Class 9 History Revision Notes

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति

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Chapter Overview

Class9
SubjectHistory 
Chapter Nameयूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति
Resource TypeRevision Notes
SyllabusNCERT
Suitable ForCBSE, JAC and other state boards

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति Revision Notes

1. यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय की पृष्ठभूमि क्या है?

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति के बाद पूरे यूरोप में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन तेजी से होने लगे। औद्योगिक क्रांति के कारण नए उद्योग स्थापित हुए, शहरों का विकास हुआ तथा मजदूर वर्ग की संख्या बढ़ने लगी। दूसरी ओर, मजदूरों का शोषण, बेरोजगारी, कम मजदूरी और असमानता जैसी समस्याएँ भी बढ़ीं। इन परिस्थितियों में विभिन्न विचारधाराएँ विकसित हुईं, जिनमें उदारवाद, रूढ़िवाद, आमूल परिवर्तनवाद (रैडिकल) और समाजवाद प्रमुख थे। आगे चलकर यही विचारधाराएँ रूस सहित अनेक देशों की राजनीति को प्रभावित करने लगीं। 1917 की रूसी क्रांति ने समाजवादी विचारधारा को व्यवहारिक रूप दिया और विश्व राजनीति की दिशा बदल दी।

(i) फ्रांसीसी क्रांति के बाद परिवर्तन शुरू हुए।

(ii) औद्योगिक क्रांति से सामाजिक बदलाव आए।

(iii) मजदूरों का शोषण बढ़ा।

(iv) नई विचारधाराओं का विकास हुआ।

(v) रूसी क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

2. यूरोप में समाज और शासन के परिवर्तन को लेकर कौन-कौन सी प्रमुख विचारधाराएँ विकसित हुईं?

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति के बाद यूरोप में समाज और शासन व्यवस्था को लेकर तीन प्रमुख विचारधाराएँ विकसित हुईं— उदारवादी (Liberals), आमूल परिवर्तनवादी (Radicals) तथा रूढ़िवादी (Conservatives)। उदारवादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णुता और प्रतिनिधि शासन के समर्थक थे। रैडिकल समाज में व्यापक एवं तेज़ परिवर्तन चाहते थे तथा बहुमत पर आधारित सरकार और महिलाओं के मताधिकार का समर्थन करते थे। इसके विपरीत रूढ़िवादी परंपराओं का सम्मान करते थे और परिवर्तन को धीरे-धीरे लागू करने के पक्षधर थे। इन विचारधाराओं ने यूरोप की राजनीति तथा आगे चलकर रूसी क्रांति को गहराई से प्रभावित किया।

विचारधाराप्रमुख विशेषता
उदारवादीव्यक्तिगत अधिकार एवं प्रतिनिधि शासन
रैडिकलव्यापक परिवर्तन एवं जनसमर्थित सरकार
रूढ़िवादीपरंपरा एवं क्रमिक सुधार

(i) तीन प्रमुख विचारधाराएँ विकसित हुईं।

(ii) उदारवादी व्यक्तिगत अधिकारों के समर्थक थे।

(iii) रैडिकल तेज़ परिवर्तन चाहते थे।

(iv) रूढ़िवादी परंपराओं का समर्थन करते थे।

(v) इन विचारधाराओं ने यूरोप को प्रभावित किया।

3. उदारवादी (Liberals) किसे कहते हैं? उनके प्रमुख विचार लिखिए।

उत्तर ⇒ उदारवादी ऐसे विचारक थे जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णुता और कानून के समक्ष समान अधिकारों का समर्थन करते थे। वे निरंकुश राजशाही के विरोधी थे तथा प्रतिनिधि शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों के पक्षधर थे। उनका मानना था कि सरकार जनता के अधिकारों की रक्षा करे। हालांकि वे लोकतंत्रवादी नहीं थे, क्योंकि वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का समर्थन नहीं करते थे। उनका विचार था कि मतदान का अधिकार केवल संपत्ति रखने वाले लोगों को मिलना चाहिए। उदारवाद ने आधुनिक लोकतंत्र, संवैधानिक शासन और नागरिक स्वतंत्रताओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(i) उदारवादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक थे।

(ii) धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन करते थे।

(iii) प्रतिनिधि शासन चाहते थे।

(iv) सार्वभौमिक मताधिकार के पक्ष में नहीं थे।

(v) नागरिक अधिकारों पर बल देते थे।

4. आमूल परिवर्तनवादी (रैडिकल) कौन थे? उनके विचारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर ⇒ आमूल परिवर्तनवादी या रैडिकल ऐसे लोग थे जो समाज और शासन व्यवस्था में व्यापक तथा तेज़ परिवर्तन चाहते थे। उनका मानना था कि सरकार का गठन जनता के बहुमत के समर्थन से होना चाहिए। वे महिलाओं सहित सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार देने के समर्थक थे। रैडिकल जमींदारों और बड़े उद्योगपतियों के विशेषाधिकारों का विरोध करते थे। हालांकि वे निजी संपत्ति के पूरी तरह विरोधी नहीं थे, बल्कि केवल कुछ लोगों के हाथों में संपत्ति के अत्यधिक संकेंद्रण का विरोध करते थे। उनका उद्देश्य अधिक न्यायपूर्ण एवं समानतापूर्ण समाज की स्थापना करना था।

(i) रैडिकल व्यापक परिवर्तन चाहते थे।

(ii) बहुमत आधारित सरकार का समर्थन करते थे।

(iii) महिला मताधिकार के समर्थक थे।

(iv) विशेषाधिकारों का विरोध करते थे।

(v) समान समाज की स्थापना चाहते थे।

5. रूढ़िवादी (Conservatives) किसे कहते हैं? उनके प्रमुख विचार लिखिए।

उत्तर ⇒ रूढ़िवादी वे लोग थे जो समाज की पुरानी परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्थाओं का सम्मान करते थे। वे अचानक होने वाले बड़े परिवर्तनों के विरोधी थे। प्रारंभ में वे क्रांतिकारी विचारों का विरोध करते थे, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी तक उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ सुधार आवश्यक हैं। उनका मानना था कि परिवर्तन धीरे-धीरे और सोच-समझकर किए जाने चाहिए, ताकि समाज में अस्थिरता न फैले। वे पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसमें आवश्यक सुधार करने के पक्षधर थे। इस कारण रूढ़िवादी विचारधारा को क्रमिक सुधार की विचारधारा भी कहा जाता है।

(i) रूढ़िवादी परंपराओं का सम्मान करते थे।

(ii) तेज़ बदलाव के विरोधी थे।

(iii) धीरे-धीरे सुधार चाहते थे।

(iv) पुरानी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते थे।

(v) सामाजिक स्थिरता पर बल देते थे।

6. उदारवादी, रैडिकल और रूढ़िवादी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति के बाद यूरोप में तीन प्रमुख विचारधाराएँ उभरीं। तीनों का समाज और शासन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग था। उदारवादी सीमित सुधार और नागरिक अधिकारों का समर्थन करते थे। रैडिकल व्यापक परिवर्तन और सार्वभौमिक मताधिकार चाहते थे। वहीं रूढ़िवादी परंपराओं को बनाए रखते हुए धीरे-धीरे सुधार के पक्षधर थे। इन विचारधाराओं के मतभेदों ने यूरोप की राजनीति तथा बाद की क्रांतियों को प्रभावित किया।

आधारउदारवादीरैडिकलरूढ़िवादी
परिवर्तनसीमितव्यापकधीरे-धीरे
मताधिकारसंपत्तिधारीसभी नागरिकसीमित
दृष्टिकोणअधिकारसमानतापरंपरा

(i) तीनों की विचारधारा अलग थी।

(ii) उदारवादी सीमित सुधार चाहते थे।

(iii) रैडिकल व्यापक परिवर्तन चाहते थे।

(iv) रूढ़िवादी क्रमिक सुधार चाहते थे।

(v) तीनों ने यूरोप की राजनीति को प्रभावित किया।

7. मताधिकार आंदोलन (Suffrage Movement) क्या था?

उत्तर ⇒ मताधिकार आंदोलन वह आंदोलन था जिसका उद्देश्य लोगों को मतदान का अधिकार दिलाना था। प्रारंभ में अधिकांश देशों में केवल संपत्ति रखने वाले पुरुषों को ही मतदान का अधिकार प्राप्त था। महिलाएँ तथा गरीब वर्ग इस अधिकार से वंचित थे। इसलिए महिलाओं सहित सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए व्यापक आंदोलन चलाया गया। इसे ही मताधिकार आंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन ने लोकतंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर अनेक देशों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू किया गया।

(i) मतदान का अधिकार दिलाने के लिए आंदोलन हुआ।

(ii) महिलाओं ने भी इसमें भाग लिया।

(iii) लोकतंत्र को मजबूती मिली।

(iv) सार्वभौमिक मताधिकार की माँग की गई।

(v) आधुनिक लोकतंत्र का विकास हुआ।

8. औद्योगिक समाज से क्या आशय है? इसकी प्रमुख समस्याएँ बताइए।

उत्तर ⇒ औद्योगिक क्रांति के बाद मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ, जिससे औद्योगिक समाज का विकास हुआ। नए कारखाने स्थापित हुए, शहरों का विस्तार हुआ तथा बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए गाँवों से शहरों की ओर आने लगे। लेकिन इसके साथ अनेक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं। मजदूरों से लंबे समय तक काम कराया जाता था, मजदूरी कम थी, बेरोजगारी बढ़ती जा रही थी तथा महिलाओं और बच्चों से भी कठिन श्रम कराया जाता था। शहरों में आवास, स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी गंभीर थीं।

(i) औद्योगिक समाज मशीनों पर आधारित था।

(ii) कारखानों का विकास हुआ।

(iii) मजदूरों का शोषण बढ़ा।

(iv) बेरोजगारी और गरीबी बढ़ी।

(v) शहरों में अनेक सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हुईं।

9. औद्योगिक समाज की समस्याओं पर उदारवादी और रैडिकल विचारधारा की क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर ⇒ औद्योगिक समाज में मजदूरों की खराब स्थिति को देखकर उदारवादी और रैडिकल दोनों चिंतित थे। उनका मानना था कि यदि मजदूर स्वस्थ, शिक्षित और सुरक्षित होंगे तो समाज तथा उद्योग दोनों का विकास होगा। वे रोजगार के अवसर बढ़ाने, शिक्षा का विस्तार करने तथा नागरिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के पक्षधर थे। रैडिकल वर्ग सामाजिक समानता और व्यापक राजनीतिक अधिकारों की भी माँग करता था। दोनों विचारधाराएँ मानती थीं कि समाज में सुधार आवश्यक है, लेकिन उनके सुधारों की गति और स्वरूप अलग-अलग थे।

(i) दोनों मजदूरों की समस्याओं से चिंतित थे।

(ii) शिक्षा पर बल दिया।

(iii) रोजगार बढ़ाने का समर्थन किया।

(iv) सामाजिक सुधार आवश्यक माने।

(v) दोनों के विचारों में कुछ अंतर भी था।

10. यूरोप में राष्ट्रवाद और क्रांति का उभार कैसे हुआ?

उत्तर ⇒ 1815 के बाद यूरोप की राजतंत्रीय सरकारों से जनता असंतुष्ट होने लगी। उदारवादी, रैडिकल और राष्ट्रवादी सभी ऐसे राष्ट्रों की स्थापना चाहते थे जहाँ नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों। फ्रांस, इटली, जर्मनी और रूस में अनेक क्रांतिकारी संगठनों का गठन हुआ, जिन्होंने राजाओं की निरंकुश सत्ता का विरोध किया। गिसेप्पे मेजिनी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने स्वतंत्र और एकीकृत राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्ष किया। राष्ट्रवाद और लोकतंत्र की यह लहर आगे चलकर यूरोप के कई देशों में राजनीतिक परिवर्तन तथा रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि बनी।

(i) 1815 के बाद असंतोष बढ़ा।

(ii) राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

(iii) राजतंत्र का विरोध किया गया।

(iv) समान अधिकारों की माँग उठी।

(v) आगे चलकर क्रांतियों का मार्ग प्रशस्त हुआ।

11. गिसेप्पे मेजिनी (Giuseppe Mazzini) कौन थे? उनके योगदान का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ गिसेप्पे मेजिनी इटली के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता और क्रांतिकारी विचारक थे। वे लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि प्रत्येक राष्ट्र को स्वतंत्र होकर अपनी जनता द्वारा संचालित होना चाहिए। उन्होंने इटली को एकजुट करने के उद्देश्य से अनेक गुप्त क्रांतिकारी संगठनों का गठन किया तथा राजशाही के विरुद्ध संघर्ष किया। मेजिनी के विचारों से केवल इटली ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरणा मिली। भारत सहित अनेक देशों के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी उनके विचारों से प्रेरणा प्राप्त की। उनके प्रयासों ने आधुनिक राष्ट्रवाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(i) मेजिनी इटली के राष्ट्रवादी नेता थे।

(ii) लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के समर्थक थे।

(iii) राजशाही का विरोध किया।

(iv) गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाए।

(v) विश्व के राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरित किया।

12. समाजवाद (Socialism) क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई?

उत्तर ⇒ समाजवाद एक ऐसी राजनीतिक एवं आर्थिक विचारधारा है, जो समाज में समानता और सामूहिक कल्याण पर बल देती है। उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के कारण मजदूरों का शोषण, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता बढ़ने लगी। इन समस्याओं के समाधान के रूप में समाजवाद का विकास हुआ। समाजवादियों का मानना था कि निजी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर कुछ लोगों का नियंत्रण सामाजिक असमानता का मुख्य कारण है। इसलिए उत्पादन के साधनों पर समाज या सरकार का नियंत्रण होना चाहिए, जिससे सभी लोगों को समान अवसर और न्याय मिल सके।

(i) समाजवाद समानता पर आधारित विचारधारा है।

(ii) इसका विकास औद्योगिक क्रांति के बाद हुआ।

(iii) मजदूरों के हितों की रक्षा करता है।

(iv) निजी संपत्ति की आलोचना करता है।

(v) सामूहिक कल्याण इसका उद्देश्य है।

13. समाजवाद के प्रमुख उद्देश्य एवं विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ समाजवाद का मुख्य उद्देश्य शोषणमुक्त, समान और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना है। समाजवादी निजी संपत्ति के स्थान पर उत्पादन के साधनों पर सामूहिक या सरकारी स्वामित्व का समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि समाज के सभी लोगों को समान अवसर, शिक्षा, रोजगार तथा सम्मान मिलना चाहिए। समाजवाद मजदूर वर्ग के अधिकारों की रक्षा, पूँजीपतियों के अत्यधिक लाभ पर नियंत्रण तथा सामाजिक समानता स्थापित करने पर बल देता है। इस विचारधारा का उद्देश्य समाज में आर्थिक विषमता को कम करना तथा सभी लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है।

विशेषताविवरण
स्वामित्वसामूहिक/सरकारी
उद्देश्यसमानता एवं सामाजिक न्याय
लाभमजदूरों के हितों की रक्षा

(i) समानता इसका प्रमुख उद्देश्य है।

(ii) निजी संपत्ति का विरोध करता है।

(iii) सामूहिक स्वामित्व का समर्थन करता है।

(iv) मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करता है।

(v) शोषणमुक्त समाज की स्थापना चाहता है।

14. कोऑपरेटिव (सहकारी) आंदोलन क्या था?

उत्तर ⇒ कोऑपरेटिव या सहकारी आंदोलन ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें लोग मिलकर उत्पादन करते थे और प्राप्त लाभ को सभी सदस्यों के बीच उनके कार्य के अनुसार बाँटते थे। समाजवादियों का विश्वास था कि इससे शोषण समाप्त होगा और सभी लोगों को समान अवसर प्राप्त होंगे। इंग्लैंड के उद्योगपति रॉबर्ट ओवेन ने अमेरिका में न्यू हार्मनी नामक आदर्श सहकारी समाज स्थापित करने का प्रयास किया। वहीं फ्रांस के समाजवादी लुई ब्लांक ने सरकार द्वारा सहकारी उद्यमों को प्रोत्साहित करने की वकालत की। इस आंदोलन ने आधुनिक सहकारी संस्थाओं के विकास की नींव रखी।

(i) सहकारी आंदोलन सामूहिक कार्य पर आधारित था।

(ii) लाभ सभी सदस्यों में बाँटा जाता था।

(iii) रॉबर्ट ओवेन इसके समर्थक थे।

(iv) लुई ब्लांक ने भी समर्थन किया।

(v) शोषण कम करना इसका उद्देश्य था।

15. रॉबर्ट ओवेन और लुई ब्लांक का समाजवाद में योगदान लिखिए।

उत्तर ⇒ रॉबर्ट ओवेन इंग्लैंड के प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाज सुधारक थे। उन्होंने अमेरिका में न्यू हार्मनी नामक आदर्श सहकारी समाज स्थापित करने का प्रयास किया, जहाँ सभी लोग मिलकर कार्य करें और लाभ समान रूप से बाँटें। दूसरी ओर, फ्रांस के समाजवादी लुई ब्लांक का मानना था कि सरकार को पूँजीवादी उद्योगों के स्थान पर सहकारी उद्यमों को बढ़ावा देना चाहिए। दोनों विचारकों ने मजदूरों के जीवन स्तर में सुधार, सामाजिक समानता तथा सहयोग की भावना को बढ़ावा देने का प्रयास किया। उनके विचार आगे चलकर समाजवादी आंदोलन के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।

विचारकप्रमुख योगदान
रॉबर्ट ओवेनन्यू हार्मनी की स्थापना
लुई ब्लांकसरकारी सहकारी उद्यमों का समर्थन

(i) रॉबर्ट ओवेन समाज सुधारक थे।

(ii) न्यू हार्मनी की स्थापना की।

(iii) लुई ब्लांक फ्रांसीसी समाजवादी थे।

(iv) सहकारी उद्योगों का समर्थन किया।

(v) समाजवादी विचारधारा को मजबूत किया।

16. कार्ल मार्क्स के समाजवाद संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ कार्ल मार्क्स उन्नीसवीं शताब्दी के महान समाजवादी विचारक थे। उनका मानना था कि औद्योगिक समाज में पूँजीपति मजदूरों के श्रम का शोषण करके लाभ कमाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक निजी पूँजी का नियंत्रण कुछ लोगों के हाथों में रहेगा, तब तक मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। इसलिए मजदूर वर्ग को संगठित होकर पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त करना चाहिए। मार्क्स का विश्वास था कि भविष्य में ऐसा समाज स्थापित होगा जहाँ उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का नियंत्रण होगा। इसी व्यवस्था को उन्होंने साम्यवादी समाज (Communist Society) कहा।

(i) कार्ल मार्क्स समाजवादी विचारक थे।

(ii) पूँजीवाद की आलोचना की।

(iii) मजदूरों के शोषण का विरोध किया।

(iv) सामूहिक स्वामित्व का समर्थन किया।

(v) साम्यवादी समाज की कल्पना की।

17. कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के विचारों का महत्व बताइए।

उत्तर ⇒ कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने आधुनिक समाजवाद और साम्यवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। दोनों का मानना था कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने बताया कि पूँजीपति वर्ग मजदूरों के श्रम से लाभ कमाता है, जबकि मजदूरों को उसका उचित प्रतिफल नहीं मिलता। उन्होंने मजदूरों को संगठित होकर शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्वान किया। उनके विचारों का प्रभाव रूस, चीन तथा अनेक अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर पड़ा। 1917 की रूसी क्रांति भी काफी हद तक मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थी।

(i) दोनों ने वैज्ञानिक समाजवाद विकसित किया।

(ii) वर्ग संघर्ष का सिद्धांत दिया।

(iii) मजदूरों के संगठन पर बल दिया।

(iv) पूँजीवाद की आलोचना की।

(v) रूसी क्रांति पर गहरा प्रभाव पड़ा।

18. समाजवाद को यूरोप में समर्थन क्यों मिला?

उत्तर ⇒ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगिक समाज की समस्याओं के कारण समाजवाद तेजी से लोकप्रिय हुआ। मजदूरों को कम मजदूरी, लंबी कार्य अवधि, बेरोजगारी और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। इन समस्याओं के समाधान के लिए मजदूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों और समाजवादी दलों का गठन हुआ। इंग्लैंड, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में समाजवादी दलों ने चुनावों में भाग लिया तथा मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। धीरे-धीरे समाजवाद पूरे यूरोप में एक प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा बन गया।

(i) मजदूरों का शोषण बढ़ा।

(ii) समाजवादी दलों का गठन हुआ।

(iii) ट्रेड यूनियनें बनीं।

(iv) मजदूर अधिकारों की माँग उठी।

(v) समाजवाद पूरे यूरोप में फैल गया।

19. यूरोप में समाजवादी राजनीतिक दलों का विकास कैसे हुआ?

उत्तर ⇒ 1870 के दशक तक समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे। जर्मनी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) मजदूरों के हितों के लिए कार्य करने लगी। ब्रिटेन में समाजवादियों और ट्रेड यूनियन नेताओं ने मिलकर लेबर पार्टी की स्थापना की। फ्रांस में भी समाजवादी दलों का गठन हुआ। इन दलों ने चुनावों में भाग लेकर संसद में मजदूरों की समस्याएँ उठाईं तथा श्रमिकों के अधिकारों से जुड़े कानून बनाने में योगदान दिया। हालांकि 1914 तक अधिकांश यूरोपीय देशों में समाजवादी सरकारें नहीं बन सकीं।

(i) समाजवादी दल यूरोप में स्थापित हुए।

(ii) जर्मनी में SPD बनी।

(iii) ब्रिटेन में लेबर पार्टी बनी।

(iv) मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष हुआ।

(v) समाजवादी विचारधारा मजबूत हुई।

20. रूसी क्रांति (Russian Revolution) क्या थी?

उत्तर ⇒ 1917 में रूस में हुई दो प्रमुख क्रांतिकारी घटनाओं—फरवरी क्रांति और अक्टूबर क्रांति—को संयुक्त रूप से रूसी क्रांति कहा जाता है। फरवरी क्रांति में ज़ार निकोलस द्वितीय की निरंकुश राजशाही का अंत हुआ, जबकि अक्टूबर क्रांति में बोल्शेविक दल ने व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में सत्ता पर अधिकार कर लिया। रूसी क्रांति का उद्देश्य शोषण, असमानता और निरंकुश शासन को समाप्त कर समाजवादी व्यवस्था स्थापित करना था। इस क्रांति ने रूस की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज में व्यापक परिवर्तन किए तथा विश्व इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।

(i) रूसी क्रांति 1917 में हुई।

(ii) इसमें फरवरी और अक्टूबर क्रांति शामिल हैं।

(iii) ज़ारशाही का अंत हुआ।

(iv) बोल्शेविक सत्ता में आए।

(v) समाजवादी शासन की स्थापना हुई।

21. 1914 में रूसी साम्राज्य की राजनीतिक एवं भौगोलिक स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ सन् 1914 में रूस विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था। इस पर ज़ार निकोलस द्वितीय का निरंकुश शासन था। ज़ार के पास असीमित शक्तियाँ थीं और जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार नहीं था। रूसी साम्राज्य यूरोप से लेकर प्रशांत महासागर तक फैला हुआ था। इसमें फ़िनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, एस्तोनिया, पोलैंड, यूक्रेन, बेलारूस के कुछ भाग तथा मध्य एशिया के अनेक क्षेत्र शामिल थे। साम्राज्य में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग रहते थे, जिनमें रूसी ऑर्थोडॉक्स, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, मुस्लिम और बौद्ध प्रमुख थे। विशाल साम्राज्य होने के बावजूद वहाँ राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव था।

(i) रूस पर ज़ार निकोलस द्वितीय का शासन था।

(ii) शासन निरंकुश था।

(iii) रूस का साम्राज्य बहुत विशाल था।

(iv) अनेक धर्मों के लोग रहते थे।

(v) जनता को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।

22. बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में रूस की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में रूस मुख्यतः कृषि प्रधान देश था। लगभग 85% जनसंख्या खेती पर निर्भर थी। किसान अपनी आवश्यकताओं के साथ-साथ बाजार के लिए भी उत्पादन करते थे और रूस अनाज का बड़ा निर्यातक था। दूसरी ओर उद्योगों का विकास सीमित था तथा मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग प्रमुख औद्योगिक केंद्र थे। मजदूरों को कम मजदूरी, लंबे कार्य घंटे और खराब कार्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। महिलाओं और बच्चों से भी कारखानों में कठिन श्रम कराया जाता था। सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता के कारण जनता में असंतोष बढ़ता गया, जिसने आगे चलकर रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की।

क्षेत्रस्थिति
कृषि85% लोग खेती पर निर्भर
उद्योगसीमित विकास
मजदूरकम मजदूरी, लंबे कार्य घंटे

(i) रूस कृषि प्रधान देश था।

(ii) अधिकांश लोग किसान थे।

(iii) उद्योग सीमित थे।

(iv) मजदूरों का शोषण होता था।

(v) असंतोष बढ़ने लगा।

23. रूस के किसानों की स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ रूस के अधिकांश किसान कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि वे खेती करते थे, लेकिन बड़ी मात्रा में भूमि सामंतों, चर्च और राजशाही के नियंत्रण में थी। किसान चाहते थे कि भूमि का पुनर्वितरण कर उन्हें स्वामित्व दिया जाए। कई क्षेत्रों में किसानों ने लगान देना बंद कर दिया तथा जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह भी किए। रूस में कम्यून (मीर) व्यवस्था प्रचलित थी, जिसके अंतर्गत भूमि सामूहिक रूप से बाँटी जाती थी। किसानों की आर्थिक कठिनाइयों और भूमि संबंधी समस्याओं ने रूसी क्रांति को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(i) अधिकांश किसान भूमिहीन या गरीब थे।

(ii) भूमि पर सामंतों का अधिकार था।

(iii) किसान भूमि का पुनर्वितरण चाहते थे।

(iv) कई स्थानों पर विद्रोह हुए।

(v) किसान क्रांति की प्रमुख शक्ति बने।

24. रूस के मजदूरों की स्थिति कैसी थी?

उत्तर ⇒ रूस में औद्योगिक मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। अधिकांश कारखाने निजी स्वामित्व में थे और मजदूरों से प्रतिदिन 10 से 15 घंटे तक काम कराया जाता था। उन्हें कम वेतन मिलता था तथा कार्यस्थलों पर सुरक्षा की उचित व्यवस्था नहीं थी। महिला मजदूरों को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती थी। रहने की व्यवस्था भी अत्यंत खराब थी। जब मजदूरों के साथ अन्याय होता था, तो वे हड़ताल कर अपने अधिकारों की माँग करते थे। इन कठिन परिस्थितियों ने मजदूरों को समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित किया और वे आगे चलकर रूसी क्रांति के प्रमुख आधार बने।

(i) मजदूरों से लंबे समय तक काम कराया जाता था।

(ii) मजदूरी बहुत कम थी।

(iii) महिलाओं को कम वेतन मिलता था।

(iv) कार्य परिस्थितियाँ खराब थीं।

(v) मजदूरों ने हड़तालें कीं।

25. कम्यून (मीर) व्यवस्था क्या थी?

उत्तर ⇒ कम्यून (मीर) रूस के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित एक सामूहिक भूमि व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत किसान समय-समय पर अपनी भूमि गाँव के सामुदायिक संगठन अर्थात् मीर को सौंप देते थे। इसके बाद मीर प्रत्येक परिवार की आवश्यकता और सदस्यों की संख्या के आधार पर भूमि का पुनर्वितरण करता था। इस प्रणाली का उद्देश्य भूमि का अपेक्षाकृत न्यायपूर्ण वितरण करना था। कुछ समाजवादियों का मानना था कि यही व्यवस्था भविष्य के समाजवादी समाज का आधार बन सकती है। कम्यून व्यवस्था ने रूस में सामूहिक स्वामित्व की भावना को मजबूत किया।

(i) मीर सामुदायिक भूमि व्यवस्था थी।

(ii) भूमि का पुनर्वितरण किया जाता था।

(iii) परिवार की आवश्यकता के अनुसार भूमि मिलती थी।

(iv) समाजवादियों ने इसका समर्थन किया।

(v) सामूहिक स्वामित्व की भावना विकसित हुई।

26. रूस में समाजवादी आंदोलन का विकास कैसे हुआ?

उत्तर ⇒ रूस में समाजवादी आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में तेज़ी से विकसित हुआ। 1898 में रूसी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी की स्थापना की गई। यह पार्टी गुप्त रूप से कार्य करती थी क्योंकि रूस में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध था। समाजवादी मजदूरों को संगठित करते, हड़तालें आयोजित करते और समाजवादी साहित्य का प्रचार करते थे। कुछ समाजवादी किसानों को क्रांति की मुख्य शक्ति मानते थे, जबकि लेनिन का मत था कि मजदूर वर्ग क्रांति का नेतृत्व करेगा। समाजवादी आंदोलन ने आगे चलकर 1917 की रूसी क्रांति की नींव रखी।

(i) समाजवादी आंदोलन 1898 से संगठित हुआ।

(ii) सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी बनी।

(iii) मजदूरों को संगठित किया गया।

(iv) हड़तालें आयोजित हुईं।

(v) रूसी क्रांति की नींव पड़ी।

27. सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी (Socialist Revolutionary Party) का परिचय दीजिए।

उत्तर ⇒ 1900 में सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी (SR Party) की स्थापना किसानों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई। इस पार्टी का मुख्य लक्ष्य किसानों को भूमि का स्वामित्व दिलाना था। पार्टी की माँग थी कि सामंतों के अधिकार वाली भूमि तुरंत किसानों में बाँट दी जाए। इसके सदस्यों का विश्वास था कि रूस की क्रांति में किसानों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। हालांकि लेनिन और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी इस विचार से पूरी तरह सहमत नहीं थे। फिर भी इस पार्टी ने रूसी किसान आंदोलन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(i) पार्टी की स्थापना 1900 में हुई।

(ii) किसानों के अधिकारों की रक्षा करती थी।

(iii) भूमि के पुनर्वितरण की माँग की।

(iv) किसान क्रांति के समर्थक थे।

(v) रूसी किसान आंदोलन को बल मिला।

28. लेनिन किसानों को समाजवादी आंदोलन की मुख्य शक्ति क्यों नहीं मानते थे?

उत्तर ⇒ व्लादिमीर लेनिन का मानना था कि रूस के किसान एक समान वर्ग नहीं थे। उनमें गरीब किसान, मध्यम किसान तथा संपन्न किसान शामिल थे, जिनके आर्थिक हित अलग-अलग थे। इसलिए किसानों को संगठित करना कठिन था। लेनिन का विश्वास था कि औद्योगिक मजदूर वर्ग अधिक संगठित, जागरूक और क्रांतिकारी होता है। यही कारण था कि उन्होंने मजदूर वर्ग को समाजवादी क्रांति की वास्तविक शक्ति माना। उनके अनुसार मजदूरों के नेतृत्व में ही पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर समाजवादी शासन स्थापित किया जा सकता है।

(i) किसान एक समान वर्ग नहीं थे।

(ii) उनके हित अलग-अलग थे।

(iii) मजदूर अधिक संगठित थे।

(iv) लेनिन ने मजदूरों को प्राथमिकता दी।

(v) मजदूरों को क्रांति की मुख्य शक्ति माना।

29. वास्तविक वेतन (Real Wage) क्या होता है?

उत्तर ⇒ वास्तविक वेतन से तात्पर्य उस क्रय-शक्ति से है, जो किसी व्यक्ति को प्राप्त वेतन से वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदने में सक्षम बनाती है। केवल वेतन की राशि अधिक होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उससे कितनी आवश्यक वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, यह अधिक महत्वपूर्ण होता है। यदि वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाएँ और वेतन समान रहे, तो वास्तविक वेतन घट जाता है। रूस में महँगाई बढ़ने और मजदूरी कम होने के कारण मजदूरों का वास्तविक वेतन लगातार घटता गया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हुई और असंतोष बढ़ा।

(i) वास्तविक वेतन क्रय-शक्ति को दर्शाता है।

(ii) महँगाई से वास्तविक वेतन घटता है।

(iii) मजदूरों की स्थिति खराब हुई।

(iv) रूस में वास्तविक वेतन कम हुआ।

(v) इससे असंतोष बढ़ा।

30. 1905 की रूसी क्रांति के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ 1905 की रूसी क्रांति के पीछे अनेक कारण थे। रूस में ज़ार निकोलस द्वितीय का निरंकुश शासन था तथा जनता को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। मजदूरों को कम मजदूरी और लंबे कार्य घंटे सहने पड़ते थे, जबकि किसानों पर भारी आर्थिक बोझ था। 1904–05 के रूस-जापान युद्ध में रूस की हार से सरकार की प्रतिष्ठा गिर गई। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने तथा मजदूरी घटने से जनता में असंतोष फैल गया। इन परिस्थितियों में मजदूर, किसान, उदारवादी और समाजवादी सभी सरकार के विरुद्ध एकजुट हो गए, जिससे 1905 की क्रांति प्रारंभ हुई।

(i) निरंकुश शासन प्रमुख कारण था।

(ii) मजदूरों का शोषण हो रहा था।

(iii) किसानों में असंतोष था।

(iv) रूस-जापान युद्ध की हार हुई।

(v) 1905 की क्रांति प्रारंभ हुई।

31. 1905 के खूनी रविवार (Bloody Sunday) की घटना का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ 22 जनवरी 1905 को रूस की राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में मजदूरों का एक शांतिपूर्ण जुलूस पादरी जॉर्जी गैपॉन (Father Gapon) के नेतृत्व में ज़ार निकोलस द्वितीय को अपनी समस्याओं से अवगत कराने के लिए विंटर पैलेस की ओर बढ़ा। मजदूर बेहतर वेतन, कार्य के घंटे कम करने तथा राजनीतिक अधिकारों की माँग कर रहे थे। लेकिन सैनिकों और पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चला दीं। इस घटना में 100 से अधिक लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। इस घटना को ‘खूनी रविवार’ (Bloody Sunday) कहा जाता है। इसके बाद पूरे रूस में हड़तालें, प्रदर्शन और विद्रोह शुरू हो गए, जिससे 1905 की रूसी क्रांति का विस्तार हुआ।

(i) घटना 22 जनवरी 1905 को हुई।

(ii) पादरी गैपॉन ने जुलूस का नेतृत्व किया।

(iii) सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाई।

(iv) अनेक लोग मारे गए।

(v) 1905 की क्रांति तेज़ हो गई।

32. 1905 की रूसी क्रांति के परिणामों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ 1905 की रूसी क्रांति के बाद ज़ार निकोलस द्वितीय को जनता के दबाव में कुछ सुधार करने पड़े। उन्होंने ड्यूमा (संसद) की स्थापना की घोषणा की और सीमित राजनीतिक अधिकार देने का वादा किया। परंतु कुछ ही समय बाद ज़ार ने पहली और दूसरी ड्यूमा को भंग कर दिया तथा चुनाव नियमों में परिवर्तन करके अपने समर्थकों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया। ट्रेड यूनियनों और मजदूर संगठनों पर भी नियंत्रण रखा गया। यद्यपि यह क्रांति अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हुई, फिर भी इसने निरंकुश शासन की कमजोरी को उजागर किया और 1917 की रूसी क्रांति के लिए आधार तैयार किया।

(i) ड्यूमा की स्थापना हुई।

(ii) कुछ राजनीतिक सुधार किए गए।

(iii) ज़ार ने ड्यूमा भंग कर दी।

(iv) जनता का असंतोष बना रहा।

(v) 1917 की क्रांति की नींव पड़ी।

33. प्रथम विश्वयुद्ध का रूस पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर ⇒ 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने पर रूस मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ। प्रारंभ में जनता ने ज़ार का समर्थन किया, लेकिन लगातार पराजयों, भारी जनहानि और आर्थिक संकट के कारण सरकार के प्रति असंतोष बढ़ गया। लाखों सैनिक मारे गए या घायल हुए। उद्योगों में उत्पादन घट गया तथा खाद्यान्न की भारी कमी हो गई। रेलवे व्यवस्था भी प्रभावित हुई, जिससे आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई। महँगाई, बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ने लगी। इन परिस्थितियों ने जनता का विश्वास ज़ार सरकार से समाप्त कर दिया और फरवरी 1917 की क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।

(i) रूस प्रथम विश्वयुद्ध में शामिल हुआ।

(ii) भारी जनहानि हुई।

(iii) आर्थिक संकट गहरा गया।

(iv) खाद्यान्न की कमी हुई।

(v) जनता ज़ार से नाराज़ हो गई।

34. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रूस की जनता और अर्थव्यवस्था की स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान रूस की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। लाखों सैनिक युद्ध में चले गए, जिससे कृषि और उद्योग दोनों प्रभावित हुए। बाल्टिक सागर मार्ग बंद होने से विदेशी व्यापार बाधित हो गया। कारखानों में कच्चे माल की कमी होने लगी और उत्पादन घट गया। शहरों में रोटी तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का संकट उत्पन्न हो गया। लंबी कतारें लगने लगीं और महँगाई लगातार बढ़ती गई। मजदूरों और किसानों की स्थिति अत्यंत खराब हो गई। इन समस्याओं ने जनता को सरकार के विरुद्ध खड़ा कर दिया और रूस में क्रांति की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

(i) उद्योग प्रभावित हुए।

(ii) कृषि उत्पादन घटा।

(iii) महँगाई बढ़ी।

(iv) खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ।

(v) जनता में असंतोष फैल गया।

35. फरवरी 1917 की रूसी क्रांति के प्रमुख कारण लिखिए।

उत्तर ⇒ फरवरी 1917 की रूसी क्रांति के पीछे अनेक कारण थे। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी और महँगाई लगातार बढ़ रही थी। मजदूरों को पर्याप्त वेतन नहीं मिल रहा था तथा जनता रोटी के लिए लंबी कतारों में खड़ी रहती थी। ज़ार निकोलस द्वितीय की निरंकुश नीतियों और प्रशासनिक असफलताओं से लोगों का विश्वास समाप्त हो गया। सैनिक भी युद्ध से थक चुके थे और सरकार का साथ छोड़ने लगे। इन परिस्थितियों में मजदूर, सैनिक और आम जनता एकजुट होकर ज़ार शासन के विरुद्ध आंदोलन करने लगे, जिसके परिणामस्वरूप फरवरी क्रांति हुई।

(i) प्रथम विश्वयुद्ध प्रमुख कारण था।

(ii) महँगाई और खाद्यान्न संकट बढ़ा।

(iii) जनता ज़ार से नाराज़ थी।

(iv) सैनिकों ने भी समर्थन छोड़ दिया।

(v) फरवरी क्रांति हुई।

36. फरवरी 1917 की रूसी क्रांति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ फरवरी 1917 में रूस की राजधानी पेत्रोग्राद में मजदूरों की हड़ताल और रोटी की माँग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हुए। 22 फरवरी को एक फैक्ट्री में तालाबंदी हुई और अगले दिन अनेक कारखानों के मजदूर हड़ताल पर चले गए। महिलाओं ने भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकार ने प्रदर्शन रोकने के लिए सेना भेजी, लेकिन सैनिकों ने जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और आंदोलनकारियों का साथ दे दिया। अंततः 2 मार्च 1917 को ज़ार निकोलस द्वितीय को सिंहासन छोड़ना पड़ा। इस प्रकार रूस में सदियों पुरानी ज़ारशाही समाप्त हो गई।

(i) क्रांति पेत्रोग्राद में शुरू हुई।

(ii) मजदूरों ने हड़ताल की।

(iii) महिलाओं ने नेतृत्व किया।

(iv) सैनिक जनता के साथ आ गए।

(v) ज़ार ने सिंहासन छोड़ दिया।

37. पेत्रोग्राद सोवियत (Petrograd Soviet) क्या था?

उत्तर ⇒ फरवरी 1917 की क्रांति के दौरान मजदूरों और सैनिकों ने मिलकर पेत्रोग्राद सोवियत का गठन किया। ‘सोवियत’ का अर्थ है प्रतिनिधियों की परिषद। यह संस्था मजदूरों और सैनिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी। पेत्रोग्राद सोवियत ने क्रांति के समय जनता को संगठित करने तथा प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर ड्यूमा के नेताओं ने अंतरिम सरकार बनाई। इस प्रकार रूस में कुछ समय तक द्वैध सत्ता (Dual Power) की स्थिति बनी रही, जहाँ एक ओर अंतरिम सरकार थी और दूसरी ओर पेत्रोग्राद सोवियत का प्रभाव था।

(i) सोवियत मजदूरों और सैनिकों की परिषद थी।

(ii) इसका गठन फरवरी 1917 में हुआ।

(iii) इसने जनता का नेतृत्व किया।

(iv) अंतरिम सरकार के साथ समानांतर कार्य किया।

(v) रूस में द्वैध सत्ता स्थापित हुई।

38. फरवरी क्रांति के बाद अंतरिम सरकार द्वारा किए गए प्रमुख सुधार लिखिए।

उत्तर ⇒ फरवरी 1917 की क्रांति के बाद रूस में अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इस सरकार ने सभा, संगठन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंध हटा दिए। पूरे रूस में सोवियतों के गठन की अनुमति दी गई। सरकार का उद्देश्य लोकतांत्रिक संविधान बनाना और निर्वाचित सरकार की स्थापना करना था। हालांकि उसने भूमि सुधार, युद्ध समाप्त करने तथा किसानों और मजदूरों की प्रमुख समस्याओं का समाधान नहीं किया। इसी कारण जनता का विश्वास धीरे-धीरे अंतरिम सरकार से भी समाप्त होने लगा और बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ता गया।

(i) अंतरिम सरकार का गठन हुआ।

(ii) नागरिक स्वतंत्रता दी गई।

(iii) सोवियतों के गठन की अनुमति मिली।

(iv) प्रमुख समस्याएँ हल नहीं हुईं।

(v) बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ा।

39. लेनिन की अप्रैल थीसिस (April Theses) क्या थी?

उत्तर ⇒ अप्रैल 1917 में निर्वासन से लौटने के बाद व्लादिमीर लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध अप्रैल थीसिस (April Theses) प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने तीन प्रमुख माँगें रखीं— युद्ध समाप्त किया जाए, सारी भूमि किसानों को दी जाए तथा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता पूरी तरह सोवियतों के हाथ में होनी चाहिए। लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी को समाजवादी क्रांति के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। उनकी अप्रैल थीसिस ने रूस की राजनीति को नई दिशा दी और अक्टूबर क्रांति की आधारशिला रखी।

(i) अप्रैल 1917 में प्रस्तुत की गई।

(ii) युद्ध समाप्त करने की माँग की।

(iii) भूमि किसानों को देने की बात कही।

(iv) बैंकों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन किया।

(v) अक्टूबर क्रांति की नींव रखी।

40. लेनिन की अप्रैल थीसिस का महत्व बताइए।

उत्तर ⇒ लेनिन की अप्रैल थीसिस ने रूस की राजनीतिक परिस्थितियों को पूरी तरह बदल दिया। इसने जनता, किसानों और मजदूरों की प्रमुख समस्याओं का स्पष्ट समाधान प्रस्तुत किया। भूमि वितरण, युद्ध की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसी माँगों के कारण बोल्शेविक दल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। लेनिन ने ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ का नारा देकर जनता का विश्वास जीता। परिणामस्वरूप बोल्शेविक पार्टी मजबूत हुई और अक्टूबर 1917 की क्रांति सफल हो सकी। इसलिए अप्रैल थीसिस को रूसी क्रांति का महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज माना जाता है।

(i) बोल्शेविकों की लोकप्रियता बढ़ी।

(ii) जनता को स्पष्ट कार्यक्रम मिला।

(iii) किसानों और मजदूरों का समर्थन मिला।

(iv) अक्टूबर क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

(v) लेनिन का नेतृत्व मजबूत हुआ।

41. अक्टूबर 1917 की रूसी क्रांति के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ फरवरी 1917 की क्रांति के बाद बनी अंतरिम सरकार जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल रही। प्रथम विश्वयुद्ध जारी रहा, जिससे सैनिक, किसान और मजदूर सभी असंतुष्ट थे। किसानों को भूमि नहीं मिली, मजदूरों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ तथा खाद्यान्न संकट और महँगाई लगातार बढ़ती गई। दूसरी ओर, लेनिन और बोल्शेविक दल ने “रोटी, शांति और भूमि” का नारा देकर जनता का समर्थन प्राप्त कर लिया। अंतरिम सरकार की कमजोर नीतियों और बोल्शेविकों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण अक्टूबर 1917 की क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

(i) अंतरिम सरकार असफल रही।

(ii) प्रथम विश्वयुद्ध जारी रहा।

(iii) किसानों और मजदूरों में असंतोष था।

(iv) बोल्शेविक लोकप्रिय हुए।

(v) अक्टूबर क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

42. अक्टूबर 1917 की रूसी क्रांति का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ अक्टूबर 1917 में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने रूस की अंतरिम सरकार के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की। 16 अक्टूबर 1917 को सैनिक क्रांतिकारी समिति का गठन किया गया, जिसका नेतृत्व लियॉन ट्रॉट्स्की ने किया। 24 अक्टूबर को क्रांतिकारियों ने टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेलवे स्टेशन और सरकारी कार्यालयों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। युद्धपोत ऑरोरा ने विंटर पैलेस पर हमला किया। अंततः अंतरिम सरकार के मंत्रियों को गिरफ्तार कर लिया गया और सत्ता बोल्शेविकों के हाथों में आ गई। इस प्रकार रूस में समाजवादी शासन की स्थापना हुई।

(i) लेनिन ने क्रांति का नेतृत्व किया।

(ii) ट्रॉट्स्की ने सैनिक समिति का नेतृत्व किया।

(iii) सरकारी भवनों पर कब्ज़ा किया गया।

(iv) विंटर पैलेस पर हमला हुआ।

(v) बोल्शेविक सत्ता में आए।

43. लियॉन ट्रॉट्स्की (Leon Trotsky) का रूसी क्रांति में योगदान लिखिए।

उत्तर ⇒ लियॉन ट्रॉट्स्की रूसी क्रांति के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने अक्टूबर 1917 की क्रांति के दौरान सैनिक क्रांतिकारी समिति का नेतृत्व किया और बोल्शेविकों की सैन्य रणनीति तैयार की। ट्रॉट्स्की ने सैनिकों, मजदूरों और सोवियतों को संगठित करके अंतरिम सरकार के विरुद्ध सफल विद्रोह कराया। बाद में उन्होंने रेड आर्मी (लाल सेना) का गठन किया और गृहयुद्ध के दौरान बोल्शेविक सरकार की रक्षा की। उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व के कारण बोल्शेविकों को विजय प्राप्त हुई। इसलिए ट्रॉट्स्की को रूसी क्रांति का प्रमुख सैन्य नेता माना जाता है।

(i) ट्रॉट्स्की प्रमुख बोल्शेविक नेता थे।

(ii) सैनिक क्रांतिकारी समिति का नेतृत्व किया।

(iii) रेड आर्मी का गठन किया।

(iv) गृहयुद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(v) बोल्शेविकों की सफलता में योगदान दिया।

44. अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद रूस में आर्थिक परिवर्तन क्या हुए?

उत्तर ⇒ अक्टूबर क्रांति के बाद बोल्शेविक सरकार ने रूस की आर्थिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए। निजी संपत्ति समाप्त कर दी गई तथा उद्योगों, बैंकों और बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों का राष्ट्रीयकरण किया गया। भूमि को सामाजिक संपत्ति घोषित किया गया और किसानों को सामंतों की भूमि पर अधिकार दिया गया। सरकार ने उत्पादन के साधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था लागू करने का प्रयास किया। इन सुधारों का उद्देश्य आर्थिक समानता स्थापित करना तथा पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त करना था।

आर्थिक परिवर्तनप्रभाव
उद्योगों का राष्ट्रीयकरणसरकारी नियंत्रण बढ़ा
बैंकों का राष्ट्रीयकरणवित्तीय व्यवस्था पर नियंत्रण
भूमि का पुनर्वितरणकिसानों को लाभ

(i) निजी संपत्ति समाप्त की गई।

(ii) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ।

(iii) बैंकों पर सरकारी नियंत्रण हुआ।

(iv) किसानों को भूमि मिली।

(v) समाजवादी अर्थव्यवस्था लागू हुई।

45. अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में सामाजिक परिवर्तन लिखिए।

उत्तर ⇒ अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद रूस में अनेक सामाजिक परिवर्तन हुए। बड़े मकानों को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर बेघर लोगों को रहने के लिए दिया गया। अभिजात्य वर्ग की विशेष उपाधियाँ समाप्त कर दी गईं। समाज में समानता की भावना को बढ़ावा दिया गया तथा वर्गभेद कम करने का प्रयास किया गया। सेना की वर्दियों में भी परिवर्तन किया गया और नई समाजवादी संस्कृति को प्रोत्साहित किया गया। सरकार ने शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर भी ध्यान दिया ताकि समाज में समान अवसर उपलब्ध हो सकें।

(i) बड़े मकानों का पुनर्वितरण हुआ।

(ii) अभिजात्य वर्ग के विशेषाधिकार समाप्त हुए।

(iii) समानता को बढ़ावा मिला।

(iv) नई समाजवादी संस्कृति विकसित हुई।

(v) सामाजिक सुधार किए गए।

46. अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में राजनीतिक परिवर्तन क्या हुए?

उत्तर ⇒ अक्टूबर क्रांति के बाद रूस की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह बदल गई। बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर रूसी कम्युनिस्ट पार्टी रखा गया। जनवरी 1918 में संविधान सभा को भंग कर दिया गया तथा अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस को सर्वोच्च संस्था बनाया गया। धीरे-धीरे रूस में एकदलीय शासन व्यवस्था स्थापित हो गई, जिसमें केवल कम्युनिस्ट पार्टी को राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति थी। सरकार ने प्रशासन, सेना और न्याय व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया। इससे रूस दुनिया का पहला समाजवादी राज्य बन गया।

(i) कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ।

(ii) संविधान सभा भंग की गई।

(iii) एकदलीय शासन स्थापित हुआ।

(iv) सोवियत कांग्रेस सर्वोच्च बनी।

(v) समाजवादी शासन स्थापित हुआ।

47. रूस में गृहयुद्ध (1918–1920) क्यों हुआ?

उत्तर ⇒ अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद रूस में बोल्शेविकों और उनके विरोधियों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। बोल्शेविकों को रेड्स (लाल सेना) कहा जाता था, जबकि राजशाही समर्थक, उदारवादी तथा अन्य विरोधी समूह व्हाइट्स (सफेद सेना) के नाम से जाने जाते थे। कुछ समाजवादी समूहों को ग्रीन्स कहा गया। फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और जापान जैसे देशों ने भी व्हाइट्स की सहायता की। गृहयुद्ध के दौरान भारी जनहानि, अकाल और आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ, लेकिन अंततः बोल्शेविकों की विजय हुई।

(i) रेड्स और व्हाइट्स में संघर्ष हुआ।

(ii) विदेशी देशों ने हस्तक्षेप किया।

(iii) भारी जनहानि हुई।

(iv) आर्थिक संकट बढ़ा।

(v) अंत में बोल्शेविक विजयी हुए।

48. रेड्स, व्हाइट्स और ग्रीन्स में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी गृहयुद्ध के दौरान विभिन्न समूहों को अलग-अलग रंगों से पहचाना जाता था। रेड्स (लाल) बोल्शेविक और समाजवादी शासन के समर्थक थे। व्हाइट्स (सफेद) ज़ारशाही, राजशाही तथा बोल्शेविक विरोधी समूह थे। ग्रीन्स (हरे) ऐसे लोग थे जो परिवर्तन तो चाहते थे, लेकिन बोल्शेविकों की नीतियों से सहमत नहीं थे। इन तीनों समूहों के बीच संघर्ष ने रूस के राजनीतिक भविष्य का निर्णय किया। अंततः रेड्स की विजय हुई और समाजवादी शासन मजबूत हुआ।

समूहउद्देश्य
रेड्सबोल्शेविक एवं समाजवादी शासन
व्हाइट्सज़ारशाही और बोल्शेविक विरोध
ग्रीन्सबोल्शेविकों से असहमत परिवर्तनवादी

(i) रेड्स बोल्शेविक थे।

(ii) व्हाइट्स राजशाही समर्थक थे।

(iii) ग्रीन्स अलग विचार रखते थे।

(iv) गृहयुद्ध में तीनों सक्रिय थे।

(v) रेड्स की विजय हुई।

49. यूएसएसआर (सोवियत संघ) का गठन कैसे हुआ?

उत्तर ⇒ गृहयुद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद बोल्शेविक सरकार ने विभिन्न राष्ट्रीयताओं को एक संघीय व्यवस्था में संगठित करने का निर्णय लिया। दिसंबर 1922 में सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) स्थापित किया गया। इसमें रूस सहित कई गणराज्यों को शामिल किया गया और उन्हें सीमित स्वायत्तता प्रदान की गई। यूएसएसआर का उद्देश्य समाजवादी शासन को मजबूत करना तथा विभिन्न राष्ट्रीयताओं को एकजुट रखना था। बाद में सोवियत संघ विश्व की सबसे शक्तिशाली समाजवादी शक्तियों में से एक बन गया।

(i) यूएसएसआर का गठन 1922 में हुआ।

(ii) कई गणराज्य इसमें शामिल हुए।

(iii) समाजवादी संघीय व्यवस्था बनी।

(iv) राष्ट्रीयताओं को स्वायत्तता मिली।

(v) सोवियत संघ विश्व शक्ति बना।

50. रूसी क्रांति का विश्व पर प्रभाव लिखिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति का विश्व इतिहास पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। यह विश्व की पहली सफल समाजवादी क्रांति थी, जिसने पूँजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद को स्थापित किया। इसके बाद चीन, क्यूबा तथा अन्य देशों में भी समाजवादी आंदोलनों को प्रेरणा मिली। मजदूरों और किसानों के अधिकारों के प्रति विश्वभर में जागरूकता बढ़ी। उपनिवेशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को भी नई दिशा मिली। साथ ही, पूँजीवादी और समाजवादी देशों के बीच वैचारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिसने आगे चलकर शीत युद्ध जैसी घटनाओं को जन्म दिया। इसलिए रूसी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है।

(i) पहली सफल समाजवादी क्रांति थी।

(ii) विश्वभर में समाजवाद को बढ़ावा मिला।

(iii) मजदूर आंदोलनों को प्रेरणा मिली।

(iv) स्वतंत्रता आंदोलनों पर प्रभाव पड़ा।

(v) विश्व राजनीति की दिशा बदल गई।

51. ज़ार निकोलस द्वितीय (Tsar Nicholas II) के शासन की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ ज़ार निकोलस द्वितीय रूस के अंतिम सम्राट थे, जिन्होंने 1894 से 1917 तक शासन किया। उनका शासन पूर्णतः निरंकुश था, अर्थात् राज्य की सारी शक्तियाँ ज़ार के हाथों में केंद्रित थीं। जनता को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे तथा संसद (ड्यूमा) की शक्तियाँ भी सीमित थीं। वे जनता की समस्याओं को समझने और समय पर सुधार करने में असफल रहे। प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की लगातार हार, आर्थिक संकट, महँगाई तथा खाद्यान्न की कमी ने उनकी लोकप्रियता को समाप्त कर दिया। अंततः फरवरी 1917 की क्रांति के दौरान उन्हें सिंहासन छोड़ना पड़ा और रूस में ज़ारशाही का अंत हो गया।

(i) निकोलस द्वितीय रूस के अंतिम ज़ार थे।

(ii) उनका शासन निरंकुश था।

(iii) जनता को अधिकार नहीं मिले।

(iv) प्रथम विश्वयुद्ध में असफल रहे।

(v) 1917 में सिंहासन छोड़ना पड़ा।

52. रूसी क्रांति में महिलाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फरवरी 1917 में खाद्यान्न संकट और महँगाई के कारण सबसे पहले महिलाओं ने रोटी की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू किया। 23 फरवरी 1917 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हजारों महिला मजदूर सड़कों पर उतर आईं। उनके आंदोलन में पुरुष मजदूर और सैनिक भी शामिल हो गए। महिलाओं के नेतृत्व में हुई हड़तालों ने पूरे पेत्रोग्राद में क्रांति की लहर फैला दी। इस प्रकार महिलाओं के संघर्ष ने ज़ारशाही के पतन और फरवरी क्रांति की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(i) महिलाओं ने आंदोलन का नेतृत्व किया।

(ii) रोटी की माँग को लेकर प्रदर्शन हुए।

(iii) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महत्वपूर्ण रहा।

(iv) मजदूर और सैनिक भी जुड़े।

(v) फरवरी क्रांति सफल हुई।

53. बोल्शेविक (Bolsheviks) कौन थे?

उत्तर ⇒ बोल्शेविक रूस की रूसी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी का एक प्रमुख गुट था, जिसका नेतृत्व व्लादिमीर लेनिन कर रहे थे। बोल्शेविक समाजवादी क्रांति के समर्थक थे और उनका उद्देश्य पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त करके समाजवादी शासन स्थापित करना था। वे मजदूरों और किसानों के अधिकारों की रक्षा तथा उत्पादन के साधनों पर सामूहिक नियंत्रण के पक्षधर थे। अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद बोल्शेविकों ने अंतरिम सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथों में ले ली। बाद में यही दल रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

(i) बोल्शेविक लेनिन के नेतृत्व में थे।

(ii) समाजवादी क्रांति के समर्थक थे।

(iii) पूँजीवाद का विरोध करते थे।

(iv) अक्टूबर क्रांति का नेतृत्व किया।

(v) बाद में कम्युनिस्ट पार्टी बने।

54. बोल्शेविकों की सफलता के प्रमुख कारण लिखिए।

उत्तर ⇒ बोल्शेविकों की सफलता के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे। अंतरिम सरकार जनता की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकी, जबकि बोल्शेविकों ने “रोटी, शांति और भूमि” का नारा देकर किसानों, मजदूरों और सैनिकों का समर्थन प्राप्त किया। लेनिन के प्रभावशाली नेतृत्व, ट्रॉट्स्की की सैन्य संगठन क्षमता तथा बोल्शेविकों की स्पष्ट नीतियों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया। प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न संकट और सरकार की कमजोर स्थिति ने भी उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप अक्टूबर 1917 की क्रांति सफल हुई।

(i) लेनिन का प्रभावशाली नेतृत्व था।

(ii) जनता का व्यापक समर्थन मिला।

(iii) अंतरिम सरकार कमजोर थी।

(iv) युद्ध से असंतोष बढ़ा।

(v) अक्टूबर क्रांति सफल हुई।

55. रूसी क्रांति की सफलता के प्रमुख कारण बताइए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति की सफलता के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सभी प्रकार के कारण थे। ज़ारशाही की निरंकुश नीतियों, प्रथम विश्वयुद्ध की असफलताओं, आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी तथा मजदूरों और किसानों के शोषण ने जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। लेनिन और बोल्शेविक दल ने जनता की समस्याओं का स्पष्ट समाधान प्रस्तुत किया। सैनिकों ने भी सरकार का साथ छोड़कर क्रांतिकारियों का समर्थन किया। इन सभी कारणों से 1917 की रूसी क्रांति सफल हुई और रूस में समाजवादी शासन की स्थापना हुई।

(i) ज़ारशाही के विरुद्ध असंतोष था।

(ii) आर्थिक संकट गहरा गया।

(iii) युद्ध में हार हुई।

(iv) बोल्शेविकों का नेतृत्व प्रभावी था।

(v) सैनिकों ने क्रांति का साथ दिया।

56. रूसी क्रांति की प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति की सबसे बड़ी उपलब्धि ज़ारशाही का अंत और समाजवादी शासन की स्थापना थी। किसानों को भूमि पर अधिकार मिला तथा उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक सुधार किए गए। समाज में समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया तथा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुधार किए गए। रूसी क्रांति ने विश्वभर में समाजवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाया और उपनिवेशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को नई प्रेरणा दी।

(i) ज़ारशाही समाप्त हुई।

(ii) समाजवादी शासन स्थापित हुआ।

(iii) किसानों को भूमि मिली।

(iv) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ।

(v) समाजवाद का प्रसार हुआ।

57. रूसी क्रांति की सीमाएँ एवं कमियाँ लिखिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति ने अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ भी थीं। क्रांति के बाद रूस में एकदलीय शासन स्थापित हो गया, जिससे राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो गई। संविधान सभा को भंग कर दिया गया और विपक्षी दलों की गतिविधियों पर रोक लगा दी गई। गृहयुद्ध के कारण लाखों लोगों की मृत्यु हुई तथा आर्थिक संकट और भुखमरी की समस्या भी उत्पन्न हुई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगाया गया। इसलिए कुछ इतिहासकार मानते हैं कि समाजवादी व्यवस्था के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों में कमी आ गई।

(i) एकदलीय शासन स्थापित हुआ।

(ii) राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हुई।

(iii) गृहयुद्ध में भारी जनहानि हुई।

(iv) आर्थिक संकट बढ़ा।

(v) लोकतांत्रिक अधिकार कम हुए।

58. फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति (1789) और रूसी क्रांति (1917) दोनों विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं, लेकिन इनके उद्देश्य और परिणाम अलग थे। फ्रांसीसी क्रांति का मुख्य उद्देश्य निरंकुश राजशाही और सामंतवाद का अंत कर लोकतंत्र स्थापित करना था, जबकि रूसी क्रांति का उद्देश्य समाजवादी शासन की स्थापना करना था। फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को जन्म दिया, जबकि रूसी क्रांति ने समाजवाद और साम्यवाद को बढ़ावा दिया। दोनों क्रांतियों ने विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।

आधारफ्रांसीसी क्रांतिरूसी क्रांति
वर्ष17891917
उद्देश्यलोकतंत्रसमाजवाद
नेतृत्वमध्यम वर्गबोल्शेविक

(i) दोनों विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण क्रांतियाँ थीं।

(ii) उद्देश्यों में अंतर था।

(iii) फ्रांसीसी क्रांति लोकतंत्र पर आधारित थी।

(iv) रूसी क्रांति समाजवाद पर आधारित थी।

(v) दोनों ने विश्व को प्रभावित किया।

59. यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय का महत्व लिखिए।

उत्तर ⇒ यह अध्याय आधुनिक विश्व इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से हमें उदारवाद, रूढ़िवाद, रैडिकलवाद तथा समाजवाद जैसी प्रमुख विचारधाराओं की जानकारी मिलती है। साथ ही रूस की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों तथा 1917 की रूसी क्रांति के कारणों और परिणामों का अध्ययन किया जाता है। यह अध्याय लोकतंत्र, समाजवाद, मजदूर आंदोलन, किसान आंदोलन तथा आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं के विकास को समझने में सहायता करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं तथा विद्यालयी अध्ययन की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है।

(i) आधुनिक इतिहास को समझने में सहायक है।

(ii) प्रमुख विचारधाराओं की जानकारी मिलती है।

(iii) रूसी क्रांति का अध्ययन होता है।

(iv) समाजवाद को समझने में मदद मिलती है।

(v) परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

60. रूसी क्रांति से हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति हमें सिखाती है कि जब किसी देश में लंबे समय तक असमानता, शोषण और निरंकुश शासन बना रहता है, तो जनता परिवर्तन के लिए संघर्ष करती है। यह क्रांति सामाजिक न्याय, समानता तथा मजदूरों और किसानों के अधिकारों के महत्व को स्पष्ट करती है। साथ ही यह भी सीख देती है कि किसी भी सरकार को जनता की समस्याओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। समय पर सुधार और लोकतांत्रिक भागीदारी किसी भी राष्ट्र की स्थिरता के लिए आवश्यक हैं। इसलिए रूसी क्रांति आज भी विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।

(i) अन्याय के विरुद्ध संघर्ष आवश्यक है।

(ii) जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए।

(iii) समानता और सामाजिक न्याय महत्वपूर्ण हैं।

(iv) लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है।

(v) इतिहास से सीख लेकर भविष्य बेहतर बनाया जा सकता है।

61. समाजवाद और पूँजीवाद में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ समाजवाद और पूँजीवाद दो भिन्न आर्थिक एवं राजनीतिक विचारधाराएँ हैं। समाजवाद में उत्पादन के साधनों पर सरकार या समाज का नियंत्रण होता है, जबकि पूँजीवाद में उत्पादन के साधनों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है। समाजवाद का उद्देश्य सामाजिक समानता, सामूहिक कल्याण तथा आर्थिक विषमता को कम करना है। दूसरी ओर, पूँजीवाद व्यक्तिगत लाभ, निजी संपत्ति तथा मुक्त व्यापार पर आधारित होता है। समाजवाद मजदूरों के हितों को प्राथमिकता देता है, जबकि पूँजीवाद प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत निवेश को बढ़ावा देता है। दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य आर्थिक विकास है, परंतु उनके कार्य करने के तरीके अलग-अलग हैं।

आधारसमाजवादपूँजीवाद
स्वामित्वसरकार/समाजनिजी व्यक्ति
उद्देश्यसमानतालाभ कमाना
आधारसामूहिक कल्याणप्रतिस्पर्धा

(i) समाजवाद सामूहिक स्वामित्व पर आधारित है।

(ii) पूँजीवाद निजी स्वामित्व पर आधारित है।

(iii) समाजवाद समानता पर बल देता है।

(iv) पूँजीवाद लाभ को महत्व देता है।

(v) दोनों आर्थिक व्यवस्थाएँ अलग हैं।

62. उदारवाद और समाजवाद में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ उदारवाद और समाजवाद दोनों आधुनिक विचारधाराएँ हैं, लेकिन इनके उद्देश्य और सिद्धांत अलग हैं। उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार और सीमित सरकारी हस्तक्षेप का समर्थन करता है। समाजवाद सामाजिक समानता, सामूहिक स्वामित्व तथा सरकार की सक्रिय भूमिका पर बल देता है। उदारवादी निजी संपत्ति के समर्थक होते हैं, जबकि समाजवादी निजी संपत्ति के कारण उत्पन्न असमानता की आलोचना करते हैं। दोनों विचारधाराओं ने आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

आधारउदारवादसमाजवाद
मुख्य उद्देश्यव्यक्तिगत स्वतंत्रतासामाजिक समानता
संपत्तिनिजी संपत्ति का समर्थनसामूहिक स्वामित्व
सरकारसीमित हस्तक्षेपअधिक हस्तक्षेप

(i) उदारवाद स्वतंत्रता पर बल देता है।

(ii) समाजवाद समानता पर बल देता है।

(iii) निजी संपत्ति पर दोनों के विचार अलग हैं।

(iv) सरकार की भूमिका अलग है।

(v) दोनों आधुनिक विचारधाराएँ हैं।

63. रूसी क्रांति के समय रूस की प्रमुख समस्याएँ क्या थीं?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति से पहले रूस अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रहा था। देश में निरंकुश ज़ारशाही शासन था और जनता को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। किसान भूमि की कमी से परेशान थे तथा मजदूरों को कम मजदूरी और लंबे समय तक काम करना पड़ता था। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण महँगाई, बेरोजगारी और खाद्यान्न संकट बढ़ गया। उद्योगों का उत्पादन घट गया तथा लाखों सैनिक युद्ध में मारे गए। इन समस्याओं के कारण जनता का सरकार पर से विश्वास समाप्त हो गया और क्रांति की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

(i) निरंकुश शासन था।

(ii) किसानों की स्थिति खराब थी।

(iii) मजदूरों का शोषण होता था।

(iv) युद्ध से आर्थिक संकट बढ़ा।

(v) जनता में असंतोष फैल गया।

64. रूसी क्रांति में किसानों की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति में किसानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। अधिकांश किसान भूमिहीन थे और सामंतों की भूमि पर खेती करते थे। वे भूमि के पुनर्वितरण की माँग कर रहे थे। बोल्शेविकों ने किसानों से भूमि देने का वादा किया, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिला। फरवरी और अक्टूबर दोनों क्रांतियों में किसानों ने विद्रोहों, आंदोलनों तथा बोल्शेविकों का साथ देकर क्रांति को सफल बनाने में योगदान दिया। क्रांति के बाद किसानों को भूमि का अधिकार भी प्राप्त हुआ।

(i) किसान भूमिहीन थे।

(ii) भूमि की माँग कर रहे थे।

(iii) बोल्शेविकों का समर्थन किया।

(iv) क्रांति में सक्रिय भाग लिया।

(v) बाद में भूमि प्राप्त हुई।

65. रूसी क्रांति में मजदूरों की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ मजदूर वर्ग रूसी क्रांति की सबसे बड़ी शक्ति था। खराब कार्य परिस्थितियों, कम मजदूरी और लंबे कार्य घंटों के कारण मजदूर पहले से ही असंतुष्ट थे। उन्होंने कई बार हड़तालें कीं और 1917 की फरवरी क्रांति में बड़े पैमाने पर भाग लिया। पेत्रोग्राद के कारखानों के मजदूरों ने आंदोलन की शुरुआत की। अक्टूबर क्रांति में भी मजदूरों ने बोल्शेविकों का समर्थन किया और सरकारी संस्थानों पर कब्ज़ा करने में सहायता की। मजदूरों के सहयोग के बिना रूसी क्रांति की सफलता संभव नहीं थी।

(i) मजदूर क्रांति की प्रमुख शक्ति थे।

(ii) उन्होंने हड़तालें कीं।

(iii) फरवरी क्रांति में भाग लिया।

(iv) बोल्शेविकों का समर्थन किया।

(v) क्रांति को सफल बनाया।

66. लेनिन के नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ व्लादिमीर लेनिन एक दूरदर्शी, प्रभावशाली और संगठित नेता थे। उन्होंने जनता की समस्याओं को समझा और “रोटी, शांति और भूमि” का नारा दिया। उन्होंने बोल्शेविक दल को संगठित किया तथा स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य और रणनीति से कार्य किया। अक्टूबर क्रांति की सफलता और समाजवादी शासन की स्थापना में उनका नेतृत्व निर्णायक सिद्ध हुआ। इसलिए उन्हें रूस के महान क्रांतिकारी नेताओं में गिना जाता है।

(i) लेनिन प्रभावशाली नेता थे।

(ii) जनता का विश्वास जीता।

(iii) बोल्शेविकों को संगठित किया।

(iv) स्पष्ट कार्यक्रम दिया।

(v) क्रांति का सफल नेतृत्व किया।

67. रूसी क्रांति और औद्योगिक क्रांति में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति एक राजनीतिक एवं सामाजिक क्रांति थी, जबकि औद्योगिक क्रांति आर्थिक एवं तकनीकी परिवर्तन की प्रक्रिया थी। रूसी क्रांति का उद्देश्य समाजवादी शासन स्थापित करना था, जबकि औद्योगिक क्रांति का उद्देश्य मशीनों द्वारा उत्पादन बढ़ाना था। औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड से शुरू हुई, जबकि रूसी क्रांति रूस में 1917 में हुई। दोनों घटनाओं ने विश्व इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला, लेकिन उनके उद्देश्य और परिणाम अलग-अलग थे।

आधाररूसी क्रांतिऔद्योगिक क्रांति
प्रकारराजनीतिकआर्थिक
उद्देश्यसमाजवादऔद्योगीकरण
स्थानरूसइंग्लैंड

(i) दोनों का स्वरूप अलग था।

(ii) उद्देश्य अलग थे।

(iii) समय और स्थान अलग थे।

(iv) दोनों का विश्व पर प्रभाव पड़ा।

(v) आधुनिक इतिहास में दोनों महत्वपूर्ण हैं।

68. रूसी क्रांति के आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति के बाद उद्योगों, बैंकों और बड़ी संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया गया। भूमि किसानों में बाँटी गई और उत्पादन के साधनों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित हुआ। इससे आर्थिक समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया। हालांकि प्रारंभिक वर्षों में गृहयुद्ध और अव्यवस्था के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ, लेकिन बाद में योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के माध्यम से औद्योगिक विकास को गति मिली। रूसी अर्थव्यवस्था पूरी तरह समाजवादी मॉडल की ओर बढ़ गई।

(i) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ।

(ii) भूमि का पुनर्वितरण हुआ।

(iii) सरकारी नियंत्रण बढ़ा।

(iv) योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था विकसित हुई।

(v) समाजवादी आर्थिक व्यवस्था स्थापित हुई।

69. रूसी क्रांति के राजनीतिक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति के बाद ज़ारशाही समाप्त हो गई और दुनिया का पहला समाजवादी राज्य स्थापित हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी ने शासन की बागडोर संभाली और एकदलीय व्यवस्था लागू की गई। सरकार ने प्रशासन, सेना तथा न्याय व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया। समाजवादी विचारधारा विश्वभर में फैली और अनेक देशों की राजनीति को प्रभावित किया। रूसी क्रांति ने आधुनिक विश्व की राजनीतिक व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ा।

(i) ज़ारशाही समाप्त हुई।

(ii) समाजवादी राज्य बना।

(iii) कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ।

(iv) एकदलीय व्यवस्था लागू हुई।

(v) विश्व राजनीति प्रभावित हुई।

70. यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय का समग्र निष्कर्ष लिखिए।

उत्तर ⇒ “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” अध्याय आधुनिक विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं और विचारधाराओं का अध्ययन कराता है। इसमें उदारवाद, रूढ़िवाद, रैडिकलवाद और समाजवाद जैसी विचारधाराओं का विकास तथा रूस की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। 1917 की रूसी क्रांति ने न केवल रूस की शासन व्यवस्था बदली, बल्कि विश्वभर में समाजवादी विचारधारा को नई दिशा दी। यह अध्याय समानता, सामाजिक न्याय, मजदूर अधिकार और राजनीतिक परिवर्तन के महत्व को समझने में अत्यंत उपयोगी है।

(i) यह आधुनिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।

(ii) प्रमुख विचारधाराओं का अध्ययन कराता है।

(iii) रूसी क्रांति का महत्व बताता है।

(iv) समाजवाद को समझने में सहायक है।

(v) प्रतियोगी एवं बोर्ड परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

71. यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय में लेनिन का योगदान स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ व्लादिमीर लेनिन रूसी क्रांति के सबसे प्रमुख नेता थे। उन्होंने बोल्शेविक दल का नेतृत्व किया और मजदूरों, किसानों तथा सैनिकों को संगठित किया। उन्होंने “रोटी, शांति और भूमि” का नारा देकर जनता का विश्वास जीता। अप्रैल थीसिस के माध्यम से उन्होंने युद्ध समाप्त करने, भूमि किसानों में बाँटने तथा बैंकों के राष्ट्रीयकरण की माँग की। अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद उनके नेतृत्व में समाजवादी सरकार बनी। लेनिन ने रूस में नई आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया, जिसके कारण उन्हें आधुनिक विश्व के महान क्रांतिकारियों में गिना जाता है।

(i) लेनिन बोल्शेविकों के नेता थे।

(ii) अप्रैल थीसिस प्रस्तुत की।

(iii) अक्टूबर क्रांति का नेतृत्व किया।

(iv) समाजवादी शासन स्थापित किया।

(v) रूस के महान क्रांतिकारी बने।

72. रूसी क्रांति के बाद किसानों की स्थिति में क्या परिवर्तन हुए?

उत्तर ⇒ अक्टूबर 1917 की क्रांति के बाद बोल्शेविक सरकार ने किसानों के हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। सामंतों तथा बड़े भू-स्वामियों की भूमि जब्त कर किसानों में बाँट दी गई। किसानों को खेती करने का अधिकार मिला और जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की स्थिति में सुधार हुआ। हालांकि गृहयुद्ध और आर्थिक संकट के कारण प्रारंभिक वर्षों में कठिनाइयाँ बनी रहीं, फिर भी भूमि सुधार रूसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

(i) भूमि का पुनर्वितरण हुआ।

(ii) किसानों को खेती का अधिकार मिला।

(iii) सामंती व्यवस्था कमजोर हुई।

(iv) ग्रामीण सुधार हुए।

(v) किसानों की स्थिति में सुधार आया।

73. रूसी क्रांति के बाद मजदूरों की स्थिति में क्या परिवर्तन हुए?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति के बाद मजदूर वर्ग को अनेक अधिकार प्रदान किए गए। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा सरकार ने उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित किया। मजदूरों के कार्य घंटे, वेतन और कार्य परिस्थितियों में सुधार करने का प्रयास किया गया। कारखानों के प्रबंधन में मजदूरों की भागीदारी बढ़ी। ट्रेड यूनियनों को भी महत्व दिया गया। यद्यपि गृहयुद्ध और आर्थिक कठिनाइयों के कारण सभी समस्याएँ तुरंत समाप्त नहीं हुईं, फिर भी मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई।

(i) मजदूरों के अधिकार बढ़े।

(ii) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ।

(iii) कार्य परिस्थितियों में सुधार हुआ।

(iv) मजदूरों की भागीदारी बढ़ी।

(v) सामाजिक सुरक्षा में सुधार हुआ।

74. रूसी क्रांति के प्रमुख नेताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति में अनेक नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक दल का नेतृत्व किया और अक्टूबर क्रांति को सफल बनाया। लियॉन ट्रॉट्स्की ने सैनिक क्रांतिकारी समिति तथा रेड आर्मी का संगठन किया। ज़ार निकोलस द्वितीय रूस के अंतिम सम्राट थे, जिनके शासन का अंत फरवरी 1917 की क्रांति से हुआ। इन नेताओं के निर्णयों और कार्यों ने रूस के इतिहास की दिशा बदल दी तथा विश्व राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला।

नेतायोगदान
लेनिनबोल्शेविक नेता
ट्रॉट्स्कीरेड आर्मी का संगठन
निकोलस द्वितीयरूस के अंतिम ज़ार

(i) लेनिन ने क्रांति का नेतृत्व किया।

(ii) ट्रॉट्स्की ने सेना संगठित की।

(iii) निकोलस द्वितीय अंतिम ज़ार थे।

(iv) सभी ने इतिहास को प्रभावित किया।

(v) रूसी क्रांति सफल हुई।

75. रूसी क्रांति को विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटना क्यों माना जाता है?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है क्योंकि इसने पहली बार समाजवादी शासन की स्थापना की। इस क्रांति ने पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दी और मजदूरों तथा किसानों के अधिकारों को महत्व दिया। इसके प्रभाव से विश्वभर में समाजवादी आंदोलन मजबूत हुए तथा कई देशों में राजनीतिक परिवर्तन हुए। उपनिवेशों के स्वतंत्रता आंदोलनों को भी नई प्रेरणा मिली। आधुनिक विश्व राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर रूसी क्रांति का गहरा प्रभाव पड़ा।

(i) पहली समाजवादी क्रांति थी।

(ii) विश्व राजनीति प्रभावित हुई।

(iii) समाजवाद को बढ़ावा मिला।

(iv) स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरणा मिली।

(v) आधुनिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है।

76. रूसी क्रांति के कारण और परिणामों का संबंध स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति के प्रमुख कारणों में निरंकुश ज़ारशाही, किसानों और मजदूरों का शोषण, आर्थिक असमानता तथा प्रथम विश्वयुद्ध से उत्पन्न संकट शामिल थे। इन परिस्थितियों के कारण जनता में व्यापक असंतोष फैल गया। परिणामस्वरूप फरवरी और अक्टूबर 1917 की क्रांतियाँ हुईं। इन क्रांतियों के बाद ज़ारशाही समाप्त हुई, समाजवादी शासन स्थापित हुआ, उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा किसानों को भूमि प्रदान की गई। इस प्रकार रूसी क्रांति के परिणाम उसके कारणों का प्रत्यक्ष समाधान प्रस्तुत करते हैं।

(i) ज़ारशाही प्रमुख कारण थी।

(ii) युद्ध से संकट बढ़ा।

(iii) समाजवादी शासन स्थापित हुआ।

(iv) भूमि सुधार हुए।

(v) राष्ट्रीयकरण किया गया।

77. रूसी क्रांति का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति का प्रभाव भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर भी पड़ा। इस क्रांति ने भारतीय नेताओं को सामाजिक समानता, मजदूर अधिकार तथा आर्थिक न्याय के विचारों से परिचित कराया। अनेक स्वतंत्रता सेनानी समाजवादी विचारों से प्रभावित हुए। भारत में मजदूर और किसान आंदोलनों को नई दिशा मिली। आगे चलकर कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा का विकास हुआ तथा अनेक समाजवादी संगठनों की स्थापना हुई। इस प्रकार रूसी क्रांति ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक रूप से प्रभावित किया।

(i) भारतीय नेताओं पर प्रभाव पड़ा।

(ii) समाजवादी विचार फैले।

(iii) मजदूर आंदोलन मजबूत हुए।

(iv) किसान आंदोलन विकसित हुए।

(v) स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली।

78. रूसी क्रांति से लोकतंत्र और समाजवाद के बारे में क्या सीख मिलती है?

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति यह बताती है कि यदि सरकार जनता की समस्याओं की अनदेखी करती है, तो व्यापक जनआंदोलन उत्पन्न हो सकते हैं। यह सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय और मजदूर-किसानों के अधिकारों के महत्व को स्पष्ट करती है। साथ ही यह भी सीख देती है कि राजनीतिक परिवर्तन के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं का संरक्षण भी आवश्यक है। किसी भी देश के विकास के लिए जनता की भागीदारी, उत्तरदायी शासन तथा सामाजिक न्याय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

(i) जनता की समस्याओं का समाधान आवश्यक है।

(ii) सामाजिक न्याय महत्वपूर्ण है।

(iii) लोकतंत्र का सम्मान होना चाहिए।

(iv) समानता आवश्यक है।

(v) उत्तरदायी शासन जरूरी है।

79. बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से रूसी क्रांति अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण विषय कौन-कौन से हैं?

उत्तर ⇒ बोर्ड परीक्षा में इस अध्याय से विचारधाराएँ (उदारवादी, रैडिकल, रूढ़िवादी), समाजवाद, कार्ल मार्क्स, लेनिन, 1905 की क्रांति, खूनी रविवार, प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव, फरवरी 1917 की क्रांति, अप्रैल थीसिस, अक्टूबर क्रांति, बोल्शेविक, रेड्स-व्हाइट्स, गृहयुद्ध, यूएसएसआर का गठन तथा रूसी क्रांति के परिणाम जैसे विषय अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन विषयों का नियमित अध्ययन करने से इस अध्याय से पूछे जाने वाले अधिकांश प्रश्न आसानी से हल किए जा सकते हैं।

(i) विचारधाराएँ महत्वपूर्ण हैं।

(ii) लेनिन और मार्क्स महत्वपूर्ण हैं।

(iii) फरवरी और अक्टूबर क्रांति महत्वपूर्ण हैं।

(iv) गृहयुद्ध एवं यूएसएसआर महत्वपूर्ण हैं।

(v) परिणामों का अध्ययन आवश्यक है।

80. यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय का समापन टिप्पणी लिखिए।

उत्तर ⇒ “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” आधुनिक विश्व इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह अध्याय हमें राजनीतिक विचारधाराओं के विकास, औद्योगिक समाज की समस्याओं तथा रूस में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों की जानकारी देता है। रूसी क्रांति ने न केवल रूस की शासन व्यवस्था बदली, बल्कि विश्वभर में समाजवाद, मजदूर अधिकार, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता की नई सोच को जन्म दिया। आज भी यह अध्याय लोकतंत्र, सामाजिक परिवर्तन और जनआंदोलनों के महत्व को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

(i) यह आधुनिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।

(ii) समाजवाद की समझ विकसित करता है।

(iii) रूसी क्रांति का महत्व बताता है।

(iv) सामाजिक न्याय का संदेश देता है।

(v) बोर्ड एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

More Class 9 History Revision Notes

Chapter 1: फ्रांसीसी क्रान्ति
Chapter 2: यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति
Chapter 3: नात्सीवाद और हिटलर का उदय
Chapter 4: वन्य-समाज और उपनिवेशवाद

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