शिकार पर इनाम घोषित कर दिया। अनेक अंग्रेज़ अधिकारी शिकार को खेल और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते थे। 1875 से 1925 के बीच हजारों बाघ, तेंदुए और भेड़िए मार दिए गए। जॉर्ज यूल जैसे अधिकारियों ने सैकड़ों बाघों का शिकार किया। परिणामस्वरूप कई वन्य जीवों की संख्या तेजी से घट गई और कुछ प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गईं।
(i) शिकार पर इनाम दिया गया।
(ii) अंग्रेज़ों ने इसे खेल माना।
(iii) हजारों वन्य जीव मारे गए।
(iv) बाघों की संख्या घटी।
(v) कई प्रजातियाँ संकट में पहुँचीं।
20. औपनिवेशिक वन नीतियों का वन्य जीवों और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक वन नीतियों के कारण जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई तथा वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो गया। अंग्रेज़ों ने बड़े पैमाने पर शिकार को बढ़ावा दिया, जिससे बाघ, तेंदुए और अन्य वन्य जीवों की संख्या तेजी से घट गई। प्राकृतिक जंगलों की जगह एक ही प्रकार के पेड़ों के बागान लगाए गए, जिससे जैव-विविधता प्रभावित हुई। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने लगा और कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के खतरे में आ गईं। इन परिस्थितियों के कारण बाद में वन संरक्षण और वन्य जीवों की रक्षा की आवश्यकता महसूस की गई।
(i) जंगलों की कटाई बढ़ी।
(ii) वन्य जीवों का आवास नष्ट हुआ।
(iii) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
(iv) पर्यावरण असंतुलित हुआ।
(v) संरक्षण की आवश्यकता महसूस हुई।
21. औपनिवेशिक काल में वन उत्पादों के व्यापार में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन से पहले आदिवासी और घुमंतू समुदाय जंगलों से प्राप्त वस्तुओं जैसे खाल, सींग, हाथी-दाँत, बाँस, मसाले, गोंद, राल, रेशे और घास का व्यापार करते थे। अंग्रेज़ों के आने के बाद इस व्यापार पर सरकार का नियंत्रण स्थापित हो गया। ब्रिटिश सरकार ने बड़ी यूरोपीय कंपनियों को वन उत्पादों के व्यापार का एकाधिकार (इजारेदारी) दे दिया। इससे स्थानीय व्यापारियों और आदिवासी समुदायों की आय पर बुरा प्रभाव पड़ा। वे अपने पारंपरिक व्यापार से वंचित होने लगे और आर्थिक रूप से कमजोर हो गए। इस प्रकार वन उत्पादों का व्यापार स्थानीय लोगों के हाथों से निकलकर अंग्रेज़ी कंपनियों के नियंत्रण में चला गया।
(i) पहले स्थानीय लोग व्यापार करते थे।
(ii) अंग्रेज़ों ने व्यापार पर नियंत्रण किया।
(iii) यूरोपीय कंपनियों को एकाधिकार मिला।
(iv) आदिवासियों की आय घटी।
(v) पारंपरिक व्यापार प्रभावित हुआ।
22. औपनिवेशिक वन नीतियों का विभिन्न समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक वन नीतियों से अनेक समुदायों का पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ। चरवाहे, शिकारी और घुमंतू जातियाँ अपने व्यवसाय से वंचित हो गईं क्योंकि शिकार और चराई पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई समुदायों को “अपराधी कबीला” घोषित कर दिया गया और उन्हें सरकार की निगरानी में रहना पड़ा। दूसरी ओर कुछ लोगों ने वन उत्पादों के व्यापार में नए अवसर खोजे, लेकिन वे व्यापारियों पर निर्भर हो गए। अनेक आदिवासियों को चाय बागानों, खदानों और कारखानों में कम मजदूरी पर काम करना पड़ा। इससे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति कमजोर हो गई।
(i) पारंपरिक व्यवसाय समाप्त हुए।
(ii) कुछ समुदाय अपराधी घोषित हुए।
(iii) मजदूरी करने को मजबूर हुए।
(iv) व्यापारियों पर निर्भरता बढ़ी।
(v) सामाजिक स्थिति कमजोर हुई।
23. असम के चाय बागानों में आदिवासी मजदूरों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक काल में असम के चाय बागानों में कार्य करने के लिए संथाल, उराँव, गोंड तथा अन्य आदिवासी समुदायों के लोगों की भर्ती की गई। उन्हें अपने गाँवों से दूर ले जाकर कठिन परिस्थितियों में काम कराया जाता था। उनकी मजदूरी बहुत कम थी तथा कार्य की स्थितियाँ अत्यंत खराब थीं। उन्हें उचित भोजन, स्वास्थ्य सुविधा और आराम नहीं मिलता था। एक बार बागानों में पहुँच जाने के बाद अपने गाँव लौटना भी आसान नहीं था। इस प्रकार बागान मजदूरों का शोषण किया गया और उनका जीवन अत्यंत कठिन हो गया।
(i) आदिवासियों की भर्ती की गई।
(ii) कम मजदूरी दी जाती थी।
(iii) कार्य की स्थिति खराब थी।
(iv) गाँव लौटना कठिन था।
(v) मजदूरों का शोषण हुआ।
24. वन विद्रोहों के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक सरकार की वन नीतियों ने स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकार छीन लिए। जंगलों में प्रवेश, शिकार, चराई तथा वन उत्पादों के संग्रह पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लोगों से बेगार कराई जाती थी तथा करों का बोझ भी बढ़ा दिया गया। अनेक आदिवासियों को अपने घरों और जंगलों से विस्थापित कर दिया गया। इन अत्याचारों के कारण स्थानीय समुदायों में असंतोष फैल गया। परिणामस्वरूप भारत के विभिन्न भागों में संथाल, बिरसा मुंडा, अल्लूरी सीताराम राजू तथा गुंडा धूर जैसे नेताओं के नेतृत्व में अनेक वन विद्रोह हुए।
(i) वन अधिकार छीने गए।
(ii) शिकार और चराई पर रोक लगी।
(iii) बेगार कराई गई।
(iv) विस्थापन हुआ।
(v) अनेक विद्रोह हुए।
25. भारत के प्रमुख वन विद्रोहों एवं उनके नेताओं का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत के विभिन्न भागों में अनेक वन विद्रोह हुए। संथाल परगना में सीधू और कानू ने विद्रोह का नेतृत्व किया। छोटानागपुर क्षेत्र में बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को संगठित किया। आंध्र प्रदेश में अल्लूरी सीताराम राजू ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष किया। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में गुंडा धूर ने वन नीतियों के विरोध में आंदोलन चलाया। इन सभी आंदोलनों का उद्देश्य जंगलों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करना तथा अंग्रेज़ी शासन के अत्याचारों का विरोध करना था।
| क्षेत्र | प्रमुख नेता |
|---|---|
| संथाल परगना | सीधू और कानू |
| छोटानागपुर | बिरसा मुंडा |
| आंध्र प्रदेश | अल्लूरी सीताराम राजू |
| बस्तर | गुंडा धूर |
(i) विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोह हुए।
(ii) स्थानीय नेताओं ने नेतृत्व किया।
(iii) वन अधिकारों की रक्षा की गई।
(iv) अंग्रेज़ी नीतियों का विरोध हुआ।
(v) आदिवासी एकजुट हुए।
26. बस्तर के लोगों का जंगलों के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ बस्तर के आदिवासी जंगलों को अपनी जीवन-रेखा और प्रकृति का उपहार मानते थे। वे भूमि को धरती माँ का स्वरूप मानते थे तथा प्रत्येक कृषि पर्व पर उसकी पूजा करते थे। नदी, पहाड़ और जंगलों को भी पवित्र माना जाता था। प्रत्येक गाँव की अपनी वन सीमा होती थी और दूसरे गाँव से लकड़ी लेने पर शुल्क देना पड़ता था। जंगलों की सुरक्षा के लिए चौकीदार नियुक्त किए जाते थे तथा हर वर्ष सभा आयोजित कर वन संरक्षण से जुड़े निर्णय लिए जाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि बस्तर के लोग जंगलों का संरक्षण सामूहिक रूप से करते थे।
(i) जंगलों को पवित्र माना जाता था।
(ii) धरती माँ की पूजा की जाती थी।
(iii) गाँव की अपनी वन सीमा थी।
(iv) जंगलों की सामूहिक रक्षा होती थी।
(v) वन संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
27. बस्तर वन विद्रोह (1910) के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर ⇒ 1910 के बस्तर वन विद्रोह का मुख्य कारण अंग्रेज़ों की दमनकारी वन नीति थी। सरकार ने जंगलों के बड़े भाग को आरक्षित वन घोषित करने का प्रस्ताव रखा तथा झूम खेती, शिकार और वन उत्पादों के संग्रह पर प्रतिबंध लगा दिया। कई गाँवों को बिना मुआवजे के खाली कराया गया। लोगों से मुफ्त में लकड़ी कटवाने और बेगार कराने का कार्य भी लिया गया। बढ़ते लगान, अकाल तथा अधिकारियों के अत्याचारों ने जनता में असंतोष फैला दिया। इन परिस्थितियों ने बस्तर में बड़े विद्रोह को जन्म दिया।
(i) आरक्षित वन घोषित किए गए।
(ii) झूम खेती पर रोक लगी।
(iii) बेगार कराई गई।
(iv) लगान और अत्याचार बढ़े।
(v) विद्रोह शुरू हुआ।
28. बस्तर वन विद्रोह की घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ बस्तर के लोगों ने त्योहारों, बाजारों और सभाओं के माध्यम से विद्रोह की योजना बनाई। विद्रोह का संदेश आम की टहनियों, मिट्टी के गोले, मिर्च और तीर भेजकर फैलाया गया। लोगों ने धन और अनाज देकर आंदोलन का समर्थन किया। सरकारी कार्यालयों, पुलिस थानों और अंग्रेज़ अधिकारियों के घरों पर हमला किया गया। कई स्थानों पर लूटपाट और आगजनी की गई तथा अनाज गरीबों में बाँटा गया। इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण वन नीतियों का विरोध करना था।
(i) गुप्त रूप से संदेश भेजे गए।
(ii) लोगों ने सहयोग किया।
(iii) सरकारी संस्थानों पर हमला हुआ।
(iv) अनाज का पुनर्वितरण किया गया।
(v) वन नीतियों का विरोध किया गया।
29. बस्तर वन विद्रोह का दमन एवं परिणाम लिखिए।
उत्तर ⇒ बस्तर वन विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने सेना भेजी। कई आदिवासी नेताओं ने बातचीत का प्रयास किया, लेकिन अंग्रेज़ सैनिकों ने उन पर गोलियाँ चला दीं। लगभग तीन महीनों के भीतर विद्रोह को दबा दिया गया। अनेक गाँव खाली हो गए क्योंकि लोग जंगलों में भाग गए थे। गुंडा धूर अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आए। इस विद्रोह के बाद सरकार ने कुछ समय के लिए वन आरक्षण की योजना रोक दी तथा आरक्षित क्षेत्र का आकार भी कम कर दिया। इससे आदिवासियों की आंशिक जीत हुई।
(i) अंग्रेज़ों ने सेना भेजी।
(ii) विद्रोह दबा दिया गया।
(iii) कई गाँव खाली हुए।
(iv) गुंडा धूर पकड़े नहीं गए।
(v) वन आरक्षण योजना में परिवर्तन हुआ।
30. बस्तर वन विद्रोह का महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर ⇒ बस्तर वन विद्रोह भारतीय आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण आंदोलन था। इस विद्रोह ने अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण वन नीतियों का खुलकर विरोध किया। यद्यपि विद्रोह को सैन्य बल से दबा दिया गया, फिर भी सरकार को अपनी कुछ नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा। वन आरक्षण का कार्य कुछ समय के लिए रोक दिया गया तथा आरक्षित क्षेत्र का विस्तार कम किया गया। इस आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि स्थानीय समुदाय अपने जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए संगठित होकर संघर्ष कर सकते हैं।
(i) आदिवासी अधिकारों की रक्षा का आंदोलन था।
(ii) अंग्रेज़ी नीतियों का विरोध हुआ।
(iii) सरकार को नीति बदलनी पड़ी।
(iv) वन संरक्षण का संदेश मिला।
(v) आंदोलन ऐतिहासिक महत्व का था।
31. जावा (इंडोनेशिया) का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ जावा इंडोनेशिया का प्रमुख द्वीप है, जो आज चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था। औपनिवेशिक काल में जावा पर डचों का शासन था। वर्ष 1600 के आसपास यहाँ की जनसंख्या लगभग 34 लाख थी। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग झूम खेती करते थे और जंगलों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर थे। डच सरकार भारत की तरह जावा के जंगलों का भी व्यावसायिक उपयोग करना चाहती थी। जहाज़ निर्माण तथा अन्य उद्योगों के लिए लकड़ी प्राप्त करने हेतु वहाँ वैज्ञानिक वानिकी लागू की गई। इस प्रकार जावा भी औपनिवेशिक वन नीतियों का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।
(i) जावा इंडोनेशिया का प्रमुख द्वीप है।
(ii) पहले यहाँ घने जंगल थे।
(iii) डचों का शासन था।
(iv) लोग झूम खेती करते थे।
(v) जंगलों का व्यावसायिक उपयोग किया गया।
32. जावा के कलांग समुदाय का परिचय दीजिए।
उत्तर ⇒ कलांग समुदाय जावा के कुशल लकड़हारे और घुमंतू किसान थे। वे जंगलों से लकड़ी काटने तथा राजमहलों के निर्माण में अपनी विशेष दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे। 1755 में माताराम राज्य के विभाजन के समय लगभग 6,000 कलांग परिवार दो भागों में बाँट दिए गए। डच शासक भी उनके कौशल का उपयोग करना चाहते थे। जब डचों ने उन पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, तब 1770 में कलांग समुदाय ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि यह विद्रोह दबा दिया गया, फिर भी यह औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण संघर्ष था।
(i) कलांग कुशल लकड़हारे थे।
(ii) घुमंतू किसान भी थे।
(iii) 1755 में परिवार विभाजित हुए।
(iv) 1770 में विद्रोह किया।
(v) डच शासन का विरोध किया।
33. डचों की वन नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ डच सरकार ने जावा के जंगलों पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के लिए कठोर वन कानून बनाए। बिना अनुमति लकड़ी काटना, मवेशी चराना तथा जंगलों से गुजरना अपराध घोषित कर दिया गया। जंगलों का उपयोग मुख्य रूप से जहाज़ निर्माण और रेलवे के लिए लकड़ी प्राप्त करने हेतु किया गया। ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार सीमित कर दिए गए और उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। इससे स्थानीय लोगों और डच सरकार के बीच संघर्ष बढ़ने लगा। डच वन नीति का उद्देश्य जंगलों का संरक्षण नहीं बल्कि उनका आर्थिक दोहन था।
(i) डचों ने कठोर वन कानून बनाए।
(ii) जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
(iii) ग्रामीणों के अधिकार सीमित हुए।
(iv) लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग हुआ।
(v) स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ा।
34. ब्लैन्डाँगडिएन्स्टेन (Blandongdiensten) व्यवस्था क्या थी?
उत्तर ⇒ ब्लैन्डाँगडिएन्स्टेन डच सरकार द्वारा जावा में लागू की गई एक विशेष व्यवस्था थी। प्रारंभ में किसानों पर जंगलों में स्थित खेती की भूमि पर कर लगाया गया। बाद में कुछ गाँवों को इस शर्त पर कर से छूट दी गई कि वे सामूहिक रूप से जंगलों से पेड़ काटेंगे तथा लकड़ी ढोने के लिए अपने पशु और श्रम निःशुल्क उपलब्ध कराएँगे। यह वास्तव में बेगार प्रथा का एक रूप था। इस व्यवस्था से स्थानीय लोगों का शोषण हुआ और उन्हें बिना मजदूरी के सरकारी कार्य करने पड़े।
(i) यह डचों की विशेष व्यवस्था थी।
(ii) कर के बदले मुफ्त श्रम लिया जाता था।
(iii) पेड़ काटने का कार्य कराया जाता था।
(iv) लकड़ी ढुलाई कराई जाती थी।
(v) यह शोषणकारी व्यवस्था थी।
35. सुरोन्तिको सामिन कौन थे? उनके आंदोलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ सुरोन्तिको सामिन जावा के रान्दुब्लातुंग गाँव के निवासी थे। उन्होंने लगभग 1890 के आसपास डच सरकार द्वारा जंगलों पर किए गए स्वामित्व का विरोध किया। उनका कहना था कि हवा, पानी, भूमि और लकड़ी प्रकृति की देन हैं, इसलिए सरकार उन पर अधिकार नहीं जमा सकती। उन्होंने लोगों से कर, जुर्माना और बेगार का विरोध करने का आह्वान किया। धीरे-धीरे हजारों परिवार उनके आंदोलन से जुड़ गए। सामिन आंदोलन औपनिवेशिक वन नीतियों के विरुद्ध स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा का महत्वपूर्ण आंदोलन था।
(i) सुरोन्तिको सामिन जावा के नेता थे।
(ii) डच शासन का विरोध किया।
(iii) जंगलों पर सरकारी अधिकार नहीं माना।
(iv) बेगार और कर का विरोध किया।
(v) हजारों लोग आंदोलन से जुड़े।
36. सामिन आंदोलन के प्रतिरोध के प्रमुख तरीके लिखिए।
उत्तर ⇒ सामिन आंदोलन पूरी तरह अहिंसात्मक विरोध पर आधारित था। आंदोलनकारियों ने भूमि सर्वेक्षण का विरोध किया और अधिकारियों के सामने लेटकर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया। उन्होंने कर तथा जुर्माना देने से इनकार कर दिया। लोगों ने बेगार करने से भी मना कर दिया और सरकारी आदेशों का शांतिपूर्ण ढंग से विरोध किया। इस आंदोलन का उद्देश्य डच सरकार को यह बताना था कि जंगल और प्राकृतिक संसाधन जनता के हैं, किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं। सामिन आंदोलन ने स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष का उदाहरण प्रस्तुत किया।
(i) भूमि सर्वेक्षण का विरोध किया।
(ii) कर देने से इनकार किया।
(iii) बेगार नहीं की।
(iv) अहिंसात्मक आंदोलन चलाया।
(v) प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा की।
37. विश्वयुद्धों का जंगलों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जंगलों का बड़े पैमाने पर दोहन किया गया। भारत में अंग्रेज़ों ने युद्ध की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में पेड़ों की कटाई कराई। जावा में जापानी आक्रमण से पहले डचों ने “भस्म कर भागो नीति” अपनाकर सागौन के लट्ठों और आरा मशीनों को जला दिया ताकि वे जापानियों के हाथ न लगें। बाद में जापानियों ने भी युद्ध उद्योगों के लिए जंगलों का निर्मम दोहन किया। इससे प्राकृतिक वन और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचा।
(i) युद्ध में जंगलों का अधिक दोहन हुआ।
(ii) भारत में पेड़ काटे गए।
(iii) जावा में भस्म कर भागो नीति अपनाई गई।
(iv) जापानियों ने भी जंगल काटे।
(v) पर्यावरण को नुकसान पहुँचा।
38. युद्ध के बाद जावा के जंगलों की क्या स्थिति हुई?
उत्तर ⇒ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जावा के जंगलों की स्थिति काफी बदल गई। युद्ध के दौरान ग्रामीणों ने अनेक वन क्षेत्रों को साफ़ करके खेती शुरू कर दी थी। बाद में इंडोनेशिया की वन सेवा के लिए इन भूमि क्षेत्रों को वापस लेना आसान नहीं रहा। जंगलों और खेती के बीच संघर्ष लगातार बना रहा। इससे स्पष्ट हुआ कि केवल सरकारी नियंत्रण से जंगलों का संरक्षण संभव नहीं है। स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना वन प्रबंधन सफल नहीं हो सकता। यही विचार आगे चलकर नई वन नीतियों का आधार बना।
(i) युद्ध के बाद खेती का विस्तार हुआ।
(ii) जंगल वापस लेना कठिन था।
(iii) वन और खेती में संघर्ष हुआ।
(iv) सरकारी नीति चुनौतीपूर्ण बनी।
(v) स्थानीय भागीदारी आवश्यक मानी गई।
39. 1980 के दशक में वन नीति में क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर ⇒ 1980 के दशक तक सरकारों को यह अनुभव हो गया कि केवल वैज्ञानिक वानिकी और कठोर वन कानूनों से जंगलों का संरक्षण संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों को जंगलों से दूर रखने की नीति के कारण लगातार संघर्ष उत्पन्न हो रहे थे। इसलिए नई वन नीति में संरक्षण को प्रमुख उद्देश्य बनाया गया। सरकार ने यह स्वीकार किया कि जंगलों की रक्षा के लिए स्थानीय लोगों की सहभागिता आवश्यक है। इसके बाद सामुदायिक वन प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण पर अधिक बल दिया जाने लगा।
(i) वन नीति में परिवर्तन हुआ।
(ii) संरक्षण को प्राथमिकता मिली।
(iii) स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ी।
(iv) सामुदायिक वन प्रबंधन शुरू हुआ।
(v) पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया गया।
40. वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर ⇒ स्थानीय समुदायों ने सदियों से जंगलों का संरक्षण किया है। भारत के अनेक क्षेत्रों में ग्रामीणों ने सरना, देवराकुडु, कान तथा राई जैसे पवित्र वनों की रक्षा की है। कई गाँवों में लोग स्वयं बारी-बारी से जंगलों की चौकसी करते हैं और अवैध कटाई को रोकते हैं। स्थानीय लोग जंगलों का उपयोग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार करते हुए उनका संरक्षण भी करते हैं। आधुनिक वन प्रबंधन में भी यह माना गया है कि जंगलों की सुरक्षा तभी संभव है जब स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्य में सहभागी बनाया जाए। इसलिए आज सामुदायिक भागीदारी को वन संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
(i) स्थानीय लोग जंगलों की रक्षा करते हैं।
(ii) पवित्र वनों का संरक्षण किया जाता है।
(iii) सामुदायिक चौकसी की जाती है।
(iv) अवैध कटाई रोकी जाती है।
(v) वन संरक्षण में सहभागिता आवश्यक है।
41. जंगलों की जैव-विविधता (Biodiversity) से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व बताइए।
उत्तर ⇒ जंगलों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे तथा सूक्ष्म जीवों की विविधता को जैव-विविधता कहा जाता है। ऐमेज़ॉन तथा पश्चिमी घाट जैसे जंगलों के छोटे से भाग में भी सैकड़ों पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। जैव-विविधता पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे वन्य जीवों को प्राकृतिक आवास मिलता है तथा मनुष्य को भोजन, औषधि, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। वनों की कटाई और औद्योगीकरण के कारण यह जैव-विविधता लगातार घट रही है, जिससे पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए जैव-विविधता का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
(i) जैव-विविधता में अनेक जीव-वनस्पतियाँ शामिल हैं।
(ii) पर्यावरण संतुलित रहता है।
(iii) वन्य जीवों को आवास मिलता है।
(iv) मानव को अनेक संसाधन प्राप्त होते हैं।
(v) इसका संरक्षण आवश्यक है।
42. औद्योगीकरण का जंगलों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औद्योगीकरण के कारण जंगलों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ। उद्योगों के लिए लकड़ी, ईंधन तथा कच्चे माल की बढ़ती माँग ने वनों पर अत्यधिक दबाव डाला। कृषि विस्तार, चरागाहों के निर्माण और औद्योगिक उपयोग के लिए विशाल वन क्षेत्रों को साफ़ कर दिया गया। इससे प्राकृतिक वन तेजी से नष्ट होने लगे और जैव-विविधता प्रभावित हुई। अनेक वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त हो गया। पर्यावरण असंतुलित होने लगा तथा जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इस प्रकार औद्योगीकरण वन-विनाश का एक प्रमुख कारण बना।
(i) उद्योगों के लिए जंगल काटे गए।
(ii) लकड़ी की माँग बढ़ी।
(iii) वन क्षेत्र घटा।
(iv) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
(v) पर्यावरण असंतुलित हुआ।
43. औपनिवेशिक सरकार जंगलों को ‘अनुत्पादक भूमि’ क्यों मानती थी?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक सरकार का उद्देश्य अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना था। अंग्रेज़ अधिकारियों का मानना था कि यदि जंगलों को काटकर खेती योग्य भूमि बना दी जाए तो वहाँ से कर वसूला जा सकता है। इसलिए वे जंगलों को “अनुत्पादक” या बेकार भूमि मानते थे। उन्होंने जूट, कपास, गन्ना और गेहूँ जैसी व्यावसायिक फसलों की खेती को बढ़ावा दिया तथा जंगलों को कृषि भूमि में बदलना शुरू किया। इस नीति के कारण बड़े पैमाने पर वन-विनाश हुआ और स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकार भी प्रभावित हुए।
(i) राजस्व बढ़ाना उद्देश्य था।
(ii) जंगलों को बेकार भूमि माना गया।
(iii) खेती का विस्तार किया गया।
(iv) व्यावसायिक फसलों को बढ़ावा मिला।
(v) वन-विनाश बढ़ा।
44. अंग्रेज़ों ने सागौन और साल के वृक्षों को क्यों बढ़ावा दिया?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ सरकार को रेलवे, जहाज़ निर्माण और उद्योगों के लिए मजबूत एवं सीधी लकड़ी की आवश्यकता थी। सागौन और साल के वृक्ष इस उद्देश्य के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते थे। इसलिए वन विभाग ने प्राकृतिक मिश्रित जंगलों को काटकर इन वृक्षों के बड़े-बड़े बागान लगाए। अन्य उपयोगी प्रजातियों की उपेक्षा की गई। इससे व्यावसायिक लकड़ी का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन जंगलों की जैव-विविधता कम हो गई। इस नीति से स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं की अनदेखी हुई क्योंकि उन्हें विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों की आवश्यकता होती थी।
(i) मजबूत लकड़ी की आवश्यकता थी।
(ii) रेलवे और जहाज़ों में उपयोग होता था।
(iii) सागौन और साल को बढ़ावा मिला।
(iv) अन्य प्रजातियाँ कम हुईं।
(v) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
45. जंगलों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अंग्रेज़ों ने कौन-कौन से कदम उठाए?
उत्तर ⇒ अंग्रेज़ों ने जंगलों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने भारतीय वन सेवा की स्थापना की तथा वन अधिनियम लागू किए। जंगलों को आरक्षित, सुरक्षित और ग्रामीण वन की श्रेणियों में बाँटा गया। पेड़ों की कटाई, पशुओं की चराई, शिकार तथा वन उत्पादों के संग्रह पर कानूनी नियंत्रण लगाया गया। नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाता था। इन उपायों से सरकार का नियंत्रण तो मजबूत हुआ, लेकिन स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकार सीमित हो गए।
(i) वन सेवा की स्थापना हुई।
(ii) वन अधिनियम लागू किए गए।
(iii) जंगलों का वर्गीकरण किया गया।
(iv) लोगों के अधिकार सीमित हुए।
(v) सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
46. स्थानीय लोगों और औपनिवेशिक सरकार के बीच संघर्ष के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर ⇒ स्थानीय लोग जंगलों को अपनी आजीविका, संस्कृति और परंपरा का आधार मानते थे, जबकि औपनिवेशिक सरकार जंगलों को राजस्व और लकड़ी के स्रोत के रूप में देखती थी। वन कानूनों के कारण ग्रामीणों के जंगलों में प्रवेश, चराई, शिकार तथा वन उत्पादों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। झूम खेती पर रोक, बेगार, बढ़ा हुआ लगान तथा अधिकारियों के अत्याचारों ने लोगों में असंतोष पैदा किया। यही कारण था कि अनेक स्थानों पर वन विद्रोह हुए और स्थानीय लोगों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
(i) जंगलों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण थे।
(ii) वन अधिकार छीने गए।
(iii) झूम खेती पर रोक लगी।
(iv) बेगार और लगान बढ़ा।
(v) वन विद्रोह हुए।
47. औपनिवेशिक वन नीतियों का आदिवासी समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक वन नीतियों से आदिवासी समाज का पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ। उन्हें जंगलों से लकड़ी, फल, कंद-मूल और अन्य वन उत्पाद लेने से रोका गया। शिकार तथा झूम खेती पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अनेक समुदायों को अपने गाँव छोड़ने पड़े और मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तथा सामाजिक जीवन भी प्रभावित हुआ। इन परिस्थितियों के कारण आदिवासी समाज ने अनेक स्थानों पर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह किए।
(i) पारंपरिक जीवन प्रभावित हुआ।
(ii) जंगलों पर अधिकार सीमित हुए।
(iii) आजीविका संकट में आई।
(iv) विस्थापन हुआ।
(v) विद्रोह हुए।
48. वन संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी क्यों आवश्यक है?
उत्तर ⇒ स्थानीय समुदाय सदियों से जंगलों के साथ जुड़े हुए हैं और उनकी आवश्यकताओं तथा संरक्षण के तरीकों को अच्छी तरह समझते हैं। केवल सरकारी नियंत्रण से जंगलों की सुरक्षा संभव नहीं है। जब ग्रामीण स्वयं जंगलों की चौकसी करते हैं, अवैध कटाई रोकते हैं तथा पवित्र वनों का संरक्षण करते हैं, तब वन अधिक सुरक्षित रहते हैं। इसलिए आधुनिक वन नीति में स्थानीय लोगों की सहभागिता को विशेष महत्व दिया गया है। सामुदायिक भागीदारी से जंगलों का संरक्षण और लोगों की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
(i) स्थानीय लोगों का अनुभव महत्वपूर्ण है।
(ii) जंगलों की सुरक्षा बेहतर होती है।
(iii) अवैध कटाई रुकती है।
(iv) संरक्षण और उपयोग में संतुलन बनता है।
(v) सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।
49. औपनिवेशिक वन नीतियों की प्रमुख आलोचनाएँ लिखिए।
उत्तर ⇒ औपनिवेशिक वन नीतियों की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि उनका उद्देश्य जंगलों का संरक्षण नहीं बल्कि आर्थिक दोहन था। अंग्रेज़ों ने स्थानीय लोगों के अधिकारों की उपेक्षा की और प्राकृतिक वनों को काटकर व्यावसायिक बागान लगाए। वन कानूनों ने ग्रामीणों की पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित किया। शिकार, चराई और झूम खेती पर प्रतिबंध से आदिवासी समाज को भारी नुकसान हुआ। इन नीतियों से जैव-विविधता भी प्रभावित हुई तथा अनेक सामाजिक संघर्ष उत्पन्न हुए।
(i) आर्थिक दोहन पर बल दिया गया।
(ii) स्थानीय अधिकारों की उपेक्षा हुई।
(iii) प्राकृतिक वन नष्ट हुए।
(iv) जैव-विविधता प्रभावित हुई।
(v) सामाजिक संघर्ष बढ़े।
50. ‘वन्य समाज और उपनिवेशवाद’ अध्याय से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर ⇒ यह अध्याय हमें बताता है कि जंगल केवल लकड़ी या राजस्व का स्रोत नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण का आधार हैं। औपनिवेशिक शासन ने अपने आर्थिक हितों के लिए जंगलों का अत्यधिक दोहन किया, जिससे स्थानीय समुदायों और प्रकृति दोनों को नुकसान पहुँचा। इस अध्याय से यह शिक्षा मिलती है कि वनों का संरक्षण स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग संतुलित और टिकाऊ ढंग से होना चाहिए ताकि पर्यावरण सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियाँ भी इनका लाभ उठा सकें।
(i) जंगल जीवन का आधार हैं।
(ii) औपनिवेशिक नीतियाँ शोषणकारी थीं।
(iii) स्थानीय समुदायों का महत्व है।
(iv) वन संरक्षण आवश्यक है।
(v) टिकाऊ विकास अपनाना चाहिए।
More Class 9 History Revision Notes
| Chapter 1: फ्रांसीसी क्रान्ति |
| Chapter 2: यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति |
| Chapter 3: नात्सीवाद और हिटलर का उदय |
| Chapter 4: वन्य-समाज और उपनिवेशवाद |